Bihar News: अमृत योग में धूमधाम से मनाई जा रही विश्वकर्मा पूजा; कहीं प्रतिमा स्थापना तो कहीं मेला का भी आयोजन
Bihar: विश्वकर्मा पूजा को लेकर सुबह से बाजारों में लोग पूजा-पाठ की सामग्री खरीदते दिखे। दोपहर बाद औद्योगिक इकाइयों, फैक्ट्रियों, ऑटोमोबाइल वर्कशॉप्स और इंजीनियरिंग संस्थानों में कामकाज ठप रहा। व्यवसायिकों वाहनों का परिचालन भी न के बराबर रहा।
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इस बार अमृत योग में धूमधाम से विश्वकर्मा पूजा मनाई जा रही है। भगवान विश्वकर्मा के जन्मोत्सव पर औद्योगिक इकाइयों, फैक्ट्रियों, ऑटोमोबाइल वर्कशॉप्स और इंजीनियरिंग संस्थानों में विशेष रूप से प्रतिमा स्थापित कर भव्य पूजा की जा रही है। घरों, दफ्तरों एवं व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में भी मशीनों को सुबह से ही साफ कर सजाया गया और विधिवत पूजा की गई। बिहार में दोपहर बाद सड़कों पर बसों और ट्रकों का परिचालन भी पूजा की वजह से न के बराबर रहा। लोग वाहनों की सफाई कर पूजा करते दिखे।सुपौल जिले के वीरपुर स्थित जल संसाधन विभाग के कोसी परियोजना में धूमधाम से पूजा-अर्चना की गई।
वहीं कटैया हाइड्रो इलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट में भी भव्य आयोजन किया गया। जहां मेले का भी आयोजन हो रहा है। इसमें वीरपुर के अलावा नेपाल से भी बड़ी संख्या में लोग जुटे हैं। इसके अलावा इंजीनियरिंग कॉलेज और आईटीआई कॉलेज में भी संयंत्रों की पूजा-अर्चना की गई। कोसी-सीमांचल के अन्य जिलों में भी इसी प्रकार पूजा को लेकर लोगों में उत्साह दिखा। पूजा को लेकर तीन विशेष मुहुर्त थे। इसमें पहला मुहूर्त प्रात: 05:55 से 07:24, दूसरा 08:56 से दोपहर 01:32 और तीसरा मुहूर्त 03:04 बजे से 06:05 बजे तक था। इस वर्ष इंदिरा एकादशी व्रत होने की वजह से विशिष्ट योगों में पूजा करने से साधकों को अमृत योग की प्राप्ति हुई।
'देव शिल्पी हैं विश्वकर्मा, इसलिए शिल्पकारों के आराध्य'
तंत्राचार्य पंडित अरुण कुमार झा उर्फ मुन्ना झा बताते हैं कि भगवान विश्वकर्मा निर्माण तत्व के देवता हैं। धर्म शास्त्र, पुराण, ग्रंथ और उपनिषदों में इन्हें शिल्पकार माना गया है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा के पास अनेक प्रकार के ज्ञान-विज्ञान के विशिष्ट भंडार हैं। इस कारण वे न केवल मनुष्य, बल्कि देवताओं द्वारा भी पूजे जाते हैं। स्वर्ग, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, महादेव का त्रिषुल, दानवीर कर्ण का कवच कुंडल भी भगवान विश्वकर्मा की ही रचना है। उन्हें देव शिल्पी कहा गया है। धरती पर कई देव स्थलों का निर्माण भी उन्होंने ही किया है। जिसमें झारखंड के देवघर की चर्चा सबसे प्रमुख है। द्वापर में उन्होंने द्वारिका का निर्माण किया। रामसेतु के निर्माण में भले ही नल-नील का नाम आता हो, लेकिन वास्तव में उसके रचयिता भी विश्वकर्मा ही हैं। यही कारण है किसी भी शिल्प कला से जुड़े लोग विशेष तौर पर भगवान विश्वकर्मा को अपना आराध्य मानते हैं।
'अश्विन कृष्ण संक्रांति को विश्वकर्मा जयंती'
तंत्राचार्य पंडित अरुण कुमार झा उर्फ मुन्ना झा बताते हैं कि 14 फरवरी को मकर संक्रांति और 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा का अक्सर आयोजन होता है। लेकिन यह महज संयोग है। क्योंकि, हिंदू कैलेंडर के अनुसार, सूर्य के मकर राशि में प्रवेश पर संक्रांति मनाई जाती है, जो अक्सर 14 या 15 फरवरी को होता है। इसी प्रकार हिंदू कैलेंडर में अश्विन कृष्ण संक्रांति को विश्वकर्मा जयंती बताई गई है। संयोगवश अक्सर यह 17 सितंबर को होता है, लेकिन कई बार तारीख बदलती भी है। आम जीवन में लोग इसाई कैलेंडर की तारीख से कामकाज करते हैं। लेकिन हिंदू-पर्व त्यौहार अपने ही कैलेंडर से संचालित होते हैं।