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Nepal: नेपाल में चुनाव से पहले फिर राजा की वापसी की मांग क्यों? चुनाव से पहले सड़कों पर उतरे राजशाही समर्थक
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Mon, 12 Jan 2026 05:22 AM IST
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सार
Nepal Political Instability: नेपाल में चुनाव से पहले राजशाही समर्थक सड़कों पर उतर आए हैं। काठमांडू में निकली रैली में राजा ज्ञानेंद्र की वापसी की मांग उठी। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था देश को स्थिरता नहीं दे पा रही है। आइए जानते हैं नेपाल पर इसका क्या असर होगा।
नेपाल का झंडा
- फोटो : Google Gemini
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विस्तार
नेपाल में आम चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल एक बार फिर गर्म हो गया है। राजधानी काठमांडो में रविवार को राजशाही समर्थकों ने रैली निकालकर राजा की बहाली की मांग की। यह रैली जेन-जी आंदोलन के बाद अपदस्थ राजा ज्ञानेंद्र विक्रम शाही के समर्थकों की पहली बड़ी सार्वजनिक मौजूदगी मानी जा रही है। मार्च में होने वाले संसदीय चुनावों से पहले इस प्रदर्शन ने नई बहस छेड़ दी है।
राजशाही समर्थकों का कहना है कि जेन-जी आंदोलन और उसके बाद बने हालात ने देश को अस्थिर कर दिया है। सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद अंतरिम सरकार बनी और अब मार्च में चुनाव प्रस्तावित हैं। इसी बीच राजशाही समर्थक सड़कों पर उतरे और दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था देश को स्थिरता नहीं दे पा रही है।
ये भी पढ़ें- आर्कटिक महासागर में रूस-चीन के गठजोड़ से डरा ब्रिटेन, क्या ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे का करेगा समर्थन?
प्रदर्शन में क्या नारे लगे?
रैली में शामिल लोग हम अपने राजा से प्यार करते हैं और राजा को वापस लाओ जैसे नारे लगाते दिखे। प्रदर्शनकारी 18वीं सदी में शाह वंश की नींव रखने वाले पृथ्वी नारायण शाह की मूर्ति के आसपास एकत्र हुए। रविवार को पृथ्वी नारायण शाह की जयंती भी थी, जिसे रैली के लिए प्रतीकात्मक दिन माना गया।
राजशाही समर्थक क्या दलील दे रहे हैं?
पिछला अनुभव और सुरक्षा इंतजाम कैसे रहे?
पिछले वर्षों में ऐसी रैलियों के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुई थीं और हिंसा भी देखी गई थी। इस बार हालांकि रैली शांतिपूर्ण रही। इसके बावजूद दंगा रोधी पुलिस को तैनात रखा गया और पूरे कार्यक्रम पर कड़ी नजर रखी गई। प्रशासन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सतर्क दिखा।
नेपाल में राजशाही कब खत्म हुई?
नेपाल में 2008 में राजशाही खत्म कर देश को गणतंत्र घोषित किया गया था। अंतिम शाह राजा ज्ञानेंद्र को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। अब एक बार फिर राजशाही की मांग उठने से चुनावी राजनीति पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।
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राजशाही समर्थकों का कहना है कि जेन-जी आंदोलन और उसके बाद बने हालात ने देश को अस्थिर कर दिया है। सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद अंतरिम सरकार बनी और अब मार्च में चुनाव प्रस्तावित हैं। इसी बीच राजशाही समर्थक सड़कों पर उतरे और दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था देश को स्थिरता नहीं दे पा रही है।
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प्रदर्शन में क्या नारे लगे?
रैली में शामिल लोग हम अपने राजा से प्यार करते हैं और राजा को वापस लाओ जैसे नारे लगाते दिखे। प्रदर्शनकारी 18वीं सदी में शाह वंश की नींव रखने वाले पृथ्वी नारायण शाह की मूर्ति के आसपास एकत्र हुए। रविवार को पृथ्वी नारायण शाह की जयंती भी थी, जिसे रैली के लिए प्रतीकात्मक दिन माना गया।
राजशाही समर्थक क्या दलील दे रहे हैं?
- प्रदर्शनकारियों का कहना है कि राजशाही ही देश के लिए आखिरी विकल्प है।
- जेन-जी आंदोलन के बाद हालात संभालने में सरकार नाकाम रही है।
- राजनीतिक अस्थिरता और अव्यवस्था बढ़ी है।
- राजा की वापसी से देश में एकता आएगी।
- गणतंत्र व्यवस्था से लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है।
पिछला अनुभव और सुरक्षा इंतजाम कैसे रहे?
पिछले वर्षों में ऐसी रैलियों के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुई थीं और हिंसा भी देखी गई थी। इस बार हालांकि रैली शांतिपूर्ण रही। इसके बावजूद दंगा रोधी पुलिस को तैनात रखा गया और पूरे कार्यक्रम पर कड़ी नजर रखी गई। प्रशासन किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सतर्क दिखा।
नेपाल में राजशाही कब खत्म हुई?
नेपाल में 2008 में राजशाही खत्म कर देश को गणतंत्र घोषित किया गया था। अंतिम शाह राजा ज्ञानेंद्र को गद्दी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। अब एक बार फिर राजशाही की मांग उठने से चुनावी राजनीति पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।
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