Bihar: महज 13 साल की उम्र में देश के लिए दी जान, 84 साल बाद भी यादों में जिंदा हैं बाल शहीद ध्रुव कुंडू
पूर्णिया के 13 वर्षीय अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू को उनकी शहादत की 84वीं बरसी पर श्रद्धा से याद किया गया। 13 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश पुलिस की गोलीबारी में वह शहीद हुए थे। इस दौरान ध्रुव उद्यान में उनकी प्रतिमा और स्थायी जानकारी-पट्ट लगाने की मांग उठी।
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1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले पूर्णिया के अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की शहादत को आज क्षेत्र के लोगों ने श्रद्धा और सम्मान के साथ याद किया। 13 अगस्त 1942 को ब्रिटिश पुलिस की अंधाधुंध गोलीबारी में महज 13 वर्ष की अल्पायु में ध्रुव कुंडू शहीद हो गए थे। इतनी कम उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए दिए गए उनके ऐतिहासिक बलिदान को आज भी पूर्णिया और आसपास के लोग बेहद गर्व और असीम श्रद्धा के साथ याद करते हैं।
अमर शहीद की याद में आयोजित कार्यक्रम और परिचर्चा के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी शौर्य राय ने कहा कि ध्रुव कुंडू पूर्णिया अंचल के उन महान और वीर सपूतों में अग्रणी हैं, जिन्होंने भारत माता की स्वाधीनता के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
सामूहिक जिम्मेदारी समझें
उन्होंने कहा कि स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों की स्मृतियों को जीवित रखना केवल 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) या 26 जनवरी जैसे विशिष्ट अवसरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आने वाली युवा पीढ़ियों को अपने क्षेत्र के वीरों के संघर्ष, देशभक्ति और बलिदान से निरंतर परिचित कराना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
स्थानीय लोगों ने उठाई ये मांग
इस अवसर पर स्थानीय निवासियों और युवाओं की ओर से शहर के प्रसिद्ध ध्रुव उद्यान पार्क में अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की भव्य प्रतिमा, स्मारिका अथवा एक स्थायी जानकारी-पट्ट (इन्फॉर्मेशन बोर्ड) स्थापित करने की मांग जोर-शोर से उठाई गई। लोगों का कहना है कि पार्क में प्रतिदिन बड़ी संख्या में शहरवासी और बच्चे आते हैं। यदि वहां उनकी प्रतिमा और जीवन-वृत्तांत दर्ज होगा, तो आने वाली पीढ़ी को उनके गौरवशाली जीवन और शहादत के बारे में सही जानकारी मिल सकेगी।
शोधार्थी शौर्य राय ने आगे कहा कि पूर्णिया और सीमांचल क्षेत्र के जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया है, उन्हें इतिहास और सार्वजनिक स्मृति में उनका वाजिब स्थान मिलना चाहिए। स्थानीय इतिहास और नायकों को संजोने से न केवल क्षेत्रीय पहचान मजबूत होती है, बल्कि युवाओं में देशप्रेम की भावना भी बलवती होती है।

धुव्र कुंडु का फाइल फोटो।