Bihar: समस्तीपुर की मिट्टी में आजादी का जुनून, तिरंगे के लिए शहीद हुए 7, अंग्रेजों को उतारनी पड़ी थी खास पलटन
समस्तीपुर की धरती स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष, क्रांतिकारी गतिविधियों और बलिदान की प्रमुख गवाह रही। 1942 की अगस्त क्रांति में दलसिंहसराय थाना पर तिरंगा फहराने की कोशिश में सात क्रांतिकारी शहीद हुए।
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विस्तार
समस्तीपुर जिले का स्वतंत्रता संग्राम इतिहास शौर्य, संघर्ष और बलिदान की ऐसी गाथाओं से भरा है, जिन्हें याद कर आज भी गर्व होता है। दलसिंहसराय, विद्यापतिनगर, पटोरी, सिंघिया, ताजपुर, मोहिउद्दीन नगर और समस्तीपुर शहर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन के प्रमुख केंद्र रहे। 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान दलसिंहसराय थाना पर तिरंगा फहराने की कोशिश में सात क्रांतिकारी अंग्रेजों की गोलियों से शहीद हो गए थे। वहीं जिले के कई इलाकों में आंदोलन इतना व्यापक हुआ कि अंग्रेजी प्रशासन को इसे दबाने के लिए विशेष सैन्य बल तक तैनात करना पड़ा।
दलसिंहसराय में तिरंगे के लिए बरसी थीं अंग्रेजों की गोलियां, सात क्रांतिकारी हुए थे शहीद
समस्तीपुर के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे मार्मिक घटनाओं में 15 अगस्त 1942 का दलसिंहसराय गोलीकांड शामिल है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों का आक्रोश लगातार बढ़ रहा था। 13 अगस्त को छात्रों ने रेलवे स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन कर आंदोलन को नई धार दी। इसके बाद रेलवे और सरकारी प्रतिष्ठानों के खिलाफ विरोध तेज हो गया।
15 अगस्त को बड़ी संख्या में आंदोलनकारी दलसिंहसराय थाना परिसर में तिरंगा फहराने के लिए जुटे। उनका उद्देश्य अंग्रेजी हुकूमत के प्रतीक माने जाने वाले थाने पर तिरंगा फहराकर आजादी का संदेश देना था। आंदोलनकारियों की भीड़ बढ़ती गई और स्थिति तनावपूर्ण हो गई। इसी दौरान ब्रिटिश पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। गोलियों की आवाज से पूरा इलाका दहल उठा और तिरंगे के लिए आगे बढ़े कई आंदोलनकारी शहीद हो गए।
उपलब्ध रिपोर्टों में इस गोलीकांड में सात क्रांतिकारियों के शहीद होने का उल्लेख मिलता है। इनमें परमेश्वरी महतो, दुर्गा पोद्दार, बंगाली दुसाध, जागेश्वर लाल, सरयुग कापर और अनुपम महतो के साथ एक अन्य अज्ञात क्रांतिकारी शामिल बताए जाते हैं। यह घटना बताती है कि उस दौर में तिरंगा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि आजादी की उम्मीद और अंग्रेजी सत्ता को चुनौती का प्रतीक बन चुका था।
विद्यापतिनगर में 1942 से पहले ही तैयार हो रही थी आंदोलन की जमीन
समस्तीपुर की स्वतंत्रता गाथा में विद्यापतिनगर का अध्याय भी महत्वपूर्ण है। यहां अंग्रेजी शासन के खिलाफ राजनीतिक और किसान चेतना 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से कई दशक पहले दिखाई देने लगी थी। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1914 से 1916 के बीच गोपालपुर निवासी नूनू प्रसाद सिंह के नेतृत्व में किसान आंदोलन चला।
नीलहे किसानों की समस्याओं, टैक्स, मालगुजारी और ‘तीन कठिया’ जैसी शोषणकारी व्यवस्थाओं के विरोध ने ग्रामीणों में राजनीतिक चेतना पैदा की। खेतों से उठी यह आवाज धीरे-धीरे अंग्रेजी शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष में बदलने लगी। किसानों को यह समझ आने लगा कि उनकी समस्याओं की जड़ केवल स्थानीय जमींदारी या कर व्यवस्था नहीं, बल्कि वह औपनिवेशिक शासन भी था, जो उनके संसाधनों और अधिकारों पर नियंत्रण बनाए हुए था। यही चेतना आगे चलकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की मजबूत जमीन बनी।
भारत छोड़ो आंदोलन में विद्यापतिनगर ने दिखाया तेवर
जब महात्मा गांधी ने 1942 में ‘करो या मरो’ के आह्वान के साथ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तो विद्यापतिनगर और आसपास के इलाकों में भी आंदोलन तेज हो गया। रेलवे स्टेशन, डाकघर और सरकारी प्रतिष्ठान अंग्रेजी शासन के प्रतीक माने जाने लगे। आंदोलनकारियों ने इन संस्थानों के बहिष्कार और विरोध के जरिए अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती दी। गांवों में गुप्त बैठकें होने लगीं और युवाओं के बीच स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा तेज हो गई।
विद्यापतिनगर में अंग्रेजों को तैनात करनी पड़ी ‘बिहार लाइट हॉर्स पलटन’
आंदोलन की बढ़ती गतिविधियों से ब्रिटिश प्रशासन इतना परेशान हुआ कि उसे विद्यापतिनगर इलाके में ‘बिहार लाइट हॉर्स पलटन’ की विशेष टुकड़ी तैनात करनी पड़ी। इसका उद्देश्य क्रांतिकारी गतिविधियों को दबाना और ग्रामीण इलाकों में अंग्रेजी शासन का दबदबा कायम रखना था। लेकिन सैन्य दबाव भी लोगों के भीतर पैदा हो चुकी आजादी की भावना को दबा नहीं सका।
मऊ गांव बना था क्रांतिकारी गतिविधियों का अहम केंद्र
विद्यापतिनगर का मऊ गांव स्वतंत्रता आंदोलन की स्थानीय कहानी में विशेष स्थान रखता है। यहां के योगी झा का नाम क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ा रहा। उन्होंने अंग्रेजी शासन का विरोध किया और आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। मऊ में योगी झा, रामदेव सिंह, रामेश्वर सिंह, पहलवान राघो सिंह और रामगोविंद सिंह जैसे लोगों के बीच भी क्रांतिकारी विचारों का प्रसार हुआ। स्थानीय विवरणों में चंद्रशेखर आजाद और योगेंद्र शुक्ल जैसे क्रांतिकारियों के इस क्षेत्र से संपर्क का उल्लेख मिलता है।
वारिसनगर के कसौर गांव के गया प्रसाद सिंह, गोपालपुर गांव के रामखेलावन भगत और हरपुर बोचहा के मैथिली शरण सिंह समेत कई लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय विद्यापतिनगर का ग्रामीण क्षेत्र केवल स्थानीय विरोध का केंद्र नहीं था, बल्कि क्रांतिकारी विचारों के प्रसार और संगठन का भी महत्वपूर्ण स्थान बन चुका था।
धरणीधर बाबू का गांधीजी के आंदोलन से जुड़ा था नाता
विद्यापतिनगर के सिमरी गांव के अधिवक्ता बाबू धरणीधर प्रसाद का नाम स्वतंत्रता आंदोलन के राष्ट्रीय अध्याय से जुड़ा हुआ है। वे चंपारण सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के सहयोगियों में शामिल रहे। चंपारण आंदोलन ने बिहार में अंग्रेजी शासन के खिलाफ किसानों की आवाज को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। विद्यापतिनगर क्षेत्र के लोगों का इस आंदोलन से जुड़ना इस बात का संकेत था कि यहां राजनीतिक चेतना केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं थी।
शिक्षकों और युवाओं ने भी संभाली आंदोलन की कमान
विद्यापतिनगर के बढ़ौना और सिमरी समेत कई गांवों के लोगों ने अंग्रेजी शासन का विरोध किया। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, बढ़ौना के शिक्षक देवेंद्र ठाकुर और सिमरी के जयनंदन महतो को राजनीतिक गतिविधियों के कारण अंग्रेजी शासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। उन्हें जेल और आर्थिक दंड की सजा दी गई। वहीं मऊ के शिक्षाविद् सूर्यनारायण सिंह युवाओं के बीच राजनीतिक चेतना पैदा करने और उन्हें आंदोलन की रणनीति से जोड़ने में सक्रिय रहे। उस दौर में ये शिक्षक केवल कक्षा तक सीमित नहीं थे। वे गांवों में राजनीतिक चेतना फैलाने, युवाओं को संगठित करने और लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।
विद्यापतिनगर से दलसिंहसराय तक फैली थी आंदोलन की लहर
विद्यापतिनगर और दलसिंहसराय की घटनाओं को अलग-अलग करके देखना उस दौर की तस्वीर को अधूरा कर देगा। दोनों इलाकों में रेलवे और सरकारी प्रतिष्ठान आंदोलन के केंद्र बने। ग्रामीण इलाकों से लोग निकलकर अंग्रेजी शासन के प्रतीकों को चुनौती देने लगे। विद्यापतिनगर में जहां अंग्रेजों को सैन्य टुकड़ी तैनात करनी पड़ी, वहीं कुछ ही दूरी पर दलसिंहसराय में तिरंगा फहराने पहुंचे आंदोलनकारियों पर गोलियां चला दी गईं। यह पूरा इलाका 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ उठे उस जनज्वार का हिस्सा था, जिसमें आम लोग बड़ी संख्या में सीधे औपनिवेशिक सत्ता के सामने खड़े दिखाई दिए।
पटोरी का चंद्र भवन बना था क्रांतिकारियों का गुप्त ठिकाना
समस्तीपुर की आजादी की कहानी में पटोरी का चंद्र भवन भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह स्थान क्रांतिकारी गतिविधियों और गुप्त बैठकों से जुड़ा रहा। जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरणों में चंद्र भवन का संबंध शहीद-ए-आजम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और बटुकेश्वर दत्त जैसे क्रांतिकारियों से बताया गया है।
भवन और उसके परिसर में मौजूद सुरंगों को क्रांतिकारियों के गुप्त आवागमन और गतिविधियों की स्मृतियों से जोड़ा जाता है। ब्रिटिश पुलिस को जब क्रांतिकारियों के यहां मौजूद होने की भनक लगती थी तो उनकी तलाश शुरू हो जाती थी। ऐसे समय में स्थानीय क्रांतिकारी टी. परमानंद ने गुप्त ठिकानों में रखकर इन क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की नजर से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सिंघिया में क्रांतिवीरों ने थाना भवन पर तीन महीने तक फहराया तिरंगा
अगस्त क्रांति की लपटें समस्तीपुर के सिंघिया तक भी पहुंची थीं। यहां आंदोलनकारियों ने थाने पर तिरंगा फहराकर अंग्रेजी शासन को सीधी चुनौती दी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 18 अगस्त से 11 नवंबर 1942 तक सिंघिया थाना जनता के नियंत्रण में रहा। यह घटना बताती है कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान समस्तीपुर के कई इलाकों में कुछ समय के लिए अंग्रेजी प्रशासन की पकड़ कमजोर पड़ गई थी। वहीं रोसड़ा क्षेत्र में भी रेलवे स्टेशन, डाकघर और अन्य सरकारी संस्थानों पर आंदोलनकारियों ने विरोध दर्ज कराया। इस तरह जिले के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन की गतिविधियां एक साथ आगे बढ़ती रहीं।
वैनी का खादी भंडार था स्वतंत्रता सेनानियों का अहम केंद्र
समस्तीपुर के पूसा रोड स्थित वैनी का खादी भंडार भी स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। वहां अखिल भारतीय चरखा संघ का कार्यालय हुआ करता था। खादी उस दौर में महज कपड़ा नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक थी। चरखा और खादी के जरिए लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का काम किया गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद समेत कई राष्ट्रीय नेताओं के इस क्षेत्र से जुड़ाव ने भी स्थानीय आंदोलन को व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में मदद की।
मोहिउद्दीन नगर के नायकों की गाथाएं सुनकर दिल गर्व से भर जाता है
ऐतिहासिक अभिलेखों में उल्लेख है कि वर्ष 1921 में मोहिउद्दीन नगर के रामविलास तिवारी और रामकिसुन चौधरी ने असहयोग आंदोलन के लिए पूरे भारत की यात्रा की थी। 8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दरबारी सिंह ने मोहिउद्दीन नगर थाने पर तिरंगा फहराया और क्षेत्रीय स्वतंत्रता की घोषणा की। 16 सितंबर 1942 को कल्याणपुर बस्ती के स्वतंत्रता सेनानी श्याम किशोर राय और राम उचित राय को अंग्रेजों ने अगस्त क्रांति के दौरान गिरफ्तार कर लिया और सात वर्ष की कठोर सजा सुनाई। विभिन्न जेलों में रखने के बाद उन्हें 17 अप्रैल 1946 को जेल से रिहा किया गया। इसके अलावा, उसी गांव के रामलगन राय ने भी 1942 के आंदोलन में भाग लिया। क्षेत्र के क्रांतिकारी दरबारी सिंह, भगवत प्रसाद सिंह, सत्यनारायण प्रसाद सिंह, राम जी गहरा और बांके बिहारी समेत सैकड़ों क्रांतिकारियों की मौजूदगी में मोहिउद्दीन नगर हाई स्कूल में एक बैठक आयोजित की गई थी। तत्कालीन थानाध्यक्ष गोरख प्रसाद सिंह को क्रांतिकारियों की बैठक की जानकारी मिली। उन्होंने क्रांतिकारियों का दमन करने की काफी कोशिश की, लेकिन क्रांतिकारियों का हौसला बुलंद था। बैठक में मौजूद क्रांतिकारियों ने निर्णय लिया कि पहला झंडा मोहिउद्दीन नगर थाने पर ही फहराया जाएगा।
सिर्फ बड़े नेताओं की नहीं, गांव के सामान्य लोगों की भी थी यह लड़ाई
समस्तीपुर के स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें केवल प्रसिद्ध नेताओं या क्रांतिकारियों की भूमिका नहीं थी। किसान, मजदूर, शिक्षक, छात्र, दुकानदार और ग्रामीण महिलाएं तक अलग-अलग रूप में आंदोलन से जुड़ीं। किसी ने जुलूस निकाला, किसी ने सरकारी संस्थानों का बहिष्कार किया, किसी ने क्रांतिकारियों को छिपने की जगह दी तो किसी ने जेल जाकर अंग्रेजों की यातनाएं सहीं। कई ऐसे नाम भी हैं जो इतिहास की मुख्यधारा में दर्ज नहीं हो सके, लेकिन स्थानीय स्मृतियों में आज भी उनके संघर्ष की कहानियां सुनाई जाती हैं।
शहादत से लेकर गुप्त बैठकों तक, हर कदम पर दिखा साहस
समस्तीपुर की स्वतंत्रता गाथा में एक तरफ दलसिंहसराय का वह दृश्य है, जहां तिरंगे के लिए सात क्रांतिकारियों ने जान गंवाई, तो दूसरी तरफ विद्यापतिनगर के गांव हैं, जहां वर्षों पहले किसान अंग्रेजी व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठा चुके थे।
एक तरफ पटोरी का चंद्र भवन है, जहां क्रांतिकारी गुप्त रणनीति बनाते थे, तो दूसरी तरफ वैनी का खादी भंडार है, जहां चरखे और खादी के जरिए राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया गया। सिंघिया में थाना पर तिरंगा फहराने के बाद तीन महीने तक नियंत्रण बनाए रखने की घटना हो या विद्यापतिनगर में अंग्रेजों को विशेष पलटन तैनात करने के लिए मजबूर करना—हर घटना इस बात की गवाही देती है कि समस्तीपुर की धरती पर आजादी की लड़ाई कितनी व्यापक थी।
आज भी गांवों की मिट्टी में जिंदा है आजादी की वह कहानी
आजादी के 79 वर्ष बाद जब देश स्वतंत्रता दिवस के मौके पर तिरंगे को सलाम करता है, तब समस्तीपुर की धरती अपने उन वीरों को याद करती है जिन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना देखा था। दलसिंहसराय के शहीदों का बलिदान, विद्यापतिनगर के किसानों और युवाओं का संघर्ष, मऊ के क्रांतिकारियों की गतिविधियां, सिमरी के धरणीधर बाबू का योगदान, पटोरी के चंद्र भवन की गुप्त कहानियां और वैनी के खादी भंडार की राष्ट्रीय चेतना—ये सभी मिलकर समस्तीपुर की आजादी की पूरी तस्वीर बनाते हैं। यह कहानी सिर्फ इतिहास की किताबों में दर्ज तारीखों की नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने से इनकार किया। किसी ने जेल की सलाखों के पीछे रहकर आजादी का सपना जिया, किसी ने आर्थिक दंड सहा और किसी ने तिरंगे की खातिर अपनी जान दे दी।