सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   arjun tendulkar trolling on social media Sachin Tendulkar son turns waterboy in ipl

विमर्श: महान सचिन तेंदुलकर के पुत्र अर्जुन की ट्रोलिंग कितनी जायज?

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 07 Apr 2026 02:20 PM IST
विज्ञापन
सार

भारतीय क्रिकेट का इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा है, जहां महान खिलाड़ियों के बेटे उसी ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाए। अर्जुन तेंदुलकर की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे सचिन तेंदुलकर के बेटे हैं। शायद यही उनकी सबसे बड़ी मुश्किल भी है।

arjun tendulkar trolling on social media Sachin Tendulkar son turns waterboy in ipl
अर्जुन तेंदलुकर (फाइल फोटो) - फोटो : BCCI
विज्ञापन

विस्तार

भारतीय क्रिकेट में जब भी ‘तेंदुलकर’ नाम सामने आता है तो वह सिर्फ एक उपनाम नहीं रहता, अपितु करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ एक एहसास बन जाता है। यह नाम उम्मीदों, यादों और गौरव का प्रतीक है, लेकिन यही नाम आज अर्जुन तेंदुलकर के लिए आसान नहीं, बल्कि एक तरह की चुनौती बन गया है।

Trending Videos


एक ऐसी चुनौती, जहां हर कदम पर तुलना, शक और आलोचना उनका इंतजार करती है। हाल में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें अर्जुन अपने साथियों के लिए मैदान पर ‘ड्रिंक्स’ लेकर जा रहे थे। क्रिकेट में यह एक सामान्य बात है, टीम भावना का हिस्सा है, लेकिन जिस तरह इस छोटे से काम को ‘नेपोटिज्म’ और ‘अहंकार’ के चश्मे से देखा गया और उन्हें ट्रोल किया गया, वह सोचने पर मजबूर करता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


क्या हम खेल को अब खेल की तरह देखना भूलते जा रहे हैं? या हर चीज में किसी न किसी तरह का विवाद खोज लेना हमारी आदत बन गई है?

‘स्टार किड’ होने की सजा?

अर्जुन तेंदुलकर की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे सचिन तेंदुलकर के बेटे हैं। शायद यही उनकी सबसे बड़ी मुश्किल भी है। एक ‘स्टार किड’ होने के कारण उन्हें मिलने वाले हर मौके पर सवाल उठता है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि क्रिकेट ऐसा खेल है, जहां अंत में नाम नहीं, प्रदर्शन बोलता है।

यदि अर्जुन में प्रतिभा नहीं होती तो वे रणजी ट्रॉफी के अपने पहले ही मैच में शतक नहीं बनाते। वे प्रथम श्रेणी क्रिकेट में पांच विकेट लेने जैसा प्रदर्शन नहीं कर पाते। मुंबई जैसी मजबूत टीम छोड़कर गोवा से खेलने का उनका फैसला भी यही दिखाता है कि वे आसान रास्ता नहीं, बल्कि अपनी मेहनत से जगह बनाना चाहते हैं।

क्रिकेट में ‘नेपोटिज्म’

अक्सर लोग क्रिकेट और फिल्मों में ‘नेपोटिज्म’ की तुलना करने लगते हैं, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। फिल्मों में कोई स्टार किड कई बार असफल होने के बावजूद मौके पाता रहता है, लेकिन क्रिकेट के मैदान पर कोई भी गेंदबाज यह नहीं देखता कि सामने बल्लेबाज किसका बेटा है।

150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आती गेंद सिर्फ एक चीज पहचानती है, आपकी क्षमता। भारतीय क्रिकेट का इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा है, जहां महान खिलाड़ियों के बेटे उसी ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाए।

सुनील गावस्कर के बेटे रोहन गावस्कर ने अच्छा खेला, लेकिन तुलना का दबाव उनके साथ हमेशा बना रहा। लाला अमरनाथ के बेटे मोहिंदर अमरनाथ ने खुद को साबित किया, लेकिन सुरिंदर अमरनाथ वैसी सफलता नहीं पा सके। स्टुअर्ट बिन्नी को भी इसी तरह की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। ये सारी कहानियां एक ही बात बताती हैं, विरासत दरवाजा खोल सकती है, लेकिन अंदर टिके रहने के लिए खुद की मेहनत ही काम आती है।

यह भी कहा जाता है कि अर्जुन को बेहतर सुविधाएं मिली हैं, जो हर खिलाड़ी को नहीं मिलतीं। यह बात सही है, लेकिन इसे सिर्फ ‘नेपोटिज्म’ कहना शायद सही नहीं होगा। यह ज्यादा एक सामाजिक असमानता का मामला है।

हर संपन्न परिवार का बच्चा बेहतर संसाधनों के साथ आगे बढ़ता है, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो। असली सवाल यह है कि क्या अर्जुन किसी और का हक छीनकर आगे बढ़े हैं? अगर हम उनके प्रदर्शन को देखें तो वे धीरे-धीरे एक सक्षम खिलाड़ी के रूप में उभरते नजर आते हैं। मैदान पर पानी पिलाने जैसी भूमिका को लेकर उनका मजाक उड़ाना दरअसल हमारी ‘ट्रोलिंग संस्कृति’ का ही हिस्सा है। जो लोग इसे अपमान समझते हैं, शायद वे खेल की असली भावना को समझ नहीं पाए हैं।

डॉन ब्रैडमैन से लेकर विराट कोहली तक, हर बड़े खिलाड़ी ने टीम के लिए ऐसे छोटे-छोटे काम किए हैं। यही टीम भावना की असली पहचान है। अर्जुन तेंदुलकर को केवल इसलिए नकार देना कि वे सचिन के बेटे हैं, उतना ही गलत है जितना किसी को सिर्फ उसके नाम के कारण आगे बढ़ा देना। उन्हें एक खिलाड़ी के रूप में देखने और समझने की जरूरत है, एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में, जो सीख रहा है, संघर्ष कर रहा है और धीरे-धीरे अपनी पहचान बना रहा है।

आखिरकार क्रिकेट में असली फैसला सोशल मीडिया नहीं, बल्कि मैदान और स्कोरबोर्ड करते हैं। वही तय करेंगे कि अर्जुन तेंदुलकर अपनी विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे या नहीं? 

तब तक शायद हमें उन्हें ट्रोल करने के बजाय थोड़ा समय और थोड़ा भरोसा देना चाहिए, क्योंकि हर खिलाड़ी को अपनी कहानी लिखने का हक होता है।


---------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed