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छत्तीसगढ़ के शिवालय: कल्चुरी कालीन शिव मंदिर में भक्तों का उमड़ता है सैलाब, एक पत्थर से बना है पूरा मंदिर
अमर उजाला नेटवर्क, दुर्ग
Published by: Digvijay Singh
Updated Mon, 21 Jul 2025 05:04 PM IST
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सार
दुर्ग में देवबलोदा स्थित कल्चुरी कालीन शिव मंदिर में पूजन और जलाभिषेक करने भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। इस मंदिर में सावन माह में शिव भक्तों की भीड़ बड़ी संख्या में मंदिर में आते है।
छत्तीसगढ़ के शिवालय
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दुर्ग में देवबलोदा स्थित कल्चुरी कालीन शिव मंदिर में पूजन और जलाभिषेक करने भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। इस मंदिर में सावन माह में शिव भक्तों की भीड़ बड़ी संख्या में मंदिर में आते है। शिवभक्तो की भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रबंधन से बैरिकेट्स लगाकर महिला और पुरुष का अलग अलग लाइन बनाया गया है। भीड़ के चलते कतारबद्ध होकर गर्भ गृह में प्रवेश दिया जाता है। लोगों को घंटों कतार में खड़े होकर पूजा अर्चना करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
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देवबलोदा गांव में इस प्राचीन शिव मंदिर स्थित है इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां शिवलिंग स्वयं ही भूगर्भ से उत्पन्न हुआ है।बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कलचुरी युग में 12वीं-13वीं शताब्दी में हुआ है और मंदिर का निर्माण एक ही व्यक्ति ने छमासी रात में की थी। यह पूरा मंदिर एक ही पत्थर से बना हुआ है और इसका गुम्बद आधा है। इस मंदिर के निर्माण के पीछे की कहानी यह है कि वह व्यक्ति हर रात मंदिर का निर्माण करने से पहले पास के कुंड में नहाता था। उसके बाद वहां व्यक्ति बिना वस्त्र के ही इस मंदिर के निर्माण में जुट जाता था। उस कारीगर व्यक्ति की पत्नी भी उसके काम में सहयोग करती थी।जब उसका पति मंदिर निर्माण में काम करता था तो रोज पत्नी उसके लिए खाना बना कर लाती थी लेकिन एक दिन जब वहां मंदिर का निर्माण कर रहा था तब उसकी पत्नी की जगह उसकी बहन खाना लेकर आ रही थी।जब उस व्यक्ति ने देखा कि उसकी पत्नी की जगह उसकी बहन खाना लेकर आ रही है और वह नग्न अवस्था में था तो लज्जा की वजह से मंदिर प्रांगण में बने कुंड में छलांग लगा दी। उसके बाद से आज तक वो व्यक्ति कहां गया पता नहीं चला पाया।बताया जाता है।
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भाई को कुंड में छलांग लगाते बहन ने देखा लिया जिसके बाद बहन ने भी मंदिर के बगल में तालाब में छलांग लग दी जिसके बाद इस तालाब का नाम करसा तालाब के नाम से जाना जाता है। व्यक्ति के कुंड में छलांग लगाने के बाद से इस मंदिर का गुम्बद आधा ही है। इसलिए यह प्राचीन मंदिरों में एकलौता ऐसा मंदिर है, जिसकी गुम्बद आधी बनी हुई है इस मंदिर के चारों तरफ अद्भुत कारीगिरी की गई है।मंदिर के चारों तरफ देवी देवताओं के प्रतिबिंब बनाए गए हैं, जिसे देख कर ऐसा लगता है कि 12वीं-13वीं शताब्दी के बीच लोग कैसे रहते थे. भगवान भोलेनाथ त्रिशूल लेकर नाचते हुए, दो बैलों को लड़ते हुए, नृत्य करते हुए न जाने कई ऐसी कलाकृतियां की गई है. इसे देखकर लगता है कि उस समय जब लोग यहां रहते थे यह सब चीज यहां होता होगा।
कभी नहीं सूखता मंदिर परिसर में बने कुंड का पानी मंदिर प्रांगण के अंदर एक कुंड बना हुआ है।बताया जाता है कि इस कुंड का पानी कभी नहीं सूखता और पानी कहां से आता है इसका स्रोत भी किसी को नहीं पता।ऐसा लोगों की मान्यता है कि कुंड के अंदर एक सुरंग है जो कि छत्तीसगढ़ के आरंग के पास निकलता है. हालांकि यह सिर्फ मान्यता है इसका अब तक वैज्ञानिक या क्या पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं. कुंड के अंदर कई साल से बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां, कछुआ देखे जा सकते हैं बताया जाता है कि कुंड के अंदर एक ऐसी मछली है जो सोने की नथनी पहनी हुई है और कई साल में कभी-कभार ही दिखाई पड़ती है मंदिर परिसर में है नाग नागिन का जोड़ा बताया जाता है कि इस मंदिर प्रांगण में एक नाग-नागिन का जोड़ा भी है जो कई साल में दिखाई पड़ता है. कई बार तो लोग इन्हें भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग में लिपटे हुए भी देखा गया है।लोगों का मानना है कि आज भी है नाग-नागिन का जोड़ा इस मंदिर में विचरण करते हैं।हालांकि अब तक यह नाग-नागिन के जोड़े से कभी किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।
महाशिवरात्रि में यहाँ लगता है विशाल मेला हर साल महाशिवरात्रि के दिन यहां विशाल मेला भी लगता है।इस मेले को देवबलोदा का मेला भी कहा जाता है।दरअसल उस दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और रात से ही भगवान भोलेनाथ की शिवलिंग की पूजा करने के लिए कतार में खड़े होते हैं. यह मेला 2 दिनों तक चलता है।पूरे गांव में मेला लगने से गांव की रौनक बनी रहती है।