युद्ध की दुनिया में एआई की एंट्री: पश्चिम एशिया के हालात से भारत को सीखनी होगी सुरक्षा की नई रणनीति
डिजिटल दौर में युद्ध का तरीका तेजी से बदल रहा है, जहां साइबर हमले और एआई नई ताकत बनकर उभर रहे हैं। पश्चिम एशिया के संघर्ष ने दिखा दिया है कि अब आम तकनीक भी युद्ध का अहम हिस्सा बन सकती है।
विस्तार
आने वाले युद्ध मिसाइलों या सैनिकों से ही शुरू नहीं होंगे। वे शुरू हो सकते हैं एक हैक किए गए कैमरा नेटवर्क से, छेड़छाड़ की गई डाटा फीड से, किसी अस्पताल की प्रणाली में सेंध लगाकर या ऐसे एआई सिस्टम से जो लाखों डिजिटल सूचनाओं में से अपने निशाने चुन रहे हों। यही पश्चिम एशिया के वर्तमान संघर्ष का सबसे स्पष्ट सबक है। युद्धक्षेत्र अब केवल भौतिक नहीं रहा। यह डिजिटल है, आपस में जुड़ा हुआ है और आम नागरिकों की तकनीक से गहराई से जुड़ा हुआ है।
हाल की रिपोर्टें दिखाती हैं कि आधुनिक संघर्ष अब साइबर हमलों, निगरानी प्रणालियों और एआई आधारित विश्लेषण के साथ चल रहे हैं। खबरों के मुताबिक ईरान के कैमरा नेटवर्क की कमजोरियों का फायदा उठाकर लक्ष्यों की पहचान और ट्रैकिंग अधिक सटीक तरीके से की गई। अलग रिपोर्टों में स्पाइवेयर, बाधा डालने वाले साइबर हमले और डिजिटल दबाव के तरीके सामने आए हैं जो इस संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं। यूरोप की सेनाएं भी एआई टूल्स का इस्तेमाल बढ़ा रही हैं ताकि युद्ध से जुड़ी जानकारी का विश्लेषण तेजी से हो सके, जबकि अंतिम नियंत्रण इंसानों के पास ही रहे।
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भारत को इन घटनाओं को गंभीरता से समझना चाहिए। आज के डिजिटल समाज में नागरिक ढांचे और राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे के बीच की सीमा बहुत पतली हो चुकी है। ट्रैफिक प्रबंधन, पुलिस निगरानी, गेटेड कॉलोनियों, लॉजिस्टिक्स और नगर सेवाओं में लगे कैमरे सामान्य समय में उपयोगी लगते हैं। लेकिन संकट के समय यही असुरक्षित नेटवर्क दुश्मन के लिए खुफिया साधन बन सकते हैं। यही बात टेलीकॉम सिस्टम, क्लाउड से जुड़े सेंसर, मैपिंग प्लेटफॉर्म, औद्योगिक नियंत्रण प्रणालियों और अन्य डिजिटल व्यवस्थाओं पर भी लागू होती है, जो हमारी गतिविधियों और कमजोरियों की जानकारी देते हैं। सीधी बात यह है कि जो भी सिस्टम देखता है, डाटा रखता है, उसे भेजता है या किसी महत्वपूर्ण काम की पुष्टि करता है, वह भविष्य के युद्ध का हिस्सा बन सकता है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है गति। एआई सिस्टम डाटा संग्रह, विश्लेषण और कार्रवाई के बीच का समय बहुत तेजी से कम कर रहे हैं। कोई इंसान इतनी तेजी से निगरानी फीड और पैटर्न का विश्लेषण नहीं कर सकता। लेकिन एआई सिस्टम बड़े पैमाने पर डाटा को तुरंत समझ सकता है, गतिविधियों के पैटर्न पहचान सकता है और तय कर सकता है कि किस पर पहले ध्यान देना चाहिए। यह पूरी तरह स्वचालित युद्ध नहीं है, बल्कि इतनी तेज निर्णय सहायता है कि थोड़ी सी देरी भी भारी पड़ सकती है। यही आधुनिक युद्ध की प्रकृति को बदल रहा है।
साइबर हमलों का महत्व सिर्फ मोर्चे तक सीमित नहीं है। वे दूर बैठे पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं। हाल की रिपोर्टों में अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं पर हमलों का जिक्र है। धोखाधड़ी वाले संदेशों के जरिए आम लोगों के फोन में स्पाइवेयर डाला गया। एप्स, वेबसाइट और सरकारी सेवाएं निशाने पर रहीं। ये हमले सिर्फ सिस्टम बंद नहीं करते, बल्कि डर पैदा करते हैं, लोगों का भरोसा कमजोर करते हैं और संकट से निपटने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
भारत के लिए असली सवाल यह नहीं है कि क्या ऐसा ही युद्ध यहां होगा। असली सवाल यह है कि क्या हमारी डिजिटल व्यवस्था इस सोच के साथ बनाई गई है कि संकट के समय हर कमजोरी का फायदा उठाया जाएगा। भारत ने तेजी से डिजिटल प्रगति की है। सार्वजनिक सेवाएं, परिवहन, बैंकिंग, संचार और निगरानी सब डिजिटल हो चुके हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा को केवल आईटी समस्या समझना एक बड़ी भूल है। कमजोर डिवाइस प्रबंधन, देर से अपडेट, डिफॉल्ट पासवर्ड, बिखरी जिम्मेदारी और कमजोर एक्सेस नियंत्रण अब छोटी तकनीकी खामियां नहीं हैं। संकट में यही राष्ट्रीय सुरक्षा की कमजोरियां बन जाती हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए पांच स्पष्ट कदम जरूरी हैं
पहला- निगरानी नेटवर्क को महत्वपूर्ण सुरक्षा ढांचे के रूप में देखा जाए। सार्वजनिक कैमरों की पहचान की जाए, उन्हें सुरक्षित नेटवर्क में रखा जाए और उनकी सुरक्षा मजबूत की जाए। इंटरनेट पर खुले कमजोर डिवाइस केवल गोपनीयता का नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी खतरा हैं।
(लेखक: लंदन में रहते हैं और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा व प्रौद्योगिकी विषयों पर लगातार लिख रहे हैं)
दूसरा- सभी महत्वपूर्ण डिजिटल सिस्टम में पहचान और एक्सेस नियंत्रण को मजबूत किया जाए। किसी सिस्टम का नियंत्रण खोना उसे बंद होने से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। एडमिन अकाउंट, रिमोट एक्सेस, वेंडर लॉगिन और क्लाउड नियंत्रण को विशेष सुरक्षा दी जानी चाहिए।
तीसरा- विभिन्न क्षेत्रों में मिलकर काम करने वाली संकट तैयारी विकसित की जाए। अस्पताल, ऊर्जा, टेलीकॉम, बंदरगाह, परिवहन और सरकारी संस्थाएं केवल सामान्य आपदाओं के लिए नहीं, बल्कि साइबर संकट के लिए भी तैयार रहें, जहां डिजिटल हमले और गलत जानकारी एक साथ सामने आएं।
चौथा- एआई आधारित रक्षा और जोखिम विश्लेषण की क्षमता विकसित की जाए। इसका मतलब मशीनों को पूरी तरह नियंत्रण देना नहीं है, बल्कि एआई की मदद से तेज और बेहतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है, वह भी मानव नियंत्रण और नैतिक ढांचे के साथ।
पांचवां- सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग मजबूत किया जाए। देश का बड़ा डिजिटल ढांचा सरकार के पास नहीं है। यह टेलीकॉम कंपनियों, क्लाउड प्रदाताओं, अस्पतालों, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और अन्य संस्थाओं के पास है। अगर युद्ध इन नेटवर्कों के जरिए लड़ा जाएगा, तो तैयारी भी मिलकर करनी होगी।
पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा सबक यह है कि साइबर और एआई अब युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि सामान्य डिजिटल सिस्टम ही ताकत भी बन सकते हैं और कमजोरी भी। जो कैमरा शांति में सुरक्षा देता है, वही युद्ध में निशाने तय करने का साधन बन सकता है। जो मोबाइल फोन रोजमर्रा का उपकरण है, वही जासूसी का माध्यम बन सकता है। जो क्लाउड सेवा सुविधा देती है, वही संकट में जोखिम बन सकती है।
भारत को यह समझना होगा कि भविष्य की सुरक्षा केवल नई तकनीक खरीदने से नहीं आएगी। असली सुरक्षा इस बात में है कि हम अपनी मौजूदा तकनीक को कितनी गंभीरता से सुरक्षित करते हैं। हर जुड़ी हुई प्रणाली एक तरफ सुविधा देती है, दूसरी तरफ जोखिम भी पैदा करती है।
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