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शिवालिक पर संकट: पीयू की चेतावनी-जैव विविधता को गंभीर खतरा, विलुप्ति की कगार पर दुर्लभ प्रजातियां

वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 22 Jan 2026 08:29 AM IST
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सार

शिवालिक केवल जंगल या पहाड़ नहीं हैं बल्कि चंडीगढ़ क्षेत्र की जीवन रेखा है। यहीं से भूजल का पुनर्भरण होता है और यही हरियाली हवा को शुद्ध करती है। यदि जैव विविधता समाप्त हुई तो इसका सीधा और गंभीर प्रभाव आम लोगों के जीवन पर पड़ेगा।

Shivalik Hills in danger panjab university warns of serious threat to biodiversity
मोरनी में शिवालिक की पहाड़ियों पर छाई हरियाली - फोटो : फाइल
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विस्तार
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चंडीगढ़ और इसके आसपास फैला शिवालिक क्षेत्र कभी घने जंगलों और समृद्ध वन्यजीवों के लिए जाना जाता था। आज जैव विविधता के गंभीर संकट से जूझ रहा है। इस खतरे पर पंजाब यूनिवर्सिटी में हुए शोध ने भी चेतावनी दी है। 
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शोध में कहा गया है कि अगर मौजूदा हालात यूं ही बने रहे तो शिवालिक की कई स्थानीय और दुर्लभ प्रजातियां आने वाले वर्षों में पूरी तरह गायब हो सकती हैं।

पीयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के अंतर्गत संचालित मृदा पारिस्थितिकी तंत्र और पुनर्स्थापन पारिस्थितिकी प्रयोगशाला (स्वाइल इको सिस्टम एंड रेस्टोरेशन इकोलॉजी लैब) के वैज्ञानिकों ने इस शोध के माध्यम से शिवालिक पारिस्थितिकी तंत्र में जैव विविधता के गिरते स्तर का वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। शोध में बताया गया है कि बढ़ती आबादी और संसाधनों की बढ़ती मांग ने प्राकृतिक आवासों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है जिससे जैव विविधता की स्थिरता पर सीधा असर पड़ा है। 
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जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से संकट और गहराया 

वनस्पति विज्ञान विभाग के डॉ. आनंद नारायण सिंह के अनुसार हालिया शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि जंगलों का लगातार कटाव, प्राकृतिक आवासों का विखंडन, औद्योगिक व घरेलू प्रदूषण तथा बाहरी आक्रामक प्रजातियों का फैलाव स्थानीय वनस्पति और जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। समय रहते ठोस संरक्षण उपाय नहीं अपनाए गए तो शिवालिक क्षेत्र की जैव विविधता को अपूरणीय क्षति हो सकती है। 

चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली और मोरनी हिल्स से सटे इलाकों में दिखाई दे रहा असर 

डॉ. आनंद ने बताया कि शोध के अनुसार बीते 100 से 150 वर्षों में शिवालिक क्षेत्र के जंगलों का बड़ा हिस्सा नष्ट हो चुका है। इसका सीधा असर चंडीगढ़, पंचकूला, मोहाली और मोरनी हिल्स से सटे इलाकों में दिखाई दे रहा है जहां मिट्टी का कटाव, भूस्खलन और मानव–वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि शहरी विस्तार और रिहायशी परियोजनाओं के कारण जंगल छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गए हैं। वहीं, अवैध और अनियंत्रित खनन ने नदियों और पहाड़ियों की प्राकृतिक संरचना को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। डॉ. आनंद ने कहा कि लैंटाना, पार्थेनियम और प्रोसोपिस जैसी विदेशी आक्रामक वनस्पतियों के प्रसार ने स्थानीय पौधों को पीछे धकेल दिया है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन के चलते अनियमित वर्षा से गली कटाव और भूमि क्षरण की समस्या तेजी से बढ़ी है।
 
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