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Pakistan: पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की रणनीति क्यों हुई फेल? 'इस्लामिक NATO' का सपना बिखरा

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Riya Dubey Updated Tue, 07 Apr 2026 02:40 PM IST
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सार

पाकिस्तान का इस्लामिक नाटो बनाने का सपना क्षेत्रीय तनाव और आंतरिक दबावों के कारण कमजोर पड़ गया है। अनिर्णय और रणनीतिक असफलताओं ने उसकी वैश्विक विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

Why did Pakistan's strategy in West Asia fail? The dream of an 'Islamic NATO' shattered?
आसिम मुनीर और शहबाज शरीफ - फोटो : ANI
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विस्तार

पश्चिम एशिया में खुद को नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान को बड़ा झटका लगा है। पाकिस्तान का बहुप्रचारित इस्लामिक नाटो बनाने का प्रयास मौजूदा भू-राजनीतिक हालात के बीच कमजोर पड़ता नजर आ रहा है।
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पश्चिम एशिया तनाव ने पूरे समीकरण को बदल दिया

सूत्रों के मुताबिक, पाकिस्तान ने पहले साऊदी अरबिया के साथ रक्षा समझौता किया और बाद में तुर्किये ने भी इसी तरह के समझौते में रुचि दिखाई। पाकिस्तान मिस्र और सोमालिया जैसे देशों को भी इस गठबंधन में शामिल करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इसी बीच अमेरिका-ईरान-इस्राइल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे समीकरण को बदल दिया।
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सूत्रों का यह भी कहना है कि 'इस्लामिक NATO' बनाने की पाकिस्तान की महत्वाकांक्षा उसकी अनिर्णय स्थिति और संकट के समय प्रतिबद्धता की कमी के कारण लगभग खत्म हो गई है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में उसकी रणनीतिक योजनाएं भी ध्वस्त होती नजर आ रही हैं।

पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिश की

इस बीच, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की, जिसे ईरान ने ठुकरा दिया। दोनों देशों के बीच पहले से ही अविश्वास का माहौल है, खासकर जनवरी 2025 में ईरान द्वारा बलूचिस्तान में आतंकी ठिकानों पर हमलों के बाद।

आसिम मुनीर अफगानिस्तान के मुद्दों पर आक्रमक रुख अपना सकते हैं

विश्लेषकों का मानना है कि लगातार नीतिगत असफलताओं के बाद अब आसिम मुनीर अफगानिस्तान और आंतरिक सुरक्षा मुद्दों पर आक्रामक रुख अपना सकते हैं। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में पहले से ही बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के साथ संघर्ष जारी है।

सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति और सैन्य नेतृत्व के फैसलों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि सेना प्रमुख कई मामलों में राजनीतिक नेतृत्व से परामर्श किए बिना निर्णय ले रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन हालातों में भारत को भी सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि सीमाओं पर तनाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

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