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इतिहास के सबसे भीषण नरसंहार की कहानी, जब महज 100 दिन में मारे गए थे आठ लाख लोग

फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Thu, 24 Sep 2020 10:48 AM IST
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Rwanda genocide also known as the genocide against the Tutsi Story of 100 days of slaughter
न्यामता नरसंहार स्मारक में रखी लोगों की खोपड़ियां, रवांडा - फोटो : Social media

विश्व इतिहास में ऐसे बहुत सारे नरसंहार हुए हैं, जिन्हें शायद ही कभी भुलाया जा सके। एक ऐसा ही नरसंहार आज से करीब 25 साल पहले हुआ था, जिसके बारे में कहा जाता है कि महज 100 दिनों तक चले उस भीषण नरसंहार में एक-दो नहीं बल्कि करीब आठ लाख लोग मारे गए थे। इसे इतिहास का सबसे भीषण नरसंहार कहें तो गलत नहीं होगा। इस नरसंहार की शुरुआत की कहानी भी दिल दहला देने वाली है। तो चलिए जानते हैं ये नरसंहार कहां हुआ था और क्यों हुआ था, जिसमें लाखों लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे। 

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Rwanda genocide also known as the genocide against the Tutsi Story of 100 days of slaughter
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

यह भीषण नरसंहार अफ्रीकी देश रवांडा में हुआ था, जिसकी शुरुआत साल 1994 में रवांडा के राष्ट्रपति जुवेनल हाबयारिमाना और बुरुंडी के राष्ट्रपति सिप्रेन की हत्या से हुई थी। उनके हवाई जहाज को ही उड़ा दिया गया था। इस जहाज को किसने मार गिराया था, यह अब तक साबित नहीं हो सका है, लेकिन कुछ लोग इसके लिए रवांडा के हूतू चरमपंथियों को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि कुछ का मानना है कि रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ) ने ये काम किया था। चूंकि दोनों ही राष्ट्रपति हूतू समुदाय से संबंध रखते थे, इसलिए हूतू चरमपंथियों ने इस हत्या के लिए रवांडा पैट्रिएक फ्रंट को जिम्मेदार ठहराया। हालांकि आरपीएफ का आरोप था कि जहाज को हूतू चरमपंथियों ने ही उड़ाया था, ताकि उन्हें नरसंहार का एक बहाना मिल सके। 

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Rwanda genocide also known as the genocide against the Tutsi Story of 100 days of slaughter
रवांडा का एक दृश्य - फोटो : Social media

असल में यह नरसंहार तुत्सी और हुतू समुदाय के लोगों के बीच हुआ एक जातीय संघर्ष था। कहते हैं कि सात अप्रैल 1994 से लेकर अगले 100 दिनों तक चलने वाले इस संघर्ष में हूतू समुदाय के लोगों ने तुत्सी समुदाय से आने वाले अपने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और यहां तक कि अपनी पत्नियों को ही मारना शुरू कर दिया। कहते हैं कि हूतू समुदाय के जिन लोगों ने तुत्सी समुदाय से संबंध रखने वाली अपनी पत्नियों को मार डाला, उन्होंने सिर्फ इसलिए उनकी हत्या की, क्योंकि अगर वो ऐसा नहीं करते तो उन्हें ही मार दिया जाता। सिर्फ यही नहीं, तुत्सी समुदाय के लोगों को मारा तो गया ही, साथ ही इस समुदाय से संबंध रखने वाली महिलाओं को सेक्स स्लेव (यौनक्रिया के लिए गुलाम) बनाकर भी रखा गया। 

Rwanda genocide also known as the genocide against the Tutsi Story of 100 days of slaughter
न्यामता नरसंहार स्मारक में रखी लोगों की खोपड़ियां, रवांडा - फोटो : Social media

हालांकि ऐसा नहीं है कि इस नरसंहार में सिर्फ तुत्सी समुदाय के ही लोगों की हत्या हुई। हूतू समुदाय के भी हजारों लोग इसमें मारे गए। कुछ मानवाधिकार संस्थाओं के मुताबिक, रवांडा की सत्ता हथियाने के बाद रवांडा पैट्रिएक फ्रंट (आरपीएफ) के लड़ाकों ने हूतू समुदाय के हजारों लोगों की हत्या की। हालांकि इस नरसंहार से बचने के लिए रवांडा के लाखों लोगों ने भागकर दूसरे देशों में शरण ले ली थी। 

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Rwanda genocide also known as the genocide against the Tutsi Story of 100 days of slaughter
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

रवांडा नरसंहार के लगभग सात साल बाद यानी 2002 में एक अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत का गठन हुआ था, ताकि हत्याओं के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दी सके। हालांकि वहां हत्यारों को सजा नहीं मिल सकी। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने तंजानिया में एक इंटरनेशनल क्रिमिलन ट्रिब्यूनल बनाया, जहां कई लोगों को नरसंहार के लिए दोषी ठहराया गया और उन्हें सजा सुनाई गई। इसके अलावा रवांडा में भी सामाजिक अदालतें बनाई गई थीं, ताकि नरसंहार के लिए जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाया जा सके। कहते हैं कि मुकदमा चलाने से पहले ही करीब 10 हजार लोगों की मौत जेलों में ही हो गई थी। 

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