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Bihar: पद्मश्री डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का निधन, 96 वर्ष में ली अंतिम सांस; सीएम सम्राट चौधरी ने जताया शोक
Tue, 12 May 2026 07:45 PM IST
तिरहुत-मुजफ्फरपुर ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरपुर
Published by: तिरहुत-मुजफ्फरपुर ब्यूरो
Updated Tue, 12 May 2026 07:45 PM IST
सार
Bihar News: पद्मश्री सम्मानित कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का 96 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने बिहार में लीची, मखाना और मक्का खेती में वैज्ञानिक तकनीकों से क्रांतिकारी बदलाव लाए। उनके निधन से कृषि जगत में शोक की लहर है।
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पद्मश्री डॉ गोपालजी त्रिवेदी का निधन
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
बिहार के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और हाल ही में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का मंगलवार को निधन हो गया। वह 96 वर्ष के थे और पिछले कुछ दिनों से सांस संबंधी बीमारी से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर मिलते ही परिवार, शुभचिंतकों और कृषि जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
जनवरी में पद्मश्री से हुए थे सम्मानित
डॉ. त्रिवेदी को इसी वर्ष जनवरी 2026 में भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा था। उन्हें बिहार में वैज्ञानिक खेती, लीची और मखाना उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले अग्रणी कृषि वैज्ञानिकों में गिना जाता है। जानकारी के अनुसार, उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव मतलुपुर लाया जाएगा, जहां पूरे राजकीय सम्मान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
लीची और मखाना खेती को दिलाई नई पहचान
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने बिहार की पारंपरिक खेती को वैज्ञानिक आधार देने में अहम भूमिका निभाई। विशेष रूप से लीची के पुराने बागानों में ‘कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक को अपनाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। इस तकनीक से पुराने पेड़ों की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और किसानों की आय में बड़ा सुधार आया। इसके अलावा जलजमाव वाले क्षेत्रों में मखाना की खेती को बढ़ावा देने और शीतकालीन मक्का उत्पादन को नई दिशा देने में भी उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। उनके प्रयासों की बदौलत बिहार आज मक्का उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है।
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संघर्षों से भरी रही जीवन यात्रा
15 फरवरी 1930 को मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड स्थित मतलुपुर गांव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. त्रिवेदी का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पिता के निधन के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़कर खेती का जिम्मा संभालना पड़ा, लेकिन मां की प्रेरणा और स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी के मार्गदर्शन ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। गणित विषय में मेधावी रहे डॉ. त्रिवेदी ने पोस्टकार्ड पर आवेदन भेजकर कृषि विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। बाद में स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद तक का सफर तय किया।
ये भी पढ़ें- Bihar : सीएम सम्राट चौधरी का बिहार के प्राइवेट स्कूलों को फरमान- यह बातें नहीं मानी तो कड़ी कार्रवाई तय
सीएम सम्राट चौधरी ने जताया शोक
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने डॉ. गोपालजी त्रिवेदी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि- पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी जी के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद है। कृषि अनुसंधान, वैज्ञानिक खेती और किसानों के उत्थान के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। बिहार में लीची, मखाना एवं कृषि विकास को नई पहचान दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति और शोकाकुल परिवार को दुख सहने की शक्ति देने की प्रार्थना की।
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जनवरी में पद्मश्री से हुए थे सम्मानित
डॉ. त्रिवेदी को इसी वर्ष जनवरी 2026 में भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा था। उन्हें बिहार में वैज्ञानिक खेती, लीची और मखाना उत्पादन में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाले अग्रणी कृषि वैज्ञानिकों में गिना जाता है। जानकारी के अनुसार, उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव मतलुपुर लाया जाएगा, जहां पूरे राजकीय सम्मान और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।
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लीची और मखाना खेती को दिलाई नई पहचान
डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने बिहार की पारंपरिक खेती को वैज्ञानिक आधार देने में अहम भूमिका निभाई। विशेष रूप से लीची के पुराने बागानों में ‘कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक को अपनाने और लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। इस तकनीक से पुराने पेड़ों की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और किसानों की आय में बड़ा सुधार आया। इसके अलावा जलजमाव वाले क्षेत्रों में मखाना की खेती को बढ़ावा देने और शीतकालीन मक्का उत्पादन को नई दिशा देने में भी उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। उनके प्रयासों की बदौलत बिहार आज मक्का उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है।
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संघर्षों से भरी रही जीवन यात्रा
15 फरवरी 1930 को मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंड स्थित मतलुपुर गांव के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. त्रिवेदी का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पिता के निधन के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़कर खेती का जिम्मा संभालना पड़ा, लेकिन मां की प्रेरणा और स्वतंत्रता सेनानी यमुना कार्जी के मार्गदर्शन ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। गणित विषय में मेधावी रहे डॉ. त्रिवेदी ने पोस्टकार्ड पर आवेदन भेजकर कृषि विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। बाद में स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद तक का सफर तय किया।
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सीएम सम्राट चौधरी ने जताया शोक
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने डॉ. गोपालजी त्रिवेदी के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि- पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपाल जी त्रिवेदी जी के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद है। कृषि अनुसंधान, वैज्ञानिक खेती और किसानों के उत्थान के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। बिहार में लीची, मखाना एवं कृषि विकास को नई पहचान दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति और शोकाकुल परिवार को दुख सहने की शक्ति देने की प्रार्थना की।