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Raigarh News: लद्दाख तक पहुंचा रायगढ़ का 'केलो’ जैविक जवाफूल चावल, स्थानीय लोगों ने जताया आभार

अमर उजाला नेटवर्क, रायगढ़ Published by: रायगढ़ ब्यूरो Updated Mon, 06 Apr 2026 07:30 PM IST
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सार

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र लैलूंगा से केलो जैविक जवाफूल चावल अब लद्दाक तक पहुंचने लगा है। जिससे वहां के लोग चावल की खुशबू और गुणवत्ता से प्रभावित होकर लैलूंगा का आभार जताया है।

Raigarh Kelo Organic Jawaphool Rice Reaches Ladakh Locals Express Gratitude
लद्दाख तक पहुंचा लैलूंगा का केलो जवाफूल चावल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र लैलूंगा से 'केलो' जैविक जवाफूल चावल अब लद्दाख तक पहुंचने लगा है। वहां के लोग चावल की खुशबू और गुणवत्ता से प्रभावित हुए हैं। उन्होंने लैलूंगा और रायगढ़ जिला प्रशासन का आभार जताया है।

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लैलूंगा क्षेत्र से भेजा गया यह चावल लद्दाख के कारगिल जिले के गरकोन गांव तक पहुंच गया है। स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने चावल के पैकेट खोले। चावल की खुशबू और गुणवत्ता ने सभी को प्रभावित किया, जिसकी उन्होंने सराहना की। लद्दाख से साझा किए गए वीडियो में नागरिकों ने रायगढ़ जिला प्रशासन का धन्यवाद किया।
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उन्होंने सुगंधित चावल लद्दाख तक पहुंचाने की मांग पूरी करने के लिए आभार व्यक्त किया। कुछ समय पहले गरकोन गांव के एक उपभोक्ता ने वीडियो के माध्यम से इस चावल में रुचि दिखाई थी। इसके बाद रायगढ़ से चावल और उसके बीज पार्सल के जरिए भेजे गए थे। जवाफूल धान की प्रमुख विशेषता इसकी प्राकृतिक सुगंध और स्वाद है। यह लैलूंगा क्षेत्र की विशेष जलवायु में विकसित होती है।

कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि लैलूंगा क्षेत्र में किसान सुगंधित 'जवाफूल' चावल की खेती कर रहे हैं। इसकी खेती के लिए पांच किसान उत्पादक संगठन बनाए गए हैं। इनमें एक हजार से अधिक किसान जुड़े हुए हैं और संगठित रूप से उत्पादन कर रहे हैं। 'जवाफूल' चावल के प्रचार-प्रसार के लिए यूट्यूब चैनल का भी उपयोग किया जा रहा है। जिला प्रशासन इस फसल को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और बीज उपलब्ध कराया जा रहा है। किसान समूहों और एफपीओ के माध्यम से उत्पादन और विपणन को संगठित किया जा रहा है। 'केलो' जैविक जवाफूल चावल अब एक मजबूत पहचान बन चुका है। यह किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक है। इसकी मांग अब छत्तीसगढ़ से बाहर बेंगलुरु, चेन्नई, तेलंगाना और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में भी बढ़ रही है।

 

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