भोजपुरी का शेक्सपीयर: भिखारी ठाकुर की कला और संदेश आज भी प्रसांगिक, विरासत व वर्तमान की उपेक्षा पर उठ रहे सवाल
भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की जयंती पर उनकी गौरवशाली विरासत, वर्तमान उपेक्षा और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा जरूरी हो गई है। लोकनाट्य के जरिए समाज को नई दिशा देने वाले भिखारी ठाकुर को आज भी सम्मान तो मिल रहा है, लेकिन उनकी कला, भाषा और विचारों को संरक्षित करने के लिए ठोस पहल का अभाव बना हुआ है।
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भिखारी ठाकुर ने अपने जीवनकाल में ही कह दिया था कि “अबही नाम भइल बा थोर, जब ई तन छुटि जाई मोर।” आज उनकी यह पंक्ति सच साबित होती दिख रही है। निधन के बाद उन्हें सम्मान तो मिला, लेकिन वह अधिकतर प्रतीकात्मक ही रहा। सवाल यह है कि क्या हम भिखारी ठाकुर को केवल मंचीय श्रद्धांजलि तक सीमित रखेंगे, या उनकी विरासत को जीवित भी रखेंगे?
भोजपुरी लोक संस्कृति के आकाश में जिन चुनिंदा नक्षत्रों ने सदियों तक अपनी रोशनी बिखेरी, उनमें भिखारी ठाकुर का नाम सबसे अग्रणी है। उन्हें यूं ही ‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ नहीं कहा जाता। नाटककार, गीतकार, कवि, निर्देशक, अभिनेता, संगीतज्ञ और समाज सुधारक के रूप में उन्होंने भोजपुरी भाषा और समाज को ऐसी पहचान दी, जो आज भी गांव की गलियों से लेकर देश-विदेश तक गूंजती है। भिखारी ठाकुर केवल कलाकार नहीं, बल्कि एक युगपुरुष थे, जिनकी रचनाएं समाज का आईना और जिनका जीवन संघर्ष, साधना व सृजन की मिसाल रहा।
हालांकि, वर्षों से आरा से छपरा के बीच उनके नाम पर रेल या सड़क मार्ग, गंगा-सरयू पर पुल विस्तार जैसी जनभावनाएं केवल मांग बनकर रह गई हैं। भाषणों में वादे हुए, लेकिन धरातल पर सन्नाटा पसरा है।
अतीत: ‘गुदरी के लाल’ से कालजयी कलाकार तक
भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर 1887 को सारण जिले के कुतुबपुर दियारा गांव में पिता दलसिंगार ठाकुर और माता शिवकली देवी के घर एक नाई परिवार में हुआ। साधारण परिवार में जन्मे भिखारी ठाकुर बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनी थे। आजीविका के लिए उन्होंने नाई का काम किया, गृहस्थी संभाली, लेकिन लोककला और संगीत के प्रति लगाव उन्हें पश्चिम बंगाल के खड़गपुर (मेदनीपुर) तक ले गया। वहां रामलीला और रासलीला देखकर उनके मन में लोकनाट्य के माध्यम से समाज से संवाद स्थापित करने का विचार अंकुरित हुआ।
समाज की ज्वलंत समस्याओं को मंच पर किया जीवंत
गांव लौटकर उन्होंने स्थानीय कलाकारों को जोड़कर नाच पार्टी बनाई और अपनी लिखी रासलीला से मंचन की शुरुआत की। जल्द ही उनकी रचनाएं गांव से शहरों तक फैल गईं। ‘बिदेसिया’, ‘बेटी-वियोग’, ‘विधवा विलाप’, ‘भाई-विरोध’, ‘गबर-घिचोर’, ‘ननद-भौजाई’ और ‘कलियुग-प्रेम’ जैसे नाटकों में प्रवासी मजदूरों का दर्द, स्त्रियों की पीड़ा, पारिवारिक विघटन और सामाजिक कुरीतियां प्रमुख विषय रहीं। उन्होंने मनोरंजन के साथ समाज सुधार का दायित्व भी निभाया।
‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ और ‘अनगढ़ हीरा’
उनकी नाच मंडली की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिना माइक उनकी गायकी दूर-दूर तक सुनाई देती थी। छपरहिया तान, पूरबी, निर्गुण और सोहर जैसी लोकशैलियों पर उनकी पकड़ अद्वितीय थी। सफेद धोती-कुर्ता, सिर पर मुरेठा और सादगी—यही उनकी पहचान थी। मंच पर उनका व्यक्तित्व ऐसा होता मानो स्वयं सरस्वती विराजमान हों। भोजपुर और सारण क्षेत्र में उन्हें सम्मान से ‘मालिक जी’ कहा जाता था। प्रसिद्ध विद्वान राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें ‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ और ‘अनगढ़ हीरा’ की उपाधि दी। 10 जुलाई 1971 को 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी कला अमर हो गई।
सम्मान मिला, पर उपेक्षा बरकरार
आज भिखारी ठाकुर का नाम देश-विदेश में भोजपुरी भाषियों की जुबान पर है। जयंती-पुण्यतिथि पर मंच सजते हैं, भाषण होते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। कुतुबपुर गांव में उनका पैतृक घर आज भी जर्जर अवस्था में है। मिट्टी-खपड़ैल का वह मकान, जहां भोजपुरी लोकनाट्य का इतिहास रचा गया, सरकारी उपेक्षा का शिकार है। इंदिरा आवास के तहत बने एक-दो कमरों के अलावा उनके जीवन और संघर्ष को सहेजने वाला कोई स्थायी स्मारक नहीं है।
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‘भोजपुरी सपूत सम्मान’ और अधूरी पहल
वर्ष 2002 में आयोजित भिखारी ठाकुर लोक साहित्य एवं संस्कृति महोत्सव में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उन्हें ‘भोजपुरी सपूत सम्मान’ से नवाजा था। मंच पर बड़े नेता मौजूद थे, लेकिन इसके बाद न उनके घर का समुचित जीर्णोद्धार हुआ और न भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की ठोस पहल। आज भी भोजपुरी संविधान की आठवीं अनुसूची से बाहर है, जबकि करोड़ों लोग इसे मातृभाषा मानते हैं। भिखारी ठाकुर जैसे महापुरुष के नाम पर न कोई राष्ट्रीय संस्थान है, न स्थायी अकादमी और न ही व्यापक शोध केंद्र।
आगे की राह
आज भिखारी ठाकुर जयंती पर संकल्प लेने की जरूरत है कि उनके नाम का उपयोग राजनीति के लिए नहीं, बल्कि उनकी सोच को समाज और भाषा के उत्थान के लिए किया जाए। उनके नाटकों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, जीवन पर शोध हो, कुतुबपुर गांव को सांस्कृतिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाए और भोजपुरी को उसका संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए गंभीर प्रयास हों। भिखारी ठाकुर अतीत की स्मृति भर नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतावनी और भविष्य की प्रेरणा हैं। उनकी उपेक्षा केवल एक महान कलाकार की नहीं, पूरी भोजपुरी संस्कृति की हार होगी।
(इनपुट- धर्मेंद्र रस्तोगी, सारण)