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विश्व लिंफोमा जागरूकता दिवस: पीजीआई ने तलाशा रिपीट लिंफोमा का इलाज, कीमो का नया कॉम्बिनेशन किया ईजाद
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Fri, 15 Sep 2023 12:54 PM IST
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सार
2017 से 2020 के बीच रिपीट लिंफोमा से ग्रस्त 24 मरीजों पर यह शोध किया गया, जिसमें उन्हें कीमो के नए कॉम्बिनेशन की दवाइयां दी गईं। तुलनात्मक अध्ययन करने पर 83 प्रतिशत मरीजों में फायदा सामने आया। इसके बाद उनका सफलतापूर्वक बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया।
pgi chandigarh
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विस्तार
शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी कोशिकाओं में होने वाले कैंसर यानी लिंफोमा के इलाज के लिए चंडीगढ़ पीजीआई हेमेटोलॉजी एंड मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने नया इलाज ईजाद किया है। उस इलाज का उपयोग विश्व में पहली बार पीजीआई में सफलतापूर्वक किया गया है।
हेमेटोलॉजी विभाग द्वारा रिपीट लिंफोमा यानी इलाज के बाद भी इस मर्ज से बार बार ग्रस्त होने वाले मरीजों पर किए गए शोध के बाद नई तकनीक में सफलता मिली है। पीजीआई ही नहीं विश्वभर के लिंफोमा के मरीजों पर अभी तक पुरानी कीमोथेरेपी का उपयोग किया जाता है, लेकिन पीजीआई के विशेषज्ञों ने नए कीमो कॉन्बिनेशन विआईबीई विकसित कर इस बीमारी को बार-बार होने से रोकने का इलाज तलाश लिया है।
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रिपीट लिंफोमा वाले मरीजों के इलाज के लिए नहीं थे ज्यादा विकल्प
हेमेटोलॉजी एंड मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. पंकज मल्होत्रा के मार्गदर्शन में शोध करने वाले डॉ. गौरव प्रकाश और डॉ. चरनप्रीत सिंह ने बताया कि अब तक रिपीट लिंफोमा वाले मरीजों के इलाज के लिए ज्यादा विकल्प नहीं थे। जो उपलब्ध थे वो कम प्रभावशाली थे जिससे उन्हें कीमो के कई डोज देने पड़ते थे, लेकिन रिपीट लिंफोमा के मरीज में कीमोथेरेपी देने के बाद कोई फायदा नहीं होता। वह बार बार इसकी चपेट में आते हैं। ऐसे में कीमो के नए कांबिनेशन का उन मरीजों पर उपयोग कर इस समस्या से बचाव का रास्ता निकाला गया।
24 मरीजों पर किया शोध
डॉ. गौरव प्रकाश ने बताया कि 2017 से 2020 के बीच रिपीट लिंफोमा से ग्रस्त 24 मरीजों पर यह शोध किया गया, जिसमें उन्हें कीमो के नए कांबिनेशन की दवाइयां दी गईं। तुलनात्मक अध्ययन करने पर 83 प्रतिशत मरीजों में फायदा सामने आया। इसके बाद उनका सफलतापूर्वक बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। उन मरीजों का लगातार फॉलो अप लिया जा रहा है। लेकिन उनमें रिपीट लिंफोमा वाली स्थिति अब तक नहीं आई है। इस शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल ब्लड रिसर्च में प्रकाशित किया गया है।
क्या है लिंफोमा...
मानव शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं को लिम्फोसाइट्स कहा जाता है जो कोशिकाएं कैंसर से प्रभावित होती हैं उन्हें लिंफोमा या लिंफ कैंसर कहा जाता है। लिंफोसाइट्स एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएं हैं जो संक्रमण और बीमारी से लड़कर हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन करती हैं। वे ज्यादातर हमारे लसीका तंत्र में रहते हैं, हमारे रक्त में बहुत कम पाए जाते हैं। कैंसर इन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और शरीर की अन्य बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ब्लड कैंसर का सबसे आम प्रकार लिंफोमा है।
यह भी पढ़ें: कर्नल मनप्रीत सिंह: मासूम बेटे ने आर्मी की ड्रेस पहनकर पिता को किया सैल्यूट, सिसक उठा पूरा गांव
इन जांचों से चलता है पता
लिंफोमा कैंसर का पता लगाने के लिए कुछ टेस्ट करवाए जाते हैं। इनमें पेेट स्कैन, सीटी स्कैन, लिम्फ नोड बायोप्सी, बोन मैरो बायोप्सी, छाती का एक्स-रे, एमआरआई, पेट का अल्ट्रासाउंड, इम्युनोहिस्टोकैमिस्ट्री और सोनोग्राफी शामिल हैं। इनमें से किसी भी टेस्ट से डॉक्टर को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि उस व्यक्ति को लिंफोमा कैंसर कहां तक फैला है।
इलाज के लिए इन तकनीक का होता है उपयोग
कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी, बोन मैरो ट्रांसप्लांट और बायोलॉजिकल थेरेपी।
इसे समझना जरूरी
आमतौर पर ये कोशिकाएं लिंफ नोड्स, स्प्लीन, थाइमस और बोनमैरो में मौजूद होती हैं। लिंफोमा से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर में इन कोशिकाओं का स्वरूप बदल जाता है और ये नियंत्रण से बाहर होने लगती है जिससे शरीर के प्रभावित हिस्से में गांठें बनने लगती हैं, जो अंततः कैंसर में तब्दील हो जाती हैं। आमतौर पर इसकी गांठें गर्दन, छाती, थाइज के ऊपरी हिस्से और ऑर्म पिट्स में नजर आती हैं।
लिंफोमा के लक्षण
लिंफ नोड्स में त्वचा के नीचे, आर्म पिट्स, पेट या थाइज के ऊपरी हिस्से में, सूजन या गांठ, स्प्लीन का आकार बढ़ना, हड्डियों में दर्द, खांसी, हमेशा थकान महसूस होना, हल्का बुखार, स्किन पर रैशेज, रात को पसीना आना, सांस फूलना, पेट में दर्द और बिना वजह वजन घटना आदि इसके लक्षण हैं।
इस शोध की सफलता के बाद हमारा विभाग इम्यूनोथेरेपी के साथ इस नए कांबिनेशन पर कम कर रहा है जिससे इस मर्ज से ग्रस्त मरीजों को और बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराई जा सके। - प्रो. पंकज मल्होत्रा, प्रमुख हेमेटोलॉजी एंड मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग, पीजीआई
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रिपीट लिंफोमा वाले मरीजों के इलाज के लिए नहीं थे ज्यादा विकल्प
हेमेटोलॉजी एंड मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रो. पंकज मल्होत्रा के मार्गदर्शन में शोध करने वाले डॉ. गौरव प्रकाश और डॉ. चरनप्रीत सिंह ने बताया कि अब तक रिपीट लिंफोमा वाले मरीजों के इलाज के लिए ज्यादा विकल्प नहीं थे। जो उपलब्ध थे वो कम प्रभावशाली थे जिससे उन्हें कीमो के कई डोज देने पड़ते थे, लेकिन रिपीट लिंफोमा के मरीज में कीमोथेरेपी देने के बाद कोई फायदा नहीं होता। वह बार बार इसकी चपेट में आते हैं। ऐसे में कीमो के नए कांबिनेशन का उन मरीजों पर उपयोग कर इस समस्या से बचाव का रास्ता निकाला गया।
24 मरीजों पर किया शोध
डॉ. गौरव प्रकाश ने बताया कि 2017 से 2020 के बीच रिपीट लिंफोमा से ग्रस्त 24 मरीजों पर यह शोध किया गया, जिसमें उन्हें कीमो के नए कांबिनेशन की दवाइयां दी गईं। तुलनात्मक अध्ययन करने पर 83 प्रतिशत मरीजों में फायदा सामने आया। इसके बाद उनका सफलतापूर्वक बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया। उन मरीजों का लगातार फॉलो अप लिया जा रहा है। लेकिन उनमें रिपीट लिंफोमा वाली स्थिति अब तक नहीं आई है। इस शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल ब्लड रिसर्च में प्रकाशित किया गया है।
क्या है लिंफोमा...
मानव शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं को लिम्फोसाइट्स कहा जाता है जो कोशिकाएं कैंसर से प्रभावित होती हैं उन्हें लिंफोमा या लिंफ कैंसर कहा जाता है। लिंफोसाइट्स एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएं हैं जो संक्रमण और बीमारी से लड़कर हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन करती हैं। वे ज्यादातर हमारे लसीका तंत्र में रहते हैं, हमारे रक्त में बहुत कम पाए जाते हैं। कैंसर इन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है और शरीर की अन्य बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ब्लड कैंसर का सबसे आम प्रकार लिंफोमा है।
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इन जांचों से चलता है पता
लिंफोमा कैंसर का पता लगाने के लिए कुछ टेस्ट करवाए जाते हैं। इनमें पेेट स्कैन, सीटी स्कैन, लिम्फ नोड बायोप्सी, बोन मैरो बायोप्सी, छाती का एक्स-रे, एमआरआई, पेट का अल्ट्रासाउंड, इम्युनोहिस्टोकैमिस्ट्री और सोनोग्राफी शामिल हैं। इनमें से किसी भी टेस्ट से डॉक्टर को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि उस व्यक्ति को लिंफोमा कैंसर कहां तक फैला है।
इलाज के लिए इन तकनीक का होता है उपयोग
कीमोथेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी, बोन मैरो ट्रांसप्लांट और बायोलॉजिकल थेरेपी।
इसे समझना जरूरी
आमतौर पर ये कोशिकाएं लिंफ नोड्स, स्प्लीन, थाइमस और बोनमैरो में मौजूद होती हैं। लिंफोमा से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर में इन कोशिकाओं का स्वरूप बदल जाता है और ये नियंत्रण से बाहर होने लगती है जिससे शरीर के प्रभावित हिस्से में गांठें बनने लगती हैं, जो अंततः कैंसर में तब्दील हो जाती हैं। आमतौर पर इसकी गांठें गर्दन, छाती, थाइज के ऊपरी हिस्से और ऑर्म पिट्स में नजर आती हैं।
लिंफोमा के लक्षण
लिंफ नोड्स में त्वचा के नीचे, आर्म पिट्स, पेट या थाइज के ऊपरी हिस्से में, सूजन या गांठ, स्प्लीन का आकार बढ़ना, हड्डियों में दर्द, खांसी, हमेशा थकान महसूस होना, हल्का बुखार, स्किन पर रैशेज, रात को पसीना आना, सांस फूलना, पेट में दर्द और बिना वजह वजन घटना आदि इसके लक्षण हैं।
इस शोध की सफलता के बाद हमारा विभाग इम्यूनोथेरेपी के साथ इस नए कांबिनेशन पर कम कर रहा है जिससे इस मर्ज से ग्रस्त मरीजों को और बेहतर चिकित्सा उपलब्ध कराई जा सके। - प्रो. पंकज मल्होत्रा, प्रमुख हेमेटोलॉजी एंड मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग, पीजीआई

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