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वेनेजुएला के बाद ट्रंप के निशाने पर कौन सा देश: यूरोप क्यों चिंता में, अमेरिका के लिए कितना मुश्किल है कब्जा?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 06 Jan 2026 10:06 AM IST
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सार

वेनेजुएला के बाद ट्रंप किन-किन देशों को निशाना बनाने की ओर संकेत दे चुके हैं? इन देशों की ओर से ट्रंप को क्या प्रतिक्रिया दी गई है? अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकियों को लेकर यूरोप के एक देश में डर क्यों फैला है? ट्रंप अगर आर्कटिक में स्थित एक क्षेत्र में दिलचस्पी दिखा रहे हैं तो इसकी वजह क्या है? अमेरिका इस क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए क्या कर सकता है? आइये जानते हैं...

US President Donald Trump targets countries from Columbia to Cuba and Iran to Greenland Denmark Europe concern
अमेरिका के निशाने पर कई देश। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमेरिकी सेना की तरफ से वेनेजुएला पर हमला और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंधक बनाए जाने की घटना ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। ट्रंप प्रशासन की ओर से एक देश की स्वायत्तता का उल्लंघन कर उसके सर्वोच्च नेता को पकड़ने के घटनाक्रम की दक्षिण अमेरिकी देशों ने आलोचना की है। कुछ यूरोपीय देशों ने भी इस पर चिंता जाहिर की है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वेनेजुएला में अमेरिकी सेना और सीआईए के सफल अभियान के बाद लगातार दूसरे देशों पर समान कार्रवाई करने की बात कहते रहे हैं। उन्होंने अब तक क्यूबा, कोलंबिया से लेकर ईरान तक को धमकियां दे दी हैं, जबकि आर्कटिक सागर में स्थित ग्रीनलैंड को लेकर भी बयानों के जरिए कब्जा करने की मंशा दर्शायी है। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर वेनेजुएला के बाद ट्रंप किन-किन देशों को निशाना बनाने की ओर संकेत दे चुके हैं? इन देशों की ओर से ट्रंप को क्या प्रतिक्रिया दी गई है? अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकियों को लेकर यूरोप के एक देश में डर क्यों फैला है? ट्रंप अगर आर्कटिक में स्थित एक क्षेत्र में दिलचस्पी दिखा रहे हैं तो इसकी वजह क्या है? अमेरिका इस क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए क्या कर सकता है? आइये जानते हैं...
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वेनेजुएला पर हमले के बाद किन देशों को चेतावनी दे चुके हैं ट्रंप?
वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य अभियान और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद ट्रंप ने कई देशों को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है। इनमें कोलंबिया, क्यूबा, ग्रीनलैंड और ईरान शामिल हैं।

1. कोलंबिया: एयर फोर्स वन में वेनेजुएला के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में ट्रंप ने कोलंबिया को निशाना बनाया और उसके राष्ट्रपति, गुस्तावो पेट्रो पर देश को एक 'बीमार आदमी' के शासन में चलाने का आरोप लगाया। ट्रंप ने आरोप लगाया कि यह देश और उसके नेता कोकीन बनाना और उसे अमेरिका को बेचना पसंद करते हैं।" 

जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या उनका प्रशासन कोलंबिया को निशाना बनाने के लिए कोई ऑपरेशन कर सकता है, तो ट्रंप ने जवाब दिया, "यह मुझे अच्छा लगता है।"

2.  ईरान: आर्थिक संकट, अर्थव्यवस्था की धीमी गति और ईरानी मुद्रा- रियाल की गिरती साख के चलते बीते कई दिनों से ईरान में लोग सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इन प्रदर्शनों को लेकर ट्रंप ने अपने विचार रखे हैं और इशारा किया है कि उनका देश ईरान में किसी तरह के घातक बल के इस्तेमाल पर कार्रवाई कर सकता है। ट्रंप ने कहा कि अगर वे (ईरान) लोगों को मारना शुरू करता, जैसा उन्होंने अतीत में किया है, तो मुझे लगता है कि वे अमेरिका से बहुत बुरी तरह से प्रभावित होंगे।"

3.  क्यूबा: ट्रंप ने हाल ही में कहा है कि क्यूबा के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जरूरत अमेरिका को नहीं होगी। उन्होंने कहा कि यह देश पहले से ही पतन के कगार पर है, क्योंकि उसने वेनेजुएला के तेल से होने वाली सारी आमदनी खो दी है। हालांकि, विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कठोर रुख अपनाते हुए क्यूबा को एक बड़ी समस्या बताया और कहा कि वे बहुत परेशानी में हैं।

4. ग्रीनलैंड (डेनमार्क): वेनेजुएला पर हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करने की अपनी लंबे समय से चली आ रही चाहत को फिर से उठाया। उन्होंने दावा करते हुए कि यह अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा, "हमें ग्रीनलैंड चाहिए।" इतना ही नहीं ट्रंप ने जोर देकर कहा है कि डेनमार्क इसे (ग्रीनलैंड) को संभाल नहीं पाएगा। 

हालांकि, ट्रंप के इस रवैये को लेकर डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने चिंता जताई और उनकी टिप्पणी को खारिज कर दिया। यह भी बताया गया है कि ट्रंप ने इस द्वीप पर कब्जा करने के लिए बल प्रयोग की इच्छा भी दिखाई थी।

5.  वेनेजुएला (अंतरिम नेतृत्व): मादुरो की गिरफ्तारी के बाद भी ट्रंप ने वेनेजुएला की अंतरिम राष्ट्रपति डेलसी रोड्रिग्ज को चेतावनी दी कि अगर वह अमेरिका की मांगों का विरोध करना जारी रखती हैं तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं, जो मादुरो पर की गई कार्रवाई से भी गंभीर होगी। ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा कि वेनेजुएला में हम नियंत्रण में हैं।

यानी वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद, ट्रंप ने कम से कम पांच देशों के खिलाफ बात की, जिसमें कोलंबिया, ग्रीनलैंड, वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान शामिल हैं।

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दरअसल, ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका को अपनी सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है। उनके इस बयान के बाद से यूरोप में कुछ हद तक डर फैला है। ग्रीनलैंड और डेनमार्क के नेताओं ने ट्रंप के 4 जनवरी (रविवार) को दिए गए बयानों को लेकर आपत्ति भी जताई है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने  ट्रंप की टिप्पणियों को खारिज करते हुए एक बयान में कहा, "अमेरिका का ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की आवश्यकता के बारे में बात करने का कोई मतलब नहीं है।" उन्होंने कहा कि अमेरिका को डेनिश साम्राज्य के तीन देशों में से किसी पर भी कब्जा करने का कोई अधिकार नहीं है।

अब जानें- ग्रीनलैंड क्या है, कूटनीतिक तौर पर कितना अहम?
ग्रीनलैंड स्वायत्त शासन वाला देश है। हालांकि, यह अभी भी डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा है। यानी परोक्ष रूप से यहां यूरोपीय देश डेनमार्क का ही शासन है। ग्रीनलैंड की घरेलू गतिविधियों को वहां की सरकार ही देखती है। यह सरकार गृह मामलों के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, प्राकृतिक संसाधानों और कानून-प्रवर्तन के मामले देखती है। इसकी राजधानी न्युक है, जहां से प्रशासन के सारे काम देखे जाते हैं।

वहीं, डेनमार्क की तरफ से ग्रीनलैंड के विदेश से जुड़े मामले, रक्षा, वित्तीय नीति से जुड़े मामले देखे जाते हैं। डेनमार्क की महारानी मारग्रेथ-II ग्रीनलैंड की औपचारिक प्रमुख हैं, जबकि इसकी चुनी हुई सरकार का नेतृत्व प्रधानमंत्री म्युते बूरुप इगेदे कर रहे हैं। 

चौंकाने वाली बात यह है कि ग्रीनलैंड खुद यूरोप का हिस्सा नहीं है। यह उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का हिस्सा है और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) से करीब 5000 किमी दूर है। इस लिहाज से अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड की कूटनीतिक महत्ता बढ़ जाती है। ग्रीनलैंड सागर के जरिए आर्कटिक महासागर से सीधे जुड़े होने की वजह से ग्रीनलैंड का यह पूरा क्षेत्र कूटनीतिक तौर पर अहमियत रखता है। इतना ही नहीं 21 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला ग्रीनलैंड पूरे अमेरिका के करीब एक-चौथाई के बराबर है और रहने के लिए कई संभावनाओं से भरा रहा है।

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ट्रंप क्यों दिखा रहे हैं ग्रीनलैंड को लेकर दिलचस्पी?
अनुमान है कि दुनिया का 13 फीसदी तेल और 30 फीसदी गैस का भंडार, जो अब तक अनछुआ है, आर्कटिक में ही मौजूद है। डोनाल्ड ट्रंप के अब तक के इतिहास को देखा जाए तो वह जीवाश्म ईंधन को लेकर काफी सकारात्मक रहे हैं। इतना ही नहीं ग्रीनलैंड में कोयले, लोहे, तांबे और जस्ते के बड़े भंडार हैं। इसी के चलते ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद से कई मौकों पर ग्रीनलैंड को डेनमार्क खरीदने की बात कह चुके हैं। 

2010 से पहले तक के दौर में जब पूरी दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक क्रांति छा रही थी, उस दौरान अमेरिकी कंपनियों ने दुलर्भ खनिजों के लिए चीन पर निर्भरता बढ़ा दी। इसके चलते मोबाइल, कंप्यूटर और इलेक्ट्रिक कारों में इस्तेमाल होने वाले दुर्लभ खनिजों के लिए चीन ने अफ्रीका के बड़े हिस्सों में खनन शुरू किया और पूरे क्षेत्र में ही अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। दुर्लभ खनिजों में चीन के बढ़ते एकाधिकार और उसके राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आक्रामक नीतियों के चलते अमेरिका को अब ऐसे ठिकानों की तलाश है, जहां से वह इन दुर्लभ खनिजों पर अधिकार जमा सके। यहीं से बात शुरू होती है ग्रीनलैंड की, जो कि 2019 में ही डोनाल्ड ट्रंप की नजर में आ गया।

ग्रीनलैंड में दुनिया के कुछ दुर्लभ खनिजों का भी सबसे बड़ा भंडार है। इनमें नियोडायनियम, प्रासियोडायमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम का भंडार शामिल है। इसके अलावा द्वीप पर यूरेनियम और इसके बायप्रोडक्ट जिंक की भी काफी मात्रा मौजूद है। यह अहम खनिज इलेक्ट्रॉनिक, गैजेट्स और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के उत्पादन के लिए बेहद अहम हैं।

बताया जाता है कि 2019 में ट्रंप की नजर में ग्रीनलैंड मिनरल्स नाम की कंपनी थी, जो कि मूलतः ऑस्ट्रेलियाई है। इस कंपनी ने प्रायद्वीप की क्वानेफेल्ड खान पर 2007 में काम करना शुरू किया, जहां कई दुर्लभ धातुओं का भंडार है। अनुमान है कि अकेले इस क्षेत्र में ही 10 करोड़ टन दुर्लभ खनिज मौजूद हैं। आने वाले समय में दुर्लभ खनिजों के मामले में चीन से बाहर इस प्रोजेक्ट के सबसे बड़े बनने का अनुमान है।

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क्या पहले भी हुई ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने की कोशिश?
यह पहली बार नहीं है, जब अमेरिका के किसी राष्ट्रपति (ट्रंप नवनिर्वाचित राष्ट्रपति हैं) की तरफ से ग्रीनलैंड में दिलचस्पी दिखाई गई है। ग्रीनलैंड को अपने अधिकार क्षेत्र में लाना अमेरिका का 157 साल पुराना सपना है। 1867 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन की सरकार में विदेश मंत्री विलियम एच. सीवार्ड ने ग्रीनलैंड और आइसलैंड को खरीदने का विचार सामने रखा था। बताया जाता है कि 1868 तक अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड और आइसलैंड को 55 लाख डॉलर के बराबर सोने में खरीदने का समझौता होने ही वाला था। हालांकि, इसका प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ाया जा सका।

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इतना ही नहीं, 1910 और 1946 में भी अमेरिका की तरफ से ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश की गई। 1946 में अमेरिका की राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन की सरकार ने डेनमार्क को 10 करोड़ डॉलर (आज के समय में एक अरब डॉलर) के बराबर सोने में खरीदने का प्रस्ताव रखा था। तब ग्रीनलैंड को सैन्य अड्डा बनाने से जुड़ी योजनाएं बनाने की बातें सामने आई थीं। हालांकि, कई साल तक चली बातचीत के बाद भी अमेरिका को ग्रीनलैंड को खरीदने में सफलता नहीं मिली। 


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