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अब फ्रांस पर क्यों भड़का अमेरिका?: यूएनएससी की बैठक छोड़ क्यों निकले ट्रंप के राजनयिक; दोनों सहयोगियों में ठनी
Tue, 28 Jul 2026 11:51 AM IST
निर्मल कांत
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, संयुक्त राष्ट्र
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, संयुक्त राष्ट्र
Published by: निर्मल कांत
Updated Tue, 28 Jul 2026 11:51 AM IST
सार
संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकारों के मुद्दे पर अमेरिका और फ्रांस आमने-सामने आ गए। अमेरिकी राजनयिक बैठक छोड़कर बाहर निकल गए, जानिए वोल्कर तुर्क के कार्यकाल को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
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यूएन में क्यों आमने-सामने आए अमेरिका-फ्रांस
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एक्स//यूएसयूएन
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विस्तार
अमेरिका के राजनयिक सोमवार को संयुक्त राष्ट्र में उस समय बैठक से बाहर निकल गए, जब फ्रांस के प्रतिनिधि अमेरिका के मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर ट्रंप प्रशासन की आलोचना कर रहे थे। फ्रांस अमेरिका का करीबी यूरोपीय सहयोगी देश रहा है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की यूक्रेन पर हुई बैठक के दौरान अचानक यह नजारा देखने को मिला। यह कदम संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क को एक और चार साल का कार्यकाल देने के अमेरिकी विरोध के बाद आया। शुक्रवार को तुर्क को दोबारा नियुक्त किए जाने के प्रस्ताव को भारी समर्थन मिला था, जिसमें फ्रांस भी शामिल था।
अमेरिका का बैठक से बाहर निकलना केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुएल मैक्रों के बीच बढ़ते तनाव को नहीं दिखाता, बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती दूरियों को भी दर्शाता है।
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इस तनाव के पीछे कई मुद्दे हैं। इनमें ट्रंप की नाटो के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर उठ रहे सवाल, यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती में संभावित बदलाव और ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की उनकी इच्छा शामिल है। ग्रीनलैंड नाटो सदस्य देश डेनमार्क का हिस्सा है।
ट्रंप ने शिकायत की है कि यूरोपीय देशों ने उनसे मशविरा किए बिना ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका का साथ नहीं दिया। इस तनाव के बीच फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों यूरोप की सैन्य ताकत बढ़ाने और परमाणु सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ब्रिटेन के साथ फ्रांस यूरोप की दो परमाणु शक्तियों में से एक है।
ये भी पढ़ें: 'मेलानिया ट्रंप को कैसे मारें': अमेरिका की प्रथम महिला के खिलाफ ईरान ने जारी किया वीडियो; क्यों मचा बवाल?
अमेरिका ने फ्रांस पर क्या आरोप लगाया?
सोमवार को कुछ देर के लिए बैठक से बाहर निकलने के बाद अमेरिका के उप राजदूत डैन नेग्रिया ने फ्रांस पर नैतिकता का दिखावा करने और मानवाधिकार समेत हर मुद्दे पर दुनिया को उपदेश देने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि अमेरिका हर उस संघर्ष में फ्रांस के साथ खड़ा रहा है, जहां उसकी 'आजादी खतरे में पड़ी'और उसने दोस्ती व आपसी सम्मान के कारण फ्रांस के दिखावे को बर्दाश्त किया। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
वॉकआउट की वजह क्या थी?
अमेरिका के इस कदम की वजह शुक्रवार को फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र मिशन जिनेवा की ओर से किया गया एक सोशल मीडिया पोस्ट बताया जा रहा है। इस पोस्ट में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क के दूसरे कार्यकाल की अमेरिका की ओर से विरोध किए जाने की आलोचना की गई थी।
महासभा में वोल्कर तुर्क के पक्ष में 144 वोट पड़े, 10 देशों ने विरोध किया और 13 देशों ने मतदान से दूरी बनाई। अमेरिका विरोध करने वाले देशों में शामिल था।
फ्रांस के मिशन ने सोशल मीडिया पर लिखा, अमेरिका कभी मानवाधिकारों का प्रतीक हुआ करता था। अब ऐसा नहीं है। आज वह उत्तर कोरिया, निकारागुआ, माली और रूस के साथ खड़ा है और अलग-थलग पड़ गया है। अब दुनिया उसकी बात नहीं सुनती।
अमेरिका ने फ्रांस के बयान पर क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने एक्स पर जवाब देते हुए फ्रांस पर 'दुनिया के कुछ सबसे खराब मानवाधिकार उल्लंघन करने वालों को बचाने' का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि फ्रांस ने ऐसे व्यक्ति के पक्ष में मतदान किया, जो अमेरिका, ब्रिटेन और इस्राइल जैसे स्वतंत्र व संप्रभु लोकतंत्रों को लगातार उपदेश देता रहा है। वहीं, वह दुनिया के सबसे दमनकारी देशों के साथ करीबी संबंध बनाए हुए है।
वोल्कर तुर्क की भूमिका क्यों अहम है?
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख का पद अपने आप में काफी चुनौतीपूर्ण है। इस पद पर बैठे व्यक्ति को उन देशों की सरकारों के मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ आवाज उठानी होती है, जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य हैं।
उदाहरण के तौर पर, तुर्क ने रूस के 2022 में यूक्रेन पर किए गए हमले और गाजा में इस्राइल के युद्ध की सख्त आलोचना की। इसके अलावा, उन्होंने विश्व कप से पहले अमेरिका की आव्रजन नीति में 'बड़े बदलाव' की जरूरत बताई थी। उन्होंने इसके पीछे 'नस्लीय पहचान के आधार पर जांच, निगरानी और आव्रजन नियमों के पालन' जैसे मुद्दों का हवाला दिया था।
सोमवार की बैठक में अमेरिकी उप राजदूत ने फ्रांस पर सीधे निशाना साधा। उन्होंने कहा, आज मैं उन्हें याद दिलाता हूं कि दुनिया के लिए आज भी आजादी का प्रतीक अमेरिका ही है। इसलिए जब तक वे अपने अपमानजनक और अहंकारी बयानों को छोड़कर इस परिषद में अपनी स्थिति के अनुरूप व्यवहार नहीं करते, तब तक हम उनके राजनीतिक भाषण सुनने का समय नहीं देंगे।
फ्रांस ने वॉकआउट पर क्या कहा?
हालांकि, बैठक के अंत में जब फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र राजदूत जेरोम बोनाफोंट को जवाब देने के लिए बोलने का मौका मिला, तो उन्होंने अमेरिका के वॉकआउट का कोई जिक्र नहीं किया। उन्होंने इसके बजाय कहा कि फ्रांस, अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर 4 जुलाई के समारोह में शामिल हुआ, जिसने अमेरिका को स्वतंत्रता हासिल करने में मदद की थी।
उन्होंने कहा, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, मानवाधिकारों और विकास के लिए काम करने के उद्देश्य से हुई थी। यही भावना संयुक्त राष्ट्र में फ्रांस के काम करने का आधार है, ताकि इस संस्था, इसकी स्वतंत्रता, चार्टर के अनुसार काम करने की इसकी क्षमता और मानवाधिकारों व शांति की रक्षा की जा सके।
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की यूक्रेन पर हुई बैठक के दौरान अचानक यह नजारा देखने को मिला। यह कदम संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क को एक और चार साल का कार्यकाल देने के अमेरिकी विरोध के बाद आया। शुक्रवार को तुर्क को दोबारा नियुक्त किए जाने के प्रस्ताव को भारी समर्थन मिला था, जिसमें फ्रांस भी शामिल था।
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अमेरिका का बैठक से बाहर निकलना केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुएल मैक्रों के बीच बढ़ते तनाव को नहीं दिखाता, बल्कि अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती दूरियों को भी दर्शाता है।
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इस तनाव के पीछे कई मुद्दे हैं। इनमें ट्रंप की नाटो के प्रति प्रतिबद्धता को लेकर उठ रहे सवाल, यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती में संभावित बदलाव और ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की उनकी इच्छा शामिल है। ग्रीनलैंड नाटो सदस्य देश डेनमार्क का हिस्सा है।
ट्रंप ने शिकायत की है कि यूरोपीय देशों ने उनसे मशविरा किए बिना ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका का साथ नहीं दिया। इस तनाव के बीच फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों यूरोप की सैन्य ताकत बढ़ाने और परमाणु सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ब्रिटेन के साथ फ्रांस यूरोप की दो परमाणु शक्तियों में से एक है।
ये भी पढ़ें: 'मेलानिया ट्रंप को कैसे मारें': अमेरिका की प्रथम महिला के खिलाफ ईरान ने जारी किया वीडियो; क्यों मचा बवाल?
अमेरिका ने फ्रांस पर क्या आरोप लगाया?
सोमवार को कुछ देर के लिए बैठक से बाहर निकलने के बाद अमेरिका के उप राजदूत डैन नेग्रिया ने फ्रांस पर नैतिकता का दिखावा करने और मानवाधिकार समेत हर मुद्दे पर दुनिया को उपदेश देने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि अमेरिका हर उस संघर्ष में फ्रांस के साथ खड़ा रहा है, जहां उसकी 'आजादी खतरे में पड़ी'और उसने दोस्ती व आपसी सम्मान के कारण फ्रांस के दिखावे को बर्दाश्त किया। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
वॉकआउट की वजह क्या थी?
अमेरिका के इस कदम की वजह शुक्रवार को फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र मिशन जिनेवा की ओर से किया गया एक सोशल मीडिया पोस्ट बताया जा रहा है। इस पोस्ट में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क के दूसरे कार्यकाल की अमेरिका की ओर से विरोध किए जाने की आलोचना की गई थी।
महासभा में वोल्कर तुर्क के पक्ष में 144 वोट पड़े, 10 देशों ने विरोध किया और 13 देशों ने मतदान से दूरी बनाई। अमेरिका विरोध करने वाले देशों में शामिल था।
फ्रांस के मिशन ने सोशल मीडिया पर लिखा, अमेरिका कभी मानवाधिकारों का प्रतीक हुआ करता था। अब ऐसा नहीं है। आज वह उत्तर कोरिया, निकारागुआ, माली और रूस के साथ खड़ा है और अलग-थलग पड़ गया है। अब दुनिया उसकी बात नहीं सुनती।
अमेरिका ने फ्रांस के बयान पर क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने एक्स पर जवाब देते हुए फ्रांस पर 'दुनिया के कुछ सबसे खराब मानवाधिकार उल्लंघन करने वालों को बचाने' का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि फ्रांस ने ऐसे व्यक्ति के पक्ष में मतदान किया, जो अमेरिका, ब्रिटेन और इस्राइल जैसे स्वतंत्र व संप्रभु लोकतंत्रों को लगातार उपदेश देता रहा है। वहीं, वह दुनिया के सबसे दमनकारी देशों के साथ करीबी संबंध बनाए हुए है।
वोल्कर तुर्क की भूमिका क्यों अहम है?
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख का पद अपने आप में काफी चुनौतीपूर्ण है। इस पद पर बैठे व्यक्ति को उन देशों की सरकारों के मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ आवाज उठानी होती है, जो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य हैं।
उदाहरण के तौर पर, तुर्क ने रूस के 2022 में यूक्रेन पर किए गए हमले और गाजा में इस्राइल के युद्ध की सख्त आलोचना की। इसके अलावा, उन्होंने विश्व कप से पहले अमेरिका की आव्रजन नीति में 'बड़े बदलाव' की जरूरत बताई थी। उन्होंने इसके पीछे 'नस्लीय पहचान के आधार पर जांच, निगरानी और आव्रजन नियमों के पालन' जैसे मुद्दों का हवाला दिया था।
सोमवार की बैठक में अमेरिकी उप राजदूत ने फ्रांस पर सीधे निशाना साधा। उन्होंने कहा, आज मैं उन्हें याद दिलाता हूं कि दुनिया के लिए आज भी आजादी का प्रतीक अमेरिका ही है। इसलिए जब तक वे अपने अपमानजनक और अहंकारी बयानों को छोड़कर इस परिषद में अपनी स्थिति के अनुरूप व्यवहार नहीं करते, तब तक हम उनके राजनीतिक भाषण सुनने का समय नहीं देंगे।
फ्रांस ने वॉकआउट पर क्या कहा?
हालांकि, बैठक के अंत में जब फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र राजदूत जेरोम बोनाफोंट को जवाब देने के लिए बोलने का मौका मिला, तो उन्होंने अमेरिका के वॉकआउट का कोई जिक्र नहीं किया। उन्होंने इसके बजाय कहा कि फ्रांस, अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर 4 जुलाई के समारोह में शामिल हुआ, जिसने अमेरिका को स्वतंत्रता हासिल करने में मदद की थी।
उन्होंने कहा, संयुक्त राष्ट्र की स्थापना अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, मानवाधिकारों और विकास के लिए काम करने के उद्देश्य से हुई थी। यही भावना संयुक्त राष्ट्र में फ्रांस के काम करने का आधार है, ताकि इस संस्था, इसकी स्वतंत्रता, चार्टर के अनुसार काम करने की इसकी क्षमता और मानवाधिकारों व शांति की रक्षा की जा सके।