{"_id":"6a6e60744e7697e2e90a8bfe","slug":"the-city-wept-bitterly-the-biers-of-three-friends-were-borne-away-and-every-street-in-sector-30-was-plunged-into-mourning-chandigarh-news-c-16-pkl1079-1085629-2026-08-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chandigarh News: शहर रोया... जार-जार.......तीन दोस्तों की अर्थियां उठीं... और सेक्टर-30 की हर गली मातम में डूब गई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chandigarh News: शहर रोया... जार-जार.......तीन दोस्तों की अर्थियां उठीं... और सेक्टर-30 की हर गली मातम में डूब गई
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
माई सिटी रिपोर्टर
चंडीगढ़। तीन अर्थियां... तीन मांओं का विलाप... और हजारों नम आंखें। शनिवार को सिर्फ तीन चिताएं नहीं जलीं... हर घर, हर गली और हर दिल राख होता रहा। सुबह से जिन गलियों में कभी चार दोस्तों की हंसी गूंजती थी, वहां सिसकियां थीं। हर दरवाजे पर भीड़ थी लेकिन किसी के पास सांत्वना के शब्द नहीं थे। किसी घर से मां की चीख सुनाई देती, तो अगले ही पल दूसरी गली से बहन की रुलाई। ऐसा लग रहा था जैसे पूरे सेक्टर-30 ने एक साथ अपने बेटे खो दिए हों।
भरत उर्फ बिट्टू, शिवांशु, नितीश और बापूधाम कॉलोनी निवासी रोहित 29 जुलाई की रात भगवान शिव का जलाभिषेक करने हरिद्वार के लिए निकले थे। घर से निकलते समय किसी ने मां के पैर छुए, किसी ने मुस्कुराकर कहा...जल्दी लौट आएंगे, किसी ने छोटे भाई से वादा किया कि लौटकर साथ घूमेंगे। किसी को क्या पता था कि दो दिन बाद वही बच्चे सफेद कफन में घर लौटेंगे।
31 जुलाई की दोपहर गंगनहर के तेज बहाव ने चारों दोस्तों को हमेशा के लिए अपनों से छीन लिया। शनिवार को सेक्टर-30 में भरत, शिवांशु और नीतिश के पार्थिव शरीर पहुंचे तो पूरा इलाका फूट-फूटकर रो पड़ा। बचपन साथ बीता... स्कूल साथ गए... त्योहार साथ मनाए... और किस्मत ने अंतिम यात्रा भी साथ लिख दी। मोहल्ले के बुजुर्ग नम आंखों से बस इतना कह रहे थे...एक को आवाज दो तो चारों साथ आते थे... आज भी साथ आए हैं, बस बोल नहीं रहे...
विज्ञापन
सबसे पहले नीतिश के घर से चीखें उठीं। मां बेटे के चेहरे को चुन्नी से सहला रही थीं। कभी माथा चूमतीं, कभी दुपट्टे से हवा करतीं, जैसे उन्हें अब भी भरोसा था कि बेटा आंखें खोल देगा। बहन तृषा रोते-रोते बता रही थी कि जाते समय दोनों में हल्की नोकझोंक हुई थी। नीतिश मुस्कुराकर बोला था...आकर तुझे बताऊंगा...वह बात हमेशा के लिए अधूरी रह गई।
कुछ ही दूरी पर शिवांशु के घर का ऐसा मंजर था जिसने हजारों लोगों को रुला दिया। मां बेटे के माथे पर हल्दी लगा रही थीं। फिर अचानक रोते-रोते बोलीं... मेरे बेटे की बरात निकल रही है... कोई शहनाई बजा दो...यह सुनते ही वहां खड़ा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसकी आंखें सूखी रही हों। बहन कनिका भाई के सिरहाने बैठी बिलख रही थी... भैया... तू तो अपना बर्थडे मनाने वाला था...। मां बार-बार बेटी से कह रही थीं... तू अपने भाई को रोक लेती...लेकिन अब रोकने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।
भरत उर्फ बिट्टू के घर का दर्द भी किसी से कम नहीं था। मां बार-बार बेटे के चेहरे को निहारते हुए पूछ रही थीं...बेटा... तेरा फोन कहां है... कोई मेरा बिट्टू बुला दो...। मानो उन्हें अब भी उम्मीद थी कि मोबाइल बजेगा और दूसरी ओर से बेटे की आवाज सुनाई देगी। बुआ बिलखती रहीं.. बिट्टू उठ जा... तुझे नई बाइक दिलाऊंगी... लेकिन अब कोई आवाज उस तक नहीं पहुंचनी थी।
शनिवार को सेक्टर-30 सचमुच तीन हिस्सों में बंट गया था। लोग एक अर्थी से दूसरी अर्थी तक जाते रहे। कोई सांत्वना देने जाता तो खुद रो पड़ता। किसी ने दुकान नहीं खोली। किसी ने कारोबार की बात नहीं की। इंसानी दर्द के आगे रोजमर्रा की जिंदगी छोटी पड़ गई थी।
साहिल ने बचाई अमित की जान, लेकिन चार दोस्त नहीं लौट सके
भरत के रिश्तेदार और प्रत्यक्षदर्शी साहिल ने बताया कि 31 जुलाई को दोपहर करीब तीन बजे सभी गंगनहर किनारे बने शिविर में रुके थे। खाना खाने और थोड़ी देर आराम करने के बाद नहाने गए। सबसे पहले भरत का पैर फिसला। उसे बचाने के लिए नीतिश, शिवांशु और रोहित भी पानी में कूद पड़े। रोहित को बचाने की कोशिश में उसका छोटा भाई अमित भी बहने लगा लेकिन साहिल ने उसे खींचकर बाहर निकाल लिया। करीब 20 मिनट तक कांवड़ियों ने तलाश की। बाद में पुलिस और गोताखोरों ने चारों के शव बाहर निकाले।
देश के लिए मेडल जीतने का सपना भी बुझ गया
पंचकूला से अंतिम संस्कार में पहुंचे शिवांशु के दोस्त प्रथम और वर्णन ने बताया कि वह सेक्टर-20 के सरकारी मॉडल स्कूल का होनहार वॉलीबॉल खिलाड़ी था। उसका सपना भारत के लिए मेडल जीतना था। 29 जुलाई को आखिरी बार बात हुई थी। उसने कहा था... वापस आकर नोट्स ले लूंगा। किसी ने नहीं सोचा था कि वह कभी लौटकर नहीं आएगा।
रजिस्टर में नाम चढ़ा... लेकिन काटने की हिम्मत नहीं हुई
शिवांशु की क्लास इंचार्ज नीतू ने बताया कि वह एनएसएस कैडेट था और 12 अगस्त को होने वाले वॉलीबॉल टूर्नामेंट के लिए टीम में चुना गया था। 30 जुलाई को उसने स्कूल को व्हाट्सएप पर 10 दिन की छुट्टी की अर्जी भेजी थी। शुक्रवार को उन्होंने रजिस्टर में उसका नाम दर्ज किया, लेकिन शनिवार को उसे काटने की हिम्मत नहीं हुई। सोमवार को स्कूल में उसकी स्मृति में मौन रखा जाएगा।
मोहल्ले के हर घर का बेटा थे बिट्टू और शिवांशु
पड़ोसियों ने बताया कि मोहल्ले में किसी को भी जरूरत होती तो सबसे पहले बिट्टू और शिवांशु पहुंचते थे। दोनों हंसमुख, मददगार और संस्कारी थे। कभी किसी की बात का बुरा नहीं मानते थे। शनिवार को लोग बार-बार यही कहते रहे... आज सिर्फ तीन परिवार नहीं, पूरा सेक्टर-30 अनाथ हो गया है।
विज्ञापन
चंडीगढ़। तीन अर्थियां... तीन मांओं का विलाप... और हजारों नम आंखें। शनिवार को सिर्फ तीन चिताएं नहीं जलीं... हर घर, हर गली और हर दिल राख होता रहा। सुबह से जिन गलियों में कभी चार दोस्तों की हंसी गूंजती थी, वहां सिसकियां थीं। हर दरवाजे पर भीड़ थी लेकिन किसी के पास सांत्वना के शब्द नहीं थे। किसी घर से मां की चीख सुनाई देती, तो अगले ही पल दूसरी गली से बहन की रुलाई। ऐसा लग रहा था जैसे पूरे सेक्टर-30 ने एक साथ अपने बेटे खो दिए हों।
भरत उर्फ बिट्टू, शिवांशु, नितीश और बापूधाम कॉलोनी निवासी रोहित 29 जुलाई की रात भगवान शिव का जलाभिषेक करने हरिद्वार के लिए निकले थे। घर से निकलते समय किसी ने मां के पैर छुए, किसी ने मुस्कुराकर कहा...जल्दी लौट आएंगे, किसी ने छोटे भाई से वादा किया कि लौटकर साथ घूमेंगे। किसी को क्या पता था कि दो दिन बाद वही बच्चे सफेद कफन में घर लौटेंगे।
विज्ञापन
31 जुलाई की दोपहर गंगनहर के तेज बहाव ने चारों दोस्तों को हमेशा के लिए अपनों से छीन लिया। शनिवार को सेक्टर-30 में भरत, शिवांशु और नीतिश के पार्थिव शरीर पहुंचे तो पूरा इलाका फूट-फूटकर रो पड़ा। बचपन साथ बीता... स्कूल साथ गए... त्योहार साथ मनाए... और किस्मत ने अंतिम यात्रा भी साथ लिख दी। मोहल्ले के बुजुर्ग नम आंखों से बस इतना कह रहे थे...एक को आवाज दो तो चारों साथ आते थे... आज भी साथ आए हैं, बस बोल नहीं रहे...
विज्ञापन
सबसे पहले नीतिश के घर से चीखें उठीं। मां बेटे के चेहरे को चुन्नी से सहला रही थीं। कभी माथा चूमतीं, कभी दुपट्टे से हवा करतीं, जैसे उन्हें अब भी भरोसा था कि बेटा आंखें खोल देगा। बहन तृषा रोते-रोते बता रही थी कि जाते समय दोनों में हल्की नोकझोंक हुई थी। नीतिश मुस्कुराकर बोला था...आकर तुझे बताऊंगा...वह बात हमेशा के लिए अधूरी रह गई।
कुछ ही दूरी पर शिवांशु के घर का ऐसा मंजर था जिसने हजारों लोगों को रुला दिया। मां बेटे के माथे पर हल्दी लगा रही थीं। फिर अचानक रोते-रोते बोलीं... मेरे बेटे की बरात निकल रही है... कोई शहनाई बजा दो...यह सुनते ही वहां खड़ा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसकी आंखें सूखी रही हों। बहन कनिका भाई के सिरहाने बैठी बिलख रही थी... भैया... तू तो अपना बर्थडे मनाने वाला था...। मां बार-बार बेटी से कह रही थीं... तू अपने भाई को रोक लेती...लेकिन अब रोकने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।
भरत उर्फ बिट्टू के घर का दर्द भी किसी से कम नहीं था। मां बार-बार बेटे के चेहरे को निहारते हुए पूछ रही थीं...बेटा... तेरा फोन कहां है... कोई मेरा बिट्टू बुला दो...। मानो उन्हें अब भी उम्मीद थी कि मोबाइल बजेगा और दूसरी ओर से बेटे की आवाज सुनाई देगी। बुआ बिलखती रहीं.. बिट्टू उठ जा... तुझे नई बाइक दिलाऊंगी... लेकिन अब कोई आवाज उस तक नहीं पहुंचनी थी।
शनिवार को सेक्टर-30 सचमुच तीन हिस्सों में बंट गया था। लोग एक अर्थी से दूसरी अर्थी तक जाते रहे। कोई सांत्वना देने जाता तो खुद रो पड़ता। किसी ने दुकान नहीं खोली। किसी ने कारोबार की बात नहीं की। इंसानी दर्द के आगे रोजमर्रा की जिंदगी छोटी पड़ गई थी।
साहिल ने बचाई अमित की जान, लेकिन चार दोस्त नहीं लौट सके
भरत के रिश्तेदार और प्रत्यक्षदर्शी साहिल ने बताया कि 31 जुलाई को दोपहर करीब तीन बजे सभी गंगनहर किनारे बने शिविर में रुके थे। खाना खाने और थोड़ी देर आराम करने के बाद नहाने गए। सबसे पहले भरत का पैर फिसला। उसे बचाने के लिए नीतिश, शिवांशु और रोहित भी पानी में कूद पड़े। रोहित को बचाने की कोशिश में उसका छोटा भाई अमित भी बहने लगा लेकिन साहिल ने उसे खींचकर बाहर निकाल लिया। करीब 20 मिनट तक कांवड़ियों ने तलाश की। बाद में पुलिस और गोताखोरों ने चारों के शव बाहर निकाले।
देश के लिए मेडल जीतने का सपना भी बुझ गया
पंचकूला से अंतिम संस्कार में पहुंचे शिवांशु के दोस्त प्रथम और वर्णन ने बताया कि वह सेक्टर-20 के सरकारी मॉडल स्कूल का होनहार वॉलीबॉल खिलाड़ी था। उसका सपना भारत के लिए मेडल जीतना था। 29 जुलाई को आखिरी बार बात हुई थी। उसने कहा था... वापस आकर नोट्स ले लूंगा। किसी ने नहीं सोचा था कि वह कभी लौटकर नहीं आएगा।
रजिस्टर में नाम चढ़ा... लेकिन काटने की हिम्मत नहीं हुई
शिवांशु की क्लास इंचार्ज नीतू ने बताया कि वह एनएसएस कैडेट था और 12 अगस्त को होने वाले वॉलीबॉल टूर्नामेंट के लिए टीम में चुना गया था। 30 जुलाई को उसने स्कूल को व्हाट्सएप पर 10 दिन की छुट्टी की अर्जी भेजी थी। शुक्रवार को उन्होंने रजिस्टर में उसका नाम दर्ज किया, लेकिन शनिवार को उसे काटने की हिम्मत नहीं हुई। सोमवार को स्कूल में उसकी स्मृति में मौन रखा जाएगा।
मोहल्ले के हर घर का बेटा थे बिट्टू और शिवांशु
पड़ोसियों ने बताया कि मोहल्ले में किसी को भी जरूरत होती तो सबसे पहले बिट्टू और शिवांशु पहुंचते थे। दोनों हंसमुख, मददगार और संस्कारी थे। कभी किसी की बात का बुरा नहीं मानते थे। शनिवार को लोग बार-बार यही कहते रहे... आज सिर्फ तीन परिवार नहीं, पूरा सेक्टर-30 अनाथ हो गया है।