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जिजीविषा: वापसी ‘संतुलन’ की ओर, लौट रहा है युवा भारत समग्र स्वास्थ्य की ओर

Ananya Mishra अनन्या मिश्रा
Updated Tue, 07 Apr 2026 04:00 PM IST
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सार

भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच आज का युवा केवल शारीरिक फिटनेस ही नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन और आंतरिक शांति की ओर भी कदम बढ़ा रहा है। विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर यह बदलाव ‘होलिस्टिक वेलनेस’ की नई सोच को दर्शाता है, जहां योग, ध्यान और संतुलित जीवनशैली फिर से केंद्र में आ गए हैं।

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समग्र स्वास्थ्य की ओर लौट रहा युवा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

भागती हुई जिंदगी के बीच आजकल एक दिलचस्प दृश्य उभर रहा है, जहां युवा सुबह की शुरुआत केवल मोबाइल स्क्रीन से नहीं, बल्कि श्वास पर ध्यान केंद्रित करके कर रहा है। यह बदलाव साधारण नहीं है। यह उस पीढ़ी का संकेत है, जिसने अत्यधिक गति, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल जीवन के बीच यह समझना शुरू किया है कि सफलता और संतुलन दो अलग-अलग चीजें नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। आज का युवा केवल ‘फिट’ दिखना नहीं चाहता; वह भीतर से स्थिर, सजग और संतुलित महसूस करना चाहता है।

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अब केवल शरीर का स्वस्थ होना पर्याप्त नहीं
आज जब हम विश्व स्वास्थ्य दिवस की चर्चाएं करते हैं, भारत का युवा एक नई कहानी लिखना प्रारंभ कर चुका है, जिसमें देश में पुनः समग्र स्वास्थ्य, यानी ‘होलिस्टिक वेलनेस’ की ओर वापसी दिखाई दे रही है। पिछले एक दशक में स्वास्थ्य का अर्थ तेजी से बदला है। पहले यह मुख्यतः शारीरिक स्वस्थता तक सीमित था। इसमें जिम जाना, डाइटिंग, कैलोरी काउंटिंग और शरीर की आकृति कैसी दिखती है, इस पर ध्यान केंद्रित था। लेकिन 2026 तक आते-आते यह स्पष्ट हो गया है कि केवल शरीर का स्वस्थ होना पर्याप्त नहीं है।

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नींद की कमी, चिंता, मानसिक थकान और निरंतर डिजिटल उत्तेजना ने युवाओं को यह एहसास कराया है कि स्वास्थ्य एक बहुस्तरीय अनुभव है, जिसमें शरीर, मन और चेतना तीनों शामिल हैं। यही कारण है कि योग, ध्यान और प्राणायाम जैसे अभ्यास, जो कभी परंपरागत या “धीमे” माने जाते थे, आज पुनः चर्चा में आ गए हैं।

वेलनेस इंडस्ट्री का आकार लगातार बढ़ रहा
यह परिवर्तन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा भी है। विश्व स्तर पर वेलनेस इंडस्ट्री का आकार लगातार बढ़ रहा है और मानसिक स्वास्थ्य, माइंडफुलनेस तथा ध्यान से जुड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। भारत में भी करोड़ों युवा आज योग ऐप्स, मेडिटेशन प्लेटफ़ॉर्म्स और ब्रीद-वर्क प्रैक्टिसेज़ का उपयोग कर रहे हैं। लेकिन इस प्रवृत्ति की विशेषता यह है कि यह केवल तकनीक-आधारित नहीं है; यह परंपरा और आधुनिकता के मिलन का उदाहरण है।

भारतीय युवा अब योग को केवल एक व्यायाम के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन के रूप में देखने लगा है। वह समझने लगा है कि “योग” का अर्थ केवल आसनों तक सीमित नहीं, बल्कि ‘युज्’ धातु से निकला वह भाव है, जो शरीर को मन से और मन को चेतना से जोड़ता है। इसी तरह प्राणायाम केवल श्वास की तकनीक नहीं, बल्कि उस ऊर्जा का विज्ञान है, जो शरीर और मन के बीच संतुलन स्थापित करता है। जब युवा इन अभ्यासों को अपनाता है, तो वह केवल तनाव कम नहीं करता, बल्कि अपने भीतर एक स्थिर केंद्र की खोज भी करता है।

अब परंपरा और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं
यहां आधुनिक विज्ञान भी इस परंपरा की पुष्टि करता दिखाई देता है। शोध बताते हैं कि नियमित ध्यान और श्वास-प्रक्रियाएं तनाव हार्मोन (कॉर्टिसोल) को कम करती हैं, एकाग्रता बढ़ाती हैं और मानसिक स्पष्टता में सुधार लाती हैं। योग और माइंडफुलनेस के अभ्यास नींद की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं और भावनात्मक संतुलन को मजबूत करते हैं। इस प्रकार, जो कभी आध्यात्मिक अभ्यास माने जाते थे, वे आज वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित स्वास्थ्य साधन भी बन चुके हैं। अर्थात, अब परंपरा और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी बनते जा रहे हैं।

लेकिन इस परिवर्तन का सबसे गहरा आयाम केवल शारीरिक या मानसिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। आज का युवा धर्म के पारंपरिक ढांचे में संभवतः उतना सम्मिलित न हो, किंतु वह अर्थ, उद्देश्य और आत्म-संबंध की खोज से दूर नहीं गया है। योग, ध्यान और आंतरिक अनुशासन के माध्यम से वह उस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करता है, जो सदियों से मानव के केंद्र में रहा है: “मैं कौन हूं?”

बाहरी उपलब्धियां भीतर शांति के बिना अधूरी
आध्यात्मिकता यहां किसी अनुष्ठान या विश्वास तक सीमित नहीं, बल्कि एक अनुभव बन जाती है अपने भीतर के शोर को शांत करने का, अपने विचारों को देखने का और अपने अस्तित्व के साथ एक गहरा संबंध स्थापित करने का। यही कारण है कि आज ध्यान केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि स्वयं से मिलने का माध्यम बनता जा रहा है। युवा अब यह समझने लगा है कि बाहरी उपलब्धियां चाहे जितनी भी हों, यदि भीतर शांति नहीं है, तो वे अधूरी हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि यह बदलाव केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा। टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी योग स्टूडियो, ध्यान केंद्र और वेलनेस समुदाय तेजी से उभर रहे हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को गति दी है। यह भी सत्य है कि सोशल मीडिया जहां एक ओर तनाव का कारण बन सकता है, वहीं दूसरी ओर यह ज्ञान और अभ्यास का प्रसार भी करता है। आज हजारों युवा ऑनलाइन सत्रों, वेलनेस कंटेंट और समुदायों के माध्यम से इन प्रथाओं से जुड़ रहे हैं।

फिर भी, इस प्रवृत्ति के सामने एक चुनौती भी है। इसे “ट्रेंड” बनाकर सतही न कर दिया जाए। योग यदि केवल फोटो का माध्यम बन जाए, ध्यान यदि केवल उत्पाद बन जाए और वेलनेस यदि केवल बाज़ार की वस्तु बन जाए, तो उसका मूल अर्थ खो सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि युवा इस दिशा में बढ़ते हुए गहराई और अनुशासन को भी महत्व दें, न कि केवल त्वरित परिणामों को।

युवा भारत की यह वापसी कई वर्षों पीछे लौटने की कहानी नहीं है, बल्कि एक संतुलित भविष्य की ओर अग्रसर होने की प्रक्रिया है। यह उस समझ का परिणाम है कि प्रगति केवल बाहर की नहीं, भीतर की भी होनी चाहिए। योग, ध्यान और समग्र स्वास्थ्य की ओर यह झुकाव हमें यह याद दिलाता है कि आधुनिकता और परंपरा विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं, यदि उन्हें सही दृष्टि से अपनाया जाए।

शायद यही 2026 का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है कि भारत का युवा केवल आगे बढ़ना नहीं चाहता, बल्कि संतुलन के साथ आगे बढ़ना चाहता है। और इसी संतुलन में ही वह शक्ति छिपी है, जो उसे न केवल सफल, बल्कि वास्तव में स्वस्थ और संतुष्ट बना सकती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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