आरएसएस के 100 वर्ष: नागपुर में जन्मे दो संगठन, एक मना रहा शताब्दी वर्ष दूसरा हुआ अप्रासंगिक
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वर्ष 1925 में नागपुर में स्थापित होने के बाद वर्ष 1929 में वर्धा और वर्ष 1932 में पुणे में शुरुआत हुई थी। वर्ष 1929 में संघ की शाखाओं की संख्या मात्र 37 थी, जो वर्ष 1933 में बढ़कर 125 हो गई।
- डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सीधे राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखा, लेकिन संगठनात्मक शक्ति और वैचारिक प्रशिक्षण पर जोर दिया।
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूरे हो गए हैं। वर्ष 1925 में विजयादशमी (तब 27 सितंबर) को संघ की नागपुर में स्थापना हुई है। संघ की स्थापना से दो वर्ष पूर्व कांग्रेस सेवादल बन चुका था। जहां संघ का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना था। वहीं कांग्रेस सेवादल युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संगठन व अनुशासन का प्रशिक्षण देने और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी के लिए बनाया गया था, यानी दोनों संगठनों को 100 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन एक संगठन (संघ) दुनिया का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन बन चुका है तो दूसरा (सेवादल) अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।
कांग्रेस पार्टी आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोर विरोध में खड़ी है और संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को लेकर हमलावर है। बतौर विपक्ष उसका विरोध सही कहा जा सकता है, लेकिन क्या कांग्रेस को यह नहीं सोचना चाहिए कि संघ से पहले बना उसका सेवादल क्यों अप्रासंगिक हो चुका है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वर्ष 1925 में नागपुर में स्थापित होने के बाद वर्ष 1929 में वर्धा और वर्ष 1932 में पुणे में शुरुआत हुई थी। वर्ष 1929 में संघ की शाखाओं की संख्या मात्र 37 थी, जो वर्ष 1933 में बढ़कर 125 हो गई। कुछ ही वर्षों में संघ पूरे देश में फैल गया। उस समय संघ के संस्थापक व प्रथम सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने एक पत्र में लिखा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य हमने किसी एक नगर या प्रांत के लिए आरंभ नहीं किया है।
अपने अखिल हिंदुस्थान देश को यथाशीघ्र सुसंगठित करके हिंदू समाज को स्वसंरक्षण एवं बलसंपन्न बनाने के उद्देश्य से इसे प्रारंभ किया गया है। यही कारण है कि बिना सरकारी सहयोग के आज संघ की देश में 83 हजार से अधिक शाखाएं संचालित होती हैं और इसके लाखों सदस्य हैं।
वर्ष 1923 में नागपुर अधिवेशन के बाद कांग्रेस ने अपने स्वयंसेवी संगठन को औपचारिक रूप से स्थापित किया था, जिसे आगे चलकर कांग्रेस सेवादल कहा गया। डॉ.एन.एस. हार्डिकर इसके संस्थापक थे। इसका उद्देश्य महात्मा गांधी के अहिंसक संघर्ष और सत्याग्रह के सिद्धांतों को युवाओं में उतारना था।
1930 के दशक में सेवादल के अध्यक्ष रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू मानते थे कि स्वतंत्रता संग्राम को केवल बुज़ुर्ग नेतृत्व से नहीं, बल्कि अनुशासित युवाओं की ताकत से ही गति मिलेगी। उन्होंने सेवादल को युवाओं का कांग्रेस का ‘सैनिक संगठन’ कहा था। तब सेवादल ने स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की ताकत बढ़ाने का काम किया।
आरएसएस- संगठनात्मक शक्ति और वैचारिक प्रशिक्षण पर जोर
डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सीधे राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखा, लेकिन संगठनात्मक शक्ति और वैचारिक प्रशिक्षण पर जोर दिया। यही कारण है कि संघ की शाखाओं के माध्यम से युवाओं को अनुशासन, खेल, शिक्षा एवं सांस्कृतिक मूल्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है।
हालांकि, संघ ने वर्ष 1951 में राजनीतिक पार्टी भारतीय जनसंघ को संगठनात्मक सहयोग दिया। जनसंघ का उद्देश्य कांग्रेस के वर्चस्व के विकल्प के रूप में एक राष्ट्रवादी पार्टी खड़ी करना था, जिसकी सोच एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र की थी।
संघ के प्रचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जनसंघ के प्रमुख चेहरे बने। फिर वर्ष 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई, जिसने जनसंघ की धारा को आगे बढ़ाया।
कांग्रेस और कमजोर होता सेवादल
स्वतंत्रता के बाद देश में कांग्रेस की कई सरकारें रहने के बावजूद सेवादल की वर्तमान स्थिति बेहद कमजोर है। जहां कभी इसके लाखों सदस्य थे, आज इसकी सक्रियता सीमित है। सेवादल का काम कांग्रेस के कार्यक्रमों, चुनाव अभियानों में सहयोग करना, प्रशिक्षण शिविर, रैलियों, विरोध प्रदर्शनों में भाग लेना, युवाओं को कांग्रेस की विचारधारा से जोड़ने की कोशिश करना है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस संगठन को कांग्रेसी ही अहमियत नहीं देते हैं।
यही कारण है कि सेवादल का ढांचा कमजोर हो चुका है। यह युवाओं को आकर्षित नहीं कर पाता है। सेवादल में संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक कार्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी पकड़ नहीं है।
अपनी 100 वर्ष की यात्रा के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। स्वतंत्रता के बाद तीन बार संघ पर कांग्रेस की सरकारें प्रतिबंध लगा चुकी हैं, लेकिन हर बार संघ पहले से अधिक शक्तिशाली होकर उभरा है। संघ के दो प्रचारक (अटल बिहारी वाजपेयी व नरेंद्र मोदी) देश के प्रधानमंत्री बने हैं। अनेक प्रचारक केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, प्रदेशों के मुख्यमंत्री रहे हैं।
संघ के भाजपा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय किसान संघ, लघु उद्योग भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, हिन्दू जागरण मंच, स्वदेशी जागरण मंच, संस्कार भारती जैसे अनेक संगठन हैं, जो सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।
दूसरी ओर, कांग्रेस सेवादल आज केवल कांग्रेस का सहायक संगठन बनकर रह गया है, जबकि संघ आज भारत की राजनीति, समाज और संस्कृति में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। कांग्रेस को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अंधविरोध करने के बजाय आत्मावलोकन करने की आवश्यकता है। कांग्रेस को चाहिए कि वो केवल विरोध के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध नहीं करे, बल्कि स्वयं अपने संगठनों को मजबूत करे।
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