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धर्मांतरण कानून पर बढ़ा विवाद: हाईकोर्ट पहुंचा मामला, मंत्री बोले- 'गलत काम करने वालों की घबराहट'
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Fri, 17 Apr 2026 04:49 PM IST
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सार
छत्तीसगढ़ में लागू हुए धर्म स्वतंत्रता कानून 2026 को लेकर सियासत और कानूनी बहस तेज हो गई है। मसीही समाज के प्रतिनिधि क्रिस्टोफर पॉल ने इस कानून के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर इसके प्रावधानों को चुनौती दी है।
स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, छत्तीसगढ़ शासन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
छत्तीसगढ़ में लागू हुए धर्म स्वतंत्रता कानून 2026 को लेकर सियासत और कानूनी बहस तेज हो गई है। मसीही समाज के प्रतिनिधि क्रिस्टोफर पॉल ने इस कानून के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर इसके प्रावधानों को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि कानून के कुछ प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
वहीं, इस पूरे मामले पर स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि जो लोग इस कानून के खिलाफ विरोध कर रहे हैं या अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं, वे खुद अपने कृत्यों पर संदेह जता रहे हैं। उनके मुताबिक, अगर सब कुछ सही होता तो इस तरह की प्रतिक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती।
सरकार का कहना है कि यह कानून जबरन, लालच या धोखे से किए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए बनाया गया है। नए प्रावधानों के तहत ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
दूसरी ओर, ईसाई समुदाय के लोगों का तर्क है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता और निजी अधिकारों में हस्तक्षेप करता है। उनका मानना है कि संविधान के तहत हर नागरिक को अपनी आस्था चुनने की स्वतंत्रता है, जिसे इस कानून के जरिए सीमित किया जा रहा है।
गौरतलब है कि राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून लागू हो चुका है और इसके खिलाफ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी जारी हैं। अब इस पूरे विवाद पर अंतिम फैसला न्यायालय में होने वाली सुनवाई के बाद ही साफ हो पाएगा।
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वहीं, इस पूरे मामले पर स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि जो लोग इस कानून के खिलाफ विरोध कर रहे हैं या अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं, वे खुद अपने कृत्यों पर संदेह जता रहे हैं। उनके मुताबिक, अगर सब कुछ सही होता तो इस तरह की प्रतिक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती।
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सरकार का कहना है कि यह कानून जबरन, लालच या धोखे से किए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए बनाया गया है। नए प्रावधानों के तहत ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
दूसरी ओर, ईसाई समुदाय के लोगों का तर्क है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता और निजी अधिकारों में हस्तक्षेप करता है। उनका मानना है कि संविधान के तहत हर नागरिक को अपनी आस्था चुनने की स्वतंत्रता है, जिसे इस कानून के जरिए सीमित किया जा रहा है।
गौरतलब है कि राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून लागू हो चुका है और इसके खिलाफ प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन भी जारी हैं। अब इस पूरे विवाद पर अंतिम फैसला न्यायालय में होने वाली सुनवाई के बाद ही साफ हो पाएगा।

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