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Hindi News ›   Madhya Pradesh ›   Maruti Dealer Fails to Repair Car for Nearly 10 Years: MP Consumer Commission Directs Compensation

Consumer Court: मारुति डीलर 10 साल में भी नहीं ठीक कर सका कार, उपभोक्ता आयोग ने लगाया जुर्माना

Tue, 07 Jul 2026 09:28 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Tue, 07 Jul 2026 09:28 PM IST
सार

मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने मारुति सुजुकी के एक अधिकृत डीलर की अपील खारिज करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग के पुराने आदेश को बरकरार रखा है। मामला एक ऐसी Maruti Ertiga कार से जुड़ा है, जो दुर्घटना के बाद मरम्मत के लिए वर्कशॉप पहुंची,।लेकिन करीब 10 साल बाद भी ग्राहक को पूरी तरह ठीक हालत में वापस नहीं मिल सकी।

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Maruti Dealer Fails to Repair Car for Nearly 10 Years: MP Consumer Commission Directs Compensation
Car Dealer Punishment - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

मध्य प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक मारुति सुसुकी डीलर की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया है। आयोग ने जिला फोरम के उस करीब एक दशक पुराने फैसले को सही ठहराया है, जिसमें एक ऐसे पीड़ित ग्राहक को मुआवजा देने का आदेश दिया गया था। जिसकी दुर्घटनाग्रस्त कार पिछले 10 वर्षों से डीलर के वर्कशॉप में धूल खा रही है। आइए जानते हैं कि आखिर यह पूरा कानूनी मामला क्या है। 

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क्या था पूरा विवाद और गाड़ी वर्कशॉप में क्यों फंसी रही?

यह मामला मध्य प्रदेश के रहने वाले नीरज गुप्ता और मारुति के अधिकृत डीलर के बीच का है। इस लंबे समय से खिंच रहे विवाद के मुख्य घटनाक्रम और अहम बातें ये हैं:

  • हादसा और झूठा आश्वासन:
    नीरज गुप्ता की मारुति अर्टिगा (Maruti Ertiga) कार 1 अप्रैल, 2016 को एक दुर्घटना का शिकार हो गई थी। वे अगले ही दिन अपनी गाड़ी को मरम्मत के लिए मध्य प्रदेश के कटनी में स्थित मारुति के अधिकृत डीलर 'शुभ मोटर्स' के पास ले गए। वर्कशॉप ने उन्हें भरोसा दिलाया कि गाड़ी 20 से 25 दिनों के भीतर पूरी तरह ठीक हो जाएगी। लेकिन कई बार चक्कर काटने और डीलर द्वारा बार-बार समय सीमा बढ़ाए जाने के बावजूद कार कभी ठीक नहीं की गई।

  • जिला उपभोक्ता फोरम का पुराना आदेश:
    परेशान होकर पीड़ित ग्राहक ने जिला उपभोक्ता आयोग, पन्ना का दरवाजा खटखटाया। जनवरी 2017 में जिला फोरम ने डीलर को आदेश दिया कि वह कार को पूरी तरह ठीक करके ग्राहक को सौंपे। इसके साथ ही फोरम ने डीलर को इंजन मरम्मत लागत (अनुमानित 72,500 रुपये) का 50 प्रतिशत और अन्य मरम्मत खर्च ग्राहक से वसूलने, बीमा से मिली राशि को उसमें एडजस्ट करने और ग्राहक को मानसिक प्रताड़ना के लिए 98,000 रुपये का मुआवजा और 3,000 रुपये अदालती खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया था।

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  • डीलर की दलीलें:
    इस आदेश को डीलर ने राज्य आयोग में चुनौती दी। डीलर का तर्क था कि जिला फोरम ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B का उल्लंघन करते हुए एक बिना प्रमाणित ऑडियो रिकॉर्डिंग पर भरोसा किया। डीलर ने कहा कि मरम्मत का काम सर्वे के बाद शुरू हुआ था, इसलिए देरी को सेवा में कमी नहीं माना जा सकता। उनका यह भी कहना था कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि इंजन ग्राहक की मौजूदगी में ही खोला जाए। इसके अलावा, 98,000 रुपये के मुआवजे में से कुछ हिस्सा ग्राहक के 'सिंहस्थ मेले' और एक पारिवारिक शादी में शामिल न हो पाने के नुकसान का था। जिसके लिए कोई टिकट या दस्तावेज नहीं दिखाए गए थे।

  • पीड़ित ग्राहक का पक्ष:
    ग्राहक के वकील ने दलील दी कि रिकॉर्ड में मौजूद जॉब कार्ड साबित करते हैं कि मरम्मत का काम पेंडिंग था। डीलर ने वादा किया था कि इंजन केवल ग्राहक की मौजूदगी में खोला जाएगा, लेकिन पीठ पीछे उसे खोल दिया गया। डीलर कार तैयार होने का दावा तो कर रहा था, लेकिन उसने कभी भी अंतिम मरम्मत बिल पेश नहीं किया। वकील ने इस मामले में एक भावुक पक्ष रखते हुए कहा कि ग्राहक ने यह कार अपनी आजीविका चलाने के लिए टैक्सी के रूप में खरीदी थी। लेकिन वह पिछले करीब 11 साल से डीलर के शोरूम में सड़ रही है। और अब इस अवस्था में वह इसका रजिस्ट्रेशन भी नहीं करा सकते।

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राज्य उपभोक्ता आयोग ने डीलर की अपील पर क्या फैसला सुनाया?

जस्टिस सुनीता यादव (अध्यक्ष) और डॉ. मोनिका मलिक (सदस्य) की पीठ ने पूरे मामले की गहनता से समीक्षा की और डीलर की खिंचाई करते हुए कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  • कार ठीक होने का कोई सबूत नहीं:
    आयोग ने पाया कि डीलर के पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि गाड़ी वास्तव में ठीक हो चुकी थी। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि जिला कमीशन के रिकॉर्ड या इस अपील में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह साबित कर सके कि वाहन को विपक्षी दल (डीलर) द्वारा ठीक किया गया था। भले ही उनकी तरफ से ऐसा दावा किया जा रहा हो।

  • ग्राहक से कोई बातचीत नहीं:
    आयोग ने नोट किया कि डीलर ने ग्राहक को ऐसा कोई पत्र या सूचना नहीं भेजी, जिससे यह साबित हो सके कि कार पूरी तरह तैयार है और डिलीवरी के लिए उपलब्ध है।

  • बिल और खर्चों में भारी विसंगति:
    रिकॉर्ड में दो जॉब कार्ड मौजूद थे और इंजन की मरम्मत का अनुमान 72,500 रुपये था। लेकिन डीलर ने केवल 70,228 रुपये का एक ही बिल पेश किया। इसमें यह भी साफ नहीं था कि इंश्योरेंस सर्वे से कितनी राशि मिली। आयोग ने तल्ख टिप्पणी की कि दुर्घटना के एक दशक बाद भी वास्तविक मरम्मत की स्थिति या देनदारी को लेकर "कोई स्पष्टता नहीं है।" 

क्या ग्राहक को राहत की राशि मिल पाएगी?

अंतिम निर्णय : राज्य आयोग ने माना कि जिला उपभोक्ता फोरम ने डीलर की ओर से सेवा में भारी कमी को देखते हुए नीरज गुप्ता को बिल्कुल सही मुआवजा दिया था और उनके आदेश में कोई कानूनी गलती या अवैधता नहीं है। इसके साथ ही आयोग ने डीलर की अपील को बिना किसी अतिरिक्त अदालती खर्च के खारिज कर दिया। जिससे पीड़ित ग्राहक को मिला पुराना कानूनी संरक्षण और मुआवजा बरकरार रहेगा।

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