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Bihar News: 'खाली घर, सूने आंगन', बिहार के इस गांव से गायब हो गए मर्द, सिर्फ महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे बचे

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गयाजी Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Sat, 11 Apr 2026 11:15 AM IST
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सार

बाराचट्टी थाना क्षेत्र का गोही गांव आज पलायन की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। करीब 1000–1200 की आबादी वाले इस गांव में अब सिर्फ 10 फीसदी लोग ही बचे हैं, जबकि 90 फीसदी पुरुष रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में चले गए हैं।

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गया का गोही बना मजबूरी और पलायन की कहानी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

बिहार के गयाजी जिले के बाराचट्टी थाना क्षेत्र का गोही गांव आज पलायन की मार झेल रहा है। रोजगार की तलाश में लगभग सभी पुरुष गांव छोड़ चुके हैं, जिसके कारण दिन में भी यहां सन्नाटा पसरा रहता है। गांव में अब सिर्फ महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे ही नजर आते हैं, जो संघर्ष भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
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 गयाजी जिले के बाराचट्टी थाना क्षेत्र स्थित गोही गांव की स्थिति विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रही है। करीब 1000 से 1200 की आबादी वाले इस गांव में अब केवल 10 फीसदी लोग ही रह गए हैं। गांव के लगभग सभी युवा और कामकाजी पुरुष रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं।
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ग्रामीण बताते हैं कि गांव में रोजगार के साधनों की कमी सबसे बड़ी समस्या है। पहले खेती ही मुख्य आजीविका थी, लेकिन अब सिंचाई की कोई ठोस व्यवस्था नहीं होने के कारण खेती करना मुश्किल हो गया है। पहले समय पर बारिश हो जाती थी, जिससे किसी तरह गुजारा हो जाता था। साथ ही आसपास के जंगल भी ग्रामीणों के लिए सहारा थे।

आजीविका का दूसरा सहारा भी छिना

पहले लोग जंगल से लकड़ी और जड़ी-बूटियां इकट्ठा कर बाजार में बेचते थे, जिससे उनकी आजीविका चलती थी। लेकिन अब जंगल धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं, जिससे यह सहारा भी खत्म हो गया है। ऐसे में युवाओं के पास गांव में कोई रोजगार का विकल्प नहीं बचा।

दिल्ली-पंजाब समेत कई राज्यों में मजदूरी को मजबूर

मजबूरी में गांव के लोग दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और मुंबई जैसे शहरों में मजदूरी या छोटे-मोटे काम करने के लिए जा रहे हैं। ग्रामीण कृष्ण सिंह भोक्ता बताते हैं कि लोग 5-6 महीने बाहर रहकर काम करते हैं और फिर कुछ दिनों के लिए गांव लौटते हैं। गांव में बची महिलाएं अब घर और खेत दोनों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। बुजुर्गों और बच्चों की देखभाल भी उन्हीं के जिम्मे है। त्योहारों के समय ही कुछ पुरुष गांव लौटते हैं, जिससे थोड़ी रौनक दिखती है, अन्यथा गांव में सन्नाटा ही रहता है।

विकलांग बेटा भी कर रहा मजदूरी

बसंती देवी बताती हैं कि उनके दोनों बेटे कमाने के लिए बाहर चले गए हैं। वह खुद बहू के साथ जंगल से लकड़ी लाकर घर चला रही हैं। उन्होंने बताया कि उनका एक बेटा विकलांग होने के बावजूद मुंबई में मजदूरी कर परिवार का पेट पाल रहा है। दोनों बेटे 4-5 महीने बाहर रहकर कमाते हैं और फिर कुछ समय के लिए गांव लौटते हैं।

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समाजसेवी हरेंद्र सिंह भोक्ता के अनुसार, गांव में लोगों के पास जमीन तो है, लेकिन सिंचाई की व्यवस्था नहीं है। गांव के पास एक नाला है, जहां पुल नहीं होने से आवाजाही में दिक्कत होती है। दो साल पहले इसी नाले में डूबकर दो बच्चों की मौत भी हो चुकी है। शिक्षा की सीमित व्यवस्था है और स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग नदारद हैं। नजदीकी अस्पताल 8 से 10 किलोमीटर दूर है।

धीरे-धीरे खाली होता जा रहा गांव

इन सभी समस्याओं के कारण गांव के करीब 90 फीसदी लोग मुंबई, चेन्नई, गुजरात, सूरत, बेंगलुरु, पंजाब और दिल्ली जैसे शहरों में काम करने को मजबूर हैं। त्योहारों को छोड़कर गांव में सिर्फ महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग ही नजर आते हैं। गोही गांव की यह स्थिति साफ बताती है कि अगर गांवों में रोजगार और बुनियादी सुविधाएं नहीं बढ़ाई गईं, तो ऐसे कई गांव धीरे-धीरे पूरी तरह खाली हो जाएंगे।
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