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Middle East War: पश्चिम एशिया युद्ध के लपेटे में हिमालय भी
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सार
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने इसी मार्च में पश्चिम एशिया संघर्ष से उपजे पर्यावरणीय नुकसान पर अपने आधिकारिक वक्तव्य में स्पष्ट कहा कि तेल प्रतिष्ठानों पर हमले, विशेषकर शहरी क्षेत्रों के आसपास, भारी धुएं, विषैले कणों और दीर्घकालिक मानव-पर्यावरणीय स्वास्थ्य संकट का कारण बन रहे हैं।
हिमालय। (सांकेतिक तस्वीर)।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
दुनिया इस समय ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच तेज होते संघर्ष को मुख्यतः सामरिक, भू-राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से देख रही है।
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सुर्खियों में तेल के दाम, होर्मुज जलडमरूमध्य, पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन राजनीति, वैश्विक बाजारों की घबराहट और महाशक्तियों की कूटनीतिक चालें हैं। लेकिन इस पूरे युद्ध की एक भयावह मगर सबसे कम चर्चित और शायद सबसे दीर्घकालिक त्रासदी पर्यावरण का मौन, व्यापक और पीढ़ियों तक चलने वाला विनाश भी है।
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युद्ध के मैदान पर जो कुछ जलता है, वह केवल इमारतें, तेल डिपो, सैन्य ठिकाने और शहर नहीं होते। उसके साथ हवा की शुद्धता, मिट्टी की उर्वरता, जल की विश्वसनीयता, समुद्र की जैव विविधता और पर्वतों की बर्फ की निष्कलुष सफेदी भी जलती है। यही कारण है कि आधुनिक युद्ध को अब केवल सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि जलवायु और पारिस्थितिकी के खिलाफ संगठित हिंसा के रूप में भी समझना होगा।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने इसी मार्च में पश्चिम एशिया संघर्ष से उपजे पर्यावरणीय नुकसान पर अपने आधिकारिक वक्तव्य में स्पष्ट कहा कि तेल प्रतिष्ठानों पर हमले, विशेषकर शहरी क्षेत्रों के आसपास, भारी धुएं, विषैले कणों और दीर्घकालिक मानव-पर्यावरणीय स्वास्थ्य संकट का कारण बन रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने यह भी रेखांकित किया कि बड़े पैमाने के तेल-आग और रिसाव का इतिहास बताता है कि इनके दुष्परिणाम दशकों तक बने रहते हैं।
ईरान और मध्य पूर्व में जारी यह भीषण सैन्य संघर्ष केवल सीमाओं और संप्रभुता की लड़ाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा और अत्यंत गंभीर प्रहार सुदूर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणविदों ने निरंतर यह चेतावनी दी है कि ईरान की तेल रिफाइनरियों, गैस संयंत्रों और विशाल औद्योगिक केंद्रों से निकलने वाला विषाक्त धुएं के विशालकाय गुबार केवल स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि यह हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर तीसरे धु्रव के नाम से भी प्रचलित हिमालय के उन ग्लेशियरों तक पहुंच रहे हैं।
विदित ही है कि इस पर्यावरणीय आपदा का सबसे बड़ा वाहक ‘‘पश्चिमी विक्षोभ’’ यानी वेस्टर्न डिस्टर्बेंस है। हिमालयी क्षेत्र में सर्दियों और बसंत के मौसम में आने वाली इन हवाओं का सिलसिला भूमध्य सागर और ईरान के ऊपर से होकर ही भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ता है।
शोध बताते हैं कि ईरान के तेल डिपो और रासायनिक कारखानों के जलने से निकलने वाला जहरीला धुआं, जिसमें सल्फर डाइऑक्साइड और विभिन्न हाइड्रोकार्बन की भारी मात्रा होती है, इन वायुमंडलीय धाराओं के साथ सवारी कर सीधे हिंदूकुश और हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश कर रहा है।
इसी मार्च 2026 की सैटेलाइट इमेजरी और उच्च-क्षमता वाले कैमरों ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि ईरान के आसमान से उठने वाले गहरे धुएं के गुबार किस तरह दक्षिण एशिया की ओर एक काली चादर की तरह बढ़ रहे हैं। यह कोई सामान्य वायु प्रदूषण नहीं है, बल्कि युद्ध-जनित रसायनों का वह घातक मिश्रण है जिसके लिए हिमालय का भूगोल कभी तैयार नहीं था।
इस युद्ध ने ‘‘ब्लैक कार्बन’’ के उत्सर्जन को उस स्तर पर पहुंचा दिया है जो हिमालय के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है। जब यह बारीक कालिख उड़कर हिमालय की धवल चोटियों पर गिरती है, तो वह बर्फ की सफेदी को ढक लेती है।
विज्ञान की भाषा में इसे ‘‘एल्बेडो प्रभाव’’ का कम होना कहा जाता है। सामान्यतः सफेद बर्फ सूरज की अधिकांश रोशनी और गर्मी को परावर्तित कर देती है, जिससे तापमान नियंत्रित रहता है। लेकिन जब बर्फ पर काली कालिख की परत जम जाती है, तो वह परावर्तन के बजाय सूरज की गर्मी को सोखने लगती है।
‘‘इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट’’ ( आइसीमोड ) की मार्च 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, ब्लैक कार्बन के इस अतिरिक्त जमाव के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर सामान्य के मुकाबले पंद्रह से बीस प्रतिशत तक बढ़ गई है। यह त्वरित पिघलाव आने वाले समय में न केवल नदियों के जलस्तर को अनियंत्रित करेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल-सुरक्षा को भी खतरे में डाल देगा।
सतत विकास नीति संस्थान (एसडीपीआई) के हालिया निष्कर्ष इस भयावहता की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि युद्ध भले ही किसी एक भौगोलिक बिंदु पर लड़ा जा रहा हो, लेकिन उसका कार्बन फुटप्रिंट वैश्विक और सर्वव्यापी होता है। ईरान युद्ध की कालिख हिमालय के लिए एक ‘साइलेंट किलर’ साबित हो सकती है।
वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि यदि यह पर्यावरणीय दबाव इसी तरह बना रहा, तो ‘ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ यानी ग्लेशियर टूटने से आने वाली अचानक बाढ़ जैसी आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में भयानक वृद्धि होगी। 7 फरबरी 2021 को चमोली जिले के सीमान्त क्षेत्र धौली और ऋषिगंगा की बाढ़ एक ऐसी ही आपदा थी।
इसी मार्च में ‘‘क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टिट्यूट’’ के अध्ययन में बताया गया था कि ईरान पर हमलों के शुरुआती चौदह दिनों में ही संघर्ष से पचास लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड से अधिक उत्सर्जन हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, यह उत्सर्जन चौरासी निम्न-उत्सर्जक देशों के वार्षिक उत्सर्जन से भी अधिक है। यही वह क्रूर विडंबना है जिसमें युद्ध एक बार नहीं, कई बार पृथ्वी को जलाता है।
आइसीमोड संस्था वर्षों से यह बताती रही है कि ब्लैक कार्बन और अन्य अवशोषक एरोसोल हिमालयी हिमनदों के लिए अत्यंत खतरनाक हैं।
इस संस्था के एक विश्लेषण के अनुसार, हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में ब्लैक कार्बन लगभग अट्ठाइस प्रतिशत तक ग्लेशियर पिघलने में योगदान कर सकता है, क्योंकि यह बर्फ की सतह पर जमकर उसकी परावर्तन क्षमता को कम कर देता है। और यह खतरा किसी स्थिर पृष्ठभूमि पर नहीं आ रहा।
इसी संस्था ने 18 मार्च 2026 को जारी अपने ताजा निष्कर्षों में कहा कि हिंदू कुश-हिमालय के ग्लेशियर दो हजार के बाद से दोगुनी गति से पिघल रहे हैं। उन्नीस सौ पचहत्तर से अब तक कई स्थानों पर सत्ताईस मीटर तक बर्फ की मोटाई घट चुकी है। यह दो अरब लोगों की जल-सुरक्षा पर सीधा खतरा है।
अर्थात, यदि पहले से संकटग्रस्त हिमालय पर युद्धजनित ब्लैक कार्बन और सल्फेट भार और बढ़ता है, तो उसका प्रभाव केवल कुछ प्रतिशत अतिरिक्त पिघलाव तक सीमित नहीं रहेगाय यह ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड, असमय बाढ़, दीर्घकालिक जल-असंतुलन, पहाड़ी कृषि संकट और आपदा-श्रृंखला को तेज कर सकता है।
उत्तराखंड, हिमाचल, लद्दाख, कश्मीर, नेपाल और भूटान,ये सभी क्षेत्र उस दूरस्थ युद्ध की पर्यावरणीय कीमत चुका सकते हैं, जिसमें उन्होंने कोई पक्ष नहीं लिया। हिमालय को अक्सर तीसरा ध्रुव कहा जाता है।
ध्रुवों के बाद सबसे बड़ी बर्फीली संपदा इसी क्षेत्र में है। यही बर्फ दक्षिण एशिया की नदियों, कृषि, जलविद्युत, पेयजल और करोड़ों लोगों के जीवन-चक्र को पोषित करती है। ऐसे में यदि पश्चिम एशिया का युद्ध हिमालयी बर्फ की परावर्तन क्षमता को प्रभावित करता है, तो यह वस्तुतः भारत की जल-संरचना पर परोक्ष हमला है।
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