Exclusive: ब्रिटिश काल में ऐसा था अपना छत्तीसगढ़; 'सीपी बरार' के नाम से था मशहूर, इन राजाओं ने किया था शासन
Independence Day 2026: देश-प्रदेश में आजादी का जश्न यानी स्वतंत्रता दिवस आज धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ अंग्रेजी शासन काल का गवाह रहा है। ब्रिटिश हुकूमत की वो काले दिन को अपनी आंखों से देखा है। साल 1818 से 1830 तक की अवधि को ब्रिटिश संरक्षण काल कहा जाता है।
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Independence Day 2026: देश-प्रदेश में आजादी का जश्न यानी स्वतंत्रता दिवस आज धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ अंग्रेजी शासन काल का गवाह रहा है। ब्रिटिश हुकूमत की वो काले दिन को अपनी आंखों से देखा है। साल 1818 से 1830 तक की अवधि को ब्रिटिश संरक्षण काल कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों का शासन वर्ष 1854 से 1947 तक माना जाता है। हालांकि इस दौरान कलचुरी राजाओं ने भी छत्तीसगढ़ पर राज किया, लेकिन उनके मार्गदर्शक और सिपह सलाहकार अंग्रेज ही रहे।
छत्तीसगढ़ में कुल 14 राजवाड़े हुआ करते थे, जिसमें से एक राजवाड़ा होशंगाबाद भी था। इन राजवाड़ों में कलचुरी राजा शासन भी सरकार चलाते रहे पर सरकार की डोर पूरी तरह से अंग्रेजों के पास था। सन 1861 से 1903 तक यह क्षेत्र मध्य प्रांत के तहत रहा। जब 1903 में अंग्रेजों ने निजाम से 'बरार' लेकर नागपुर में मिला लिया, तो उसके बाद यह क्षेत्र 'सीपी बरार' के नाम से मशहूर हो गया। क्योंकि छत्तीसगढ़ का सीपी बरार में विलय था। सन 1903 से 1955 तक सीपी बरार का हिस्सा था। मध्य प्रांत बरार में कुल 15 राजवाड़े थे, उनमें से 14 राजवाड़े छत्तीसगढ़ में ही थे। एक राजवाड़ा मकड़ई होशंगाबाद हुआ करता था।
वर्ष 1854 से 1947 तक रहा ब्रिटिश हुकूमत का दौर
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र का कहना है कि छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश हुकूमत का दौर साल 1854 से 1947 तक रहा। क्योंकि मध् यकाल में छत्तीसगढ़ में कल्चुरियों ने काफी समय तक यहां पर शासन किया था। छत्तीसगढ़ में साल 1854 से अंग्रेजों का शासन शुरू हुआ। 1861 तक छत्तीसगढ़ प्रांत एक प्रशासनिक इकाई रही। उसके पहले इसे जिला भी माना जाता है। साल 1741 में भास्कर पंत ने यहां पर आक्रमण किया था। उसके बाद यहां पर मराठा साम्राज्य की स्थापना हुई।
साल 1757 से लेकर 87-88 तक बिम्बा जी भोसले ने शासन किया जो बिलासपुर के भोसले राज परिवार था। उनकी मृत्यु के बाद आनंदी बाई के बाद सूबा शासन स्थापित हुआ, जो नागपुर राजाओं को एक प्रकार से ठेके में दिया गया था।
जब शहीद वीर नारायण सिंह को दी गई फांसी
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ में अंग्रेजी सरकार के शुरू होते ही क्रांति वीर नारायण सिंह का नाम आता है। सद्दाम की क्रांति का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर के एक जेल में बंद कर दिया था, संभवत:यह जेल रायपुर कचहरी के पास स्थित था। क्योंकि उस दौरान रायपुर में कोई सेंट्रल जेल नहीं था। ऐसे में माना जाता है कि अंग्रेज शहीद वीर नारायण सिंह को यहीं पर कैद करके रखे थे। बाद में 9 दिसंबर 1857 को फांसी देने का अंग्रेजी फरमान आने पर 10 दिसंबर 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई। 18 जनवरी 1858 को उनके 17 साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया फिर 22 जनवरी 1858 को सबको फांसी दे दी गई।
इतिहासकार मिश्र ने कहा कि सन 1858 के बाद कुछ दिनों तक अंग्रेजी के काल में यह समय विराम का रहा। यहां पर विशेष रूप से रायपुर, बिलासपुर और संबलपुर जिले साल 1905 तक रहा। उसके बाद 1905 में संबलपुर से अलग होकर उड़ीसा में चला गया। फिर उत्तर छत्तीसगढ़ में सरगुजा शामिल हो गया। एक जनवरी 1906 को दुर्ग जिला बना। शासकीय दृष्टिकोण से कमिश्नरी या चीफ कमिश्नर या डिप्टी कमिश्नर अलग-अलग एरिया बंटे हुए थे। सरगुजा से बस्तर, रायगढ़ से खैरागढ़ तक था। यहाँ पर राज भारतीय नरेश करते थे पर शासकीय नियंत्रण अंग्रेजों का ही था। वहीं खालसा भूमि में रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर का क्षेत्र हुआ करता था। हालांकि समय-समय में परिसीमन के बाद बदलाव होते रहा। जिला, तहसील, मुख्यालय अलग-अलग पद होते रहे।
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