Union Budget 2026: क्या सरकार निर्यात बढ़ाने के लिए जेम्स-ज्वेलरी सेक्टर पर टैक्स घटाएगी? जानें उद्योग की मांग
GJEPC ने बजट से पहले सरकार से शुल्क घटाने, टैक्स सुधार मजबूत करने की मांग की है ताकि रत्न-आभूषण उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धा, निर्यात और रोजगार बढ़ सके। आइए विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
रत्न व आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को बजट के पूर्व सुझाव दिए है। इसमें भारत के निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा देने, व्यापार करने में आसानी और वैश्विक चुनौतियों के बीच उद्योग के लचीलेपन को समर्थन देने के लिए प्रमुख नीतिगत उपायों पेशकश की है। उद्योग ने निर्यात में विविधता लाने और नए बाजारों में पैठ बनाने के लिए लक्षित शुल्क युक्तिकरण और प्रक्रियात्मक सुधारों पर विचार करने का आग्रह किया है, जिससे भारतीय निर्माताओं को लागत-प्रतिस्पर्धी बने रहने में मदद मिलेगी। यह उद्योग विदेशी मुद्रा आय और घरेलू बाजार में रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि वर्तमान समय में उद्योग को कई चुनौतियों का सामाना करना पड़ा रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में 28.7 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य निर्यात भारत के रत्न और आभूषण उद्योग ने किया।
जीजेईपीसी के अध्यक्ष किरित भंसाली ने कहा वैश्विक रत्न और आभूषण व्यापार में बड़े बदलाव आ रहे हैं। अमेरिका के लगाए गए उच्च टैरिफ, उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकता और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में हो रहे बदलावों की वजह से भारत के लिए अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता को बनाए रखना जरूरी है। हमारे बजट पूर्व प्रस्ताव में भारतीय निर्यात को अधिक लागत कुशल बनाने, एसईजेड को मजबूत करने और निवेश व कौशल विकास को प्रोत्साहित करने वाले नीतिगत ढांचों में सुधार लाने पर केंद्रित है।
भंसाली कहते हैं, हमारे प्रमुख उद्देश्य भारत को वैश्विक हीरा व्यापार केंद्र के रूप में स्थापित करना भी है, जो कटिंग और पॉलिशिंग केंद्र के रूप मजबूत हो। इन सुधारों और स्थिर व्यापार पारिस्थितिकी तंत्र के साथ भारत वर्तमान की वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकता है बल्कि अंतरराष्ट्रीय आभूषण बाजार का नेतृत्व भी कर सकता है।
कच्चे हीरे के व्यापार के लिए उदारीकृत कराधान
भारत, जो विश्व के लगभग 90 प्रतिशत कच्चे हीरों की कटाई और पॉलिशिंग करता है, अभी भी एंटवर्प और दुबई के समान वैश्विक व्यापार केंद्र की कमी से जूझ रहा है। इस समस्या को दूर करने के लिए, जीजेईपीसी ने विशेष अधिसूचित क्षेत्रों (एसएनजेड) में कार्यरत विदेशी खनन कंपनियों (एफएमसी) पर उदार और पूर्वानुमानित कराधान व्यवस्था लागू करने की सिफारिश की है। वर्तमान 4 प्रतिशत सेफ हार्बर टैक्स को बहुत अधिक माना जाता है और यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार को हतोत्साहित करता है।
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बेल्जियम के सफल कैरेट टैक्स मॉडल से प्रेरणा लेते हुए, जिसने वैश्विक हीरा व्यापार को एंटवर्प की ओर आकर्षित किया है, जीजेईपीसी भारत को हीरा व्यापार और मूल्य निर्धारण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए इसी तरह का दृष्टिकोण प्रस्तावित करता है। परिषद प्रतिष्ठित वैश्विक दलालों को भारत में परिचालन करने की अनुमति भी चाहती है, जिससे पारदर्शिता, तरलता और घरेलू बाजार में अंतरराष्ट्रीय भागीदारी में सुधार हो सके।
कटे और पॉलिश किए गए पत्थरों पर ड्यूटी को तर्कसंगत बनाना
जीजेईपीसी ने सरकार से आग्रह किया है कि भारतीय निर्यातकों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने में मदद करने के लिए तराशे और पॉलिश किए गए हीरों और रंगीन रत्नों पर आयात शुल्क को युक्तिसंगत बनाया जाए। खनन करने वाले देशों की नीतिगत नीतियां, मांग में मंदी और अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में उभरते नए प्रतिस्पर्धी केंद्रों के कारण भारत को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान नियमों के तहत, खनन करने वाले देशों से आयातित अर्ध-संसाधित हीरों को तराशे और पॉलिश किए गए हीरों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है और उन पर 5 प्रतिशत मूल सीमा शुल्क लगता है, जिससे भारतीय निर्यात कम प्रतिस्पर्धी हो जाता है।
इसी तरह, कई कच्चे रत्न उत्पादक देशों ने निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है या उच्च शुल्क लगा दिए हैं, जिससे भारतीय जौहरियों को उत्पादन के लिए तैयार रत्नों का आयात करना पड़ रहा है। इन पत्थरों पर मौजूदा 5 प्रतिशत आयात शुल्क लागत को बढ़ाता है और थाईलैंड और चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले भारत की स्थिति को कमजोर करता है। इसलिए, जीजेईपीसी ने उत्पादन, रोजगार और निर्यात वृद्धि को बनाए रखने के लिए कटे और पॉलिश किए गए हीरों और रत्नों पर शुल्क घटाकर 2.5 प्रतिशत करने और कच्चे रत्नों पर शुल्क समाप्त करने की सिफारिश की है।
सोने और चांदी के आभूषणों पर मूल्य आधारित शुल्क पर छूट मिले
धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच निर्यातकों की आय को स्थिर करने के लिए, जीजेईपीसी ने मौजूदा निश्चित दर वाले ड्यूटी ड्रॉबैक सिस्टम को मूल्य-आधारित (एड-वैलारेम) व्यवस्था से बदलने का प्रस्ताव दिया है। वर्तमान निश्चित ड्रॉबैक प्रणाली भुगतान किए गए शुल्क का केवल 75-80 प्रतिशत ही मिलता है, जिसके परिणामस्वरूप निर्यातकों को नुकसान होता है। 10 ग्राम सोने की कीमतें 99,000 रुपये से 1,25,000 रुपये के बीच होने के कारण, निश्चित वापसी प्रणाली अव्यवहारिक हो जाती है। मूल्य-आधारित प्रणाली आनुपातिक वापसी सुनिश्चित करेगी, जिससे आभूषण निर्यातकों को उचित मुआवजा और पूर्वानुमान मिलेगा।
ड्यूटी ड्रॉबैक योजना में प्लैटिनम और सोने की वस्तुओं को शामिल करना
परिषद ने प्लैटिनम आभूषणों और सोने की वस्तुओं को शुल्क छूट योजना में शामिल करने का भी आह्वान किया है। भारत से प्लैटिनम आभूषणों का निर्यात पिछले पांच वर्षों में लगभग 17 गुना बढ़ गया है, जिसका मुख्य कारण विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) में है जिन्हें शुल्क छूट का लाभ मिलता है।
इसके अलावा जीजेईपीसी ने सरकार से विदेशी पर्यटकों के लिए एक व्यापक कर वापसी योजना शुरु करने की मांग की है। परिषद वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव से निर्यात प्रभावित हो रहा है, ऐसे में परिषद ने विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) में परिचालन लचीलापन लाने की मांग है, जिसमें व्यापार की निरंतरता को सुनिश्चित हो और रोजगार की सुरक्षा हो सके। जीजेईपीसी ने निर्यात-उन्मुख रत्न व आभूषण क्षेत्र की तेजी से विकसित हो रही आवश्यकताओं के अनुरूप सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को सुगम बनाने के लिए सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 में संशोधन की आवश्यकता पर बल दिया है। साथ ही प्रयोगशाला में उत्पादित हीरे (एलजीडी) के क्षेत्र में भारत के वैश्विक नेतृत्व को मान्यता देते हुए,आयातित एलजीडी बीजों पर मौजूदा शुल्क छूट को मार्च 2026 के बाद भी जारी रखने की सिफारिश की है।