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स्मृति शेष आशा ताई: अपनी आवाज की शिनाख्त के लिए उन्होंने तलाशी एक नई ‘आशा’
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सार
आशा भोसले मस्ती, जिन्दादिली और जीवंतता की शिखर गायिका थीं लेकिन मूलत: वे दर्द की विलक्षण साधिका थीं। उनके गले की लर्जिश बाकमाल थी।
आशा भोसले
- फोटो : Instagram
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विस्तार
वटवृक्ष के साये में जीने का अपना मजा है लेकिन हर लम्हा इस आरोप को भी साथ ढ़ोना पड़ता है कि आप कुछ-कुछ वैसे ही हैं। आशा भोसले की गायकी भी शुरुआत में अपनी अग्रजा के दैवीय स्वर की छाया थी। उन्हें संगीतकार सुनकार अलग से पहचानें इसलिए उन्हें खासी जद्दोजहद करनी पड़ी।
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फ़ौरी तौर पर ओ.पी.नैयर और आर.डी.बर्मन का नाम जहन में आ जाता है लेकिन हकीकत ये है कि इन दोनों से पहले हंसराज बहल और सचिनदेव बर्मन ने निजी पीड़ा से छटपटा रही इस सुर देवी को बता दिया था कि तुम अलग हो।
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हालांकि ये सोला आने सच है कि जब अधिकांश संगीतकार ये तय कर चुके थे कि लता के बिना उनके संगीत की गति नहीं तब स्वाभिमानी ओंकारप्रसाद नैयर ने ही ये क़ौल किया कि मैं इस मिथक को तोडूंगा। उन्होने ये काम आशा जी से करवाया और उन्हें आश्वस्त किया कि आपकी आवाज का खरज बाकमाल है; आइये ! हम दोनों मिल कर कुछ करिश्मे कर दिखाएं। और कहते हैं न…रेस्ट इज हिस्ट्री।
निराशा से घिरी आवाज को आशा मिल गई। वह आशा जो हर मूड़ और तेवर को गा सकती थी। जिस नायिका के लिए गा रही हो उसकी देह के रोम-रोम का अक्स अपनी आवाज से दिखला सकती थी। शायद तभी यह मुहावरा गढा गया कि लता की आवाज यदि आत्मा है तो आशा की आवाज देह।
दुनिया को अलविदा कह गईं आशा ताई
सोशल मीडिया के समय में ये खबर आज आग की तरह फैली; महान गायिका आशा भोसलें नहीं रहीं! स्म्रृतियां, गीत, चित्र और आशा ताई की यश-कीर्ति के तमाम किस्से साझा किए जाने लगे। मैं जब आशा जी के निधन के कोई पांच घंटे बाद ये आलेख लिखने बैठा तो सोचा कि कहां से शुरु करूं?
गीतों के उल्लेख से या सुने-सुनाए किस्सों से या उन इंटरव्यूज के सारांश से जो कई बार सुने जा चुके हैं, पढ़े जा चुके हैं। मुझे लगा बेहतर ये होगा कि हम बात करें कि आशा भोसले की गायकी की।
ये बात निर्विवाद है कि आशा जी स्वर पट्टी में वे सारे डायमेंशन्स से थे जो प्लेबैक सिंगिंग को मालामाल करते हैं। किसी हद तक आप उनकी तुलना हरफनमौला किशोर कुमार से कर सकते हैं जिनके पास गायकी की हर रैसीपी उपलब्ध थी।
लता जी यदि हर गीत से अपने शिखर पर होने का आभास दे देती थीं तो आशा जी हर गीत से अपने लिये एक नया चैलेंज रच देती थीं। उनका गाना सतपुड़ा-विंद्याचल या अरावली पर्वतमाला की मानिंद है, जिसमें भांति-भांति की जड़ी-बूडियां मौजूद हैं जो जीवन को श्रेष्ठ आरोग्य देती हैं। आशा जी भी ऐसी जड़ी-बूटियों का पिटारा थीं। हिमालय बनकर पूजे जाने से वे हमेशा परे रहीं। वे जानती भी थीं कि हिमालय एक ही है और एक ही रहेगा।
श्वास, भाव और शब्द की विलक्षण साधिका
उन्होंने पगडंडियों से चलते हुए अपनी क़ामयाबी का राजमार्ग रचा और ख़ुद को साबित किया। वे श्वास, भाव और शब्द की विलक्षण साधिका थीं। गुलजार की नज्म मेरा सामान तो बहुत बाद में आया जिसमें आशा जी गाते-गाते बतियाती सुनाई दीं लेकिन बहुत पहले से वे अपने नग़मों से बताती रहीं कि वे आपसे बात कर रही हैं। यही चित्रपट संगीत का सबसे चुनौतीपूर्ण काम है जिसे हमारे समय की सबसे सफल आवाज ने कोई सात दशकों तक बिंदास तरीक़े से किया।
जिन्दगी का उजड़ा दयार उनके स्वर का शाश्बत भाव था। फिर भी वे टाइमिंग का ऐसा वितान रच देती थीं कि संगीतकार और गीतकार की क्रेटिड को झपट्ते में उन्हें अतिरिक्त मशक़्कत नहीं करनी पड़ती थी। वह गीत ख़ालिस आशा भोसले गीतमाला का हिस्सा हो जाता था।
आशा भोसले मस्ती, जिन्दादिली और जीवंतता की शिखर गायिका थीं लेकिन मूलत: वे दर्द की विलक्षण साधिका थीं। उनके गले की लर्जिश बाकमाल थी। कहीं वे वनवासी अंचल की निरक्षर लेकिन अलमस्त ग्वालन सी सुनाई देतीं तो कही किसी अभिजात्य घराने की ऐसी मालकिन जो अकूत सम्पदा की स्वामिनी हैं।
कई भाषाओं में गीत को दी आवाज
स्वर की सिध्दि उन्हें कुदरत से मिली थी। आशा भोसले के स्वरलोक की सैर करते हुए यदि हम मराठी, बांग्ला और कुछ गुजराती गीतों की गूगल सर्च कर लें तो पाएंगे वहां तो एक और ताक़तवर आशा भोसले हैं जो हिन्दी गीतों के समकक्ष सफलता का एक समानांतर अध्याय सिरज रही हैं। उन्हें किसी मादक गीत में शोख़ी का छोंक बख़ूबी लगाना आता था और किसी गीत-ग़जल की मासूमियत को निभाना भी।
वे नशीलेपन से रंगीन मिजाजी की जमीन भी बना सकती थीं और चाहें तो कबीरी छाप वाले कमाली के निगुणी पद ‘श्याम निकस गए मैं ना लड़ी थी’ से अपने सुर से अनहद को स्पर्श भी कर सकती थीं।
आशा भोसलें का असली स्वर-तप को समझना हो तो उस्ताद अली अकबर ख़ां के प्रायवेट एलबम लिगैसी या गु़लाम अली का ग़जल एलबम ‘मेराज ऐ ग़जल’ जरूर सुन लीजिए। आप महसूस करेंगे कि पं. दीनानाथ मंगेशकर की ये सुकन्या मौसीकी का केसर घोल के पी गई हैं।
एक भरी-पूरी उम्र जीकर आशा भोसलें चली गई हैं लेकिन वे जीते-जी एक ऐसा स्वर स्मारक रच गई हैं जिसके सामने हमेशा नतमस्तक होने को जी चाहेगा। उनकी निजी जिन्दगी के तीन पड़ाव हैं जिनमें फ़ौजी भोसलें हैं, संगीतकार ओ.पीनैयर हैं और हैं राहुलदेव बर्मन।
जाहिर है इस कालखण्ड में विद्रोह भी है, सुहावनापन भी, जिद भी और बेशुमार तल्ख़ियां भी लेकिन हर बार एक वीरांगना की तरह आशा जी अपनी मंजिल को हासिल कर मुस्कुरा रही हैं। उनकी शख़्सियत में मुखरता, स्वाभिमान, बिंदासपन है और अपनी शर्तों का प्रोफेशनलिज्म भी।
2026 चार माह का हो गया है और दे जा रहा है एक ऐसी टीस जो भुलाए नहीं भूलेगी लेकिन यह तसल्ली जरूर है कि जब भी हमें खुशी की तलाश होगी तो आशा भोसले हमेशा हमारे साथ होंगी और यदि हम किसी अवसाद या पीड़ा से घिरे होंगे तो हमारे मानस में आशा जी का ही कोई गीत अवश्य गूंज रहा होगा।
तपते वैशाख 12 अप्रैल भी 6 फरवरी 2022 की तरह ये बेसुरी खबर लाया कि भारत के एक और सिध्द स्वर का अवसान हो गया। वह भी रविवार ही था जब लता जी ने विदा ली थी। शायद दीदी स्वर्ग में बैठी सोच रही होंगी कि आशा आ जाए तो बैठ कर महफ़िल जमाएं…साथ मिल कर राग खमाज में बंधा वही गीत साथ-साथ गाएं जो मिस मैरी में हम दोनों ने गाया था…सखी री सुन बोले पपीहा उस पार।
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