{"_id":"69ce29bf0b4bd60bf90255c8","slug":"west-asia-crisis-donald-trump-claiming-targets-achieved-and-war-end-in-iran-economic-blockade-hormuz-strait-us-2026-04-02","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पश्चिम एशिया संकट: ट्रंप बार-बार क्यों कर रहे हैं युद्ध खत्म होने का दावा, क्या काम आ रहा ईरान का आर्थिक बम?","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
पश्चिम एशिया संकट: ट्रंप बार-बार क्यों कर रहे हैं युद्ध खत्म होने का दावा, क्या काम आ रहा ईरान का आर्थिक बम?
विज्ञापन
सार
इस्राइल-अमेरिका के ईरान से युद्ध को अब एक महीने से ज्यादा हो गए हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार अमेरिका की जीत के दावों से लेकर इस संघर्ष से बाहर निकलने की बात तक कह चुके हैं। हालांकि, हर बार ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर उनका बयान बदलता चला जा रहा है। अब राष्ट्र के नाम संबोधन में ट्रंप ने कहा है कि वह ईरान में युद्ध के लक्ष्यों के पूरा होने के बाद संघर्ष से निकल जाएंगे।
ईरान बनाम अमेरिका
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन
विस्तार
ईरान ने अमेजन के डाटा सेंटर पर ड्रोन हमला किया, बाटेलको के दफ्तर में कर्मचारी दहशत के मारे नहीं बैठे। ईरान के आरजीसी ने 18 अमेरिकी कंपनियों पर ‘आर्थिक बम’ फोड़ने की चेतावनी जारी कर दी है। दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के बयान लगातार बदल रहे हैं। वह अब 2-3 सप्ताह में युद्ध खत्म होने का दावा कर रहे हैं। आखिर आगे क्या होगा?
भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल विजय कुमार नेरुला कहते हैं कि पश्चिम एशिया में ईरान ने अमेरिका की सही नस पकड़ ली है। वह आर्थिक मोर्चे पर घेरेबंदी कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति अपने लोगों को खुश करने में लगे हैं। उनके अंदाज से लग रहा है कि पश्चिम एशिया के हालात से अपमानित महसूस कर रहे हैं। खाड़ी देश में तैनात रहे वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि वहां के 13 अमेरिकी सैन्य अड्डे खाली हो चुके हैं। वहां कोई नहीं है और अमेरिकी अधिकारी, सैनिक लोग रिहाइशी इलाकों, होटलों में छिपकर रहे हैं। दुबई में रह रहे एके मेनन भी कहते हैं कि यहां के हालात लगातार खराब हो रहे हैं। कारोबार और व्यापार पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। अंदाजा यही लग रहा है कि अमेरिका पश्चिम एशिया से बाहर आने का सम्मानजनक रास्ता ढूंढ रहा है। यही कारण है कि ट्रंप एक बार कुछ और दूसरी बार कुछ कह रहे हैं।
Trending Videos
भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल विजय कुमार नेरुला कहते हैं कि पश्चिम एशिया में ईरान ने अमेरिका की सही नस पकड़ ली है। वह आर्थिक मोर्चे पर घेरेबंदी कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति अपने लोगों को खुश करने में लगे हैं। उनके अंदाज से लग रहा है कि पश्चिम एशिया के हालात से अपमानित महसूस कर रहे हैं। खाड़ी देश में तैनात रहे वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि वहां के 13 अमेरिकी सैन्य अड्डे खाली हो चुके हैं। वहां कोई नहीं है और अमेरिकी अधिकारी, सैनिक लोग रिहाइशी इलाकों, होटलों में छिपकर रहे हैं। दुबई में रह रहे एके मेनन भी कहते हैं कि यहां के हालात लगातार खराब हो रहे हैं। कारोबार और व्यापार पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। अंदाजा यही लग रहा है कि अमेरिका पश्चिम एशिया से बाहर आने का सम्मानजनक रास्ता ढूंढ रहा है। यही कारण है कि ट्रंप एक बार कुछ और दूसरी बार कुछ कह रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
अमेरिकी कंपनियों को आरजीसी ने जारी की चेतावनी, हमला कभी भी
कुवैत के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बुधवार को ईरान के ड्रोन हमले से ईधन टैंकों में आग लग गई। दूसरी तरफ ईरान के आरजीसी ने 18 टेक कंपनियों पर अमेरिका और इस्राइल को हमले में सहयोग करने का आरोप लगाया है। इनमें गूगल, अमेजन, बाटेलको, एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, टेस्ला, बोइंग, डेल, सिस्को, एचपी, इंटेल,ओरैकल, जेपी मार्गन, जीई जैसी कंपनियां हैं। ईरान की कोशिश अमेरिका को आर्थिक मोर्चे पर डराने की है। वह सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात समेत सभी को भाई बता रहा है। उसके टारगेट पर अमेरिका, उसके सैन्य अड्डे, कारोबारी प्रतिष्ठान, दूतावास हैं। ईरान चेतावनी दे रहा है कि अमेरिका खाड़ी देशों को छोड़कर चला जाए। पूर्व मेजर जनरल विजय कुमार नेरुला का कहना है कि ईरान का मकसद अमेरिका से निबटना, उसे पीछे धकेलना है। वह अभी इस्राइल पर उतना ध्यान नहीं दे रहा है।
भरोसे की कमी भड़का रही है युद्ध की आग
ईरान के हुक्मरान अमेरिका और उसके दावे पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। पूर्व ब्रिगेडियर एके सिंह का कहना है कि अमेरिका दुनिया का नंबर वन फॉयर पॉवर देश है। इस्राइल के साथ मिलकर सैन्य अभियान चला रहा है। ब्रिगेडियर सिंह कहते हैं कि गलत अनुमान के साथ अमेरिका और इस्राइल ने युद्ध शुरू किया। युद्ध शांति वार्ता के प्रयासों के बीच में शुरू हुआ। इसलिए विश्वास का संकट काफी गहरा है। हालांकि ब्रिगेडियर सिंह कहते हैं कि अमेरिका और ईरान दोनों के रणनीतिकार वार्ता और शांति के प्रयास की शुरुआत को स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन इसे धरातल पर आ पाने में समय लगेगा।
कुवैत के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बुधवार को ईरान के ड्रोन हमले से ईधन टैंकों में आग लग गई। दूसरी तरफ ईरान के आरजीसी ने 18 टेक कंपनियों पर अमेरिका और इस्राइल को हमले में सहयोग करने का आरोप लगाया है। इनमें गूगल, अमेजन, बाटेलको, एप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, टेस्ला, बोइंग, डेल, सिस्को, एचपी, इंटेल,ओरैकल, जेपी मार्गन, जीई जैसी कंपनियां हैं। ईरान की कोशिश अमेरिका को आर्थिक मोर्चे पर डराने की है। वह सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात समेत सभी को भाई बता रहा है। उसके टारगेट पर अमेरिका, उसके सैन्य अड्डे, कारोबारी प्रतिष्ठान, दूतावास हैं। ईरान चेतावनी दे रहा है कि अमेरिका खाड़ी देशों को छोड़कर चला जाए। पूर्व मेजर जनरल विजय कुमार नेरुला का कहना है कि ईरान का मकसद अमेरिका से निबटना, उसे पीछे धकेलना है। वह अभी इस्राइल पर उतना ध्यान नहीं दे रहा है।
भरोसे की कमी भड़का रही है युद्ध की आग
ईरान के हुक्मरान अमेरिका और उसके दावे पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। पूर्व ब्रिगेडियर एके सिंह का कहना है कि अमेरिका दुनिया का नंबर वन फॉयर पॉवर देश है। इस्राइल के साथ मिलकर सैन्य अभियान चला रहा है। ब्रिगेडियर सिंह कहते हैं कि गलत अनुमान के साथ अमेरिका और इस्राइल ने युद्ध शुरू किया। युद्ध शांति वार्ता के प्रयासों के बीच में शुरू हुआ। इसलिए विश्वास का संकट काफी गहरा है। हालांकि ब्रिगेडियर सिंह कहते हैं कि अमेरिका और ईरान दोनों के रणनीतिकार वार्ता और शांति के प्रयास की शुरुआत को स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन इसे धरातल पर आ पाने में समय लगेगा।
अमेरिका के पास चारा नहीं है
रक्षा और विदेश मामले के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि अमेरिका की धमकी से ईरान ने डरना छोड़ दिया है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान शांति से इनकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनकी कुछ शर्तें हैं। ईरान सम्मान के साथ युद्ध की समाप्ति चाहता है। यह केवल राष्ट्रपति ट्रंप के जीत का दावा कर देने भर से नहीं रुकेगा। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि इस्राइल की जिद पर युद्ध लंबा नहीं खिंचने वाला है। क्योंकि अमेरिका हो रहे नुकसान से तंग है। दूसरी दुनिया के देशों पर बड़ा आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार कोशिश कर रहे हैं कि होर्मुज स्ट्रेट खोलने के लिए नाटो संगठन देश आगे आएं। दुनिया के अन्य देश भी पहल करें, लेकिन इटली, आस्ट्रेलिया समेत तमाम देश पीछे हट गए हैं। इस्राइल से भी खबरें आ रही हैं कि वहां की जनता में युद्ध को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। अमेरिका के 50 शहरों में 90 लाख लोग युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं। इसलिए अमेरिका के पास ‘एक्जिट रूट’ के अलावा कोई चारा नहीं है।
....तो क्या इस्राइल के साथ जमीनी हमला नहीं करेगा अमेरिका?
रंजीत कुमार कहते हैं कि लेबनान में इस्राइल का जमीनी हमला जारी है। वहां चल सकता है, लेकिन ईरान में आसान नहीं है। ईरान के पास शाहेद, कामेकाजी जैसे ड्रोन हैं। बैलिस्टिक हाइपरसोनिक मिसाइल है। अंडर वाटर अन मैन्ड वेहिकिल हैं और लाखों की संख्या में सैनिक, सैन्य कमांडो हैं। ईरान कोई सीरिया, लीबिया, इराक, फिलिस्तीन या अफगानिस्तान नहीं है। उसके पास सैन्य साजो-सामान हैं। इसलिए अमेरिका जमीनी हमले को लेकर एक राय नहीं बना पा रहा है। उसके रणनीतिकार इसके खतरे का आभास कर रहे हैं।
रक्षा और विदेश मामले के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि अमेरिका की धमकी से ईरान ने डरना छोड़ दिया है। राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान शांति से इनकार नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनकी कुछ शर्तें हैं। ईरान सम्मान के साथ युद्ध की समाप्ति चाहता है। यह केवल राष्ट्रपति ट्रंप के जीत का दावा कर देने भर से नहीं रुकेगा। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि इस्राइल की जिद पर युद्ध लंबा नहीं खिंचने वाला है। क्योंकि अमेरिका हो रहे नुकसान से तंग है। दूसरी दुनिया के देशों पर बड़ा आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप बार-बार कोशिश कर रहे हैं कि होर्मुज स्ट्रेट खोलने के लिए नाटो संगठन देश आगे आएं। दुनिया के अन्य देश भी पहल करें, लेकिन इटली, आस्ट्रेलिया समेत तमाम देश पीछे हट गए हैं। इस्राइल से भी खबरें आ रही हैं कि वहां की जनता में युद्ध को लेकर नाराजगी बढ़ रही है। अमेरिका के 50 शहरों में 90 लाख लोग युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं। इसलिए अमेरिका के पास ‘एक्जिट रूट’ के अलावा कोई चारा नहीं है।
....तो क्या इस्राइल के साथ जमीनी हमला नहीं करेगा अमेरिका?
रंजीत कुमार कहते हैं कि लेबनान में इस्राइल का जमीनी हमला जारी है। वहां चल सकता है, लेकिन ईरान में आसान नहीं है। ईरान के पास शाहेद, कामेकाजी जैसे ड्रोन हैं। बैलिस्टिक हाइपरसोनिक मिसाइल है। अंडर वाटर अन मैन्ड वेहिकिल हैं और लाखों की संख्या में सैनिक, सैन्य कमांडो हैं। ईरान कोई सीरिया, लीबिया, इराक, फिलिस्तीन या अफगानिस्तान नहीं है। उसके पास सैन्य साजो-सामान हैं। इसलिए अमेरिका जमीनी हमले को लेकर एक राय नहीं बना पा रहा है। उसके रणनीतिकार इसके खतरे का आभास कर रहे हैं।