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Asha Bhosle: सिने संगीत के स्वर्णयुग की अंतिम ध्वजवाहिका का स्वर्गारोहण
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सार
Asha Bhosle Passes Away: सुरों की मलिका आशा भोसले का 92 वर्ष की आयु में निधन भारतीय संगीत के एक स्वर्णिम युग का अंत है। अपनी यूनिक वर्सटैलिटी और जीवंतता से उन्होंने सात दशकों तक करोड़ों दिलों पर राज किया।
आशा भोसले
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Versatile Singer Asha Bhosle Biography: सुरों की मलिका आशा भोसले का अचानक इस फानी दुनिया से चले जाना भारतीय फिल्म संगीत और पार्श्वगायन के स्वर्ण युग की अंतिम जीवित ध्वजवाहिका का स्वर्गारोहण है। रविवार को उन्होंने 92 वर्ष के सांगीतिक जीवन के बाद मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। हालांकि उनके चाहने वालों को उम्मीद थी कि आशाजी फिर उसी मस्ती के साथ फिर सुरों के रंग बिखेरेंगी, लेकिन वैसा न हो सका।
महान संगीतकार अनिल विश्वास ने लता और आशा की अद्भुत तुलना करते हुए कहा था कि लता आत्मा से गाती हैं और आशा शरीर से। लेकिन समग्रता में ये दोनो परस्परपूरक हैं। आत्मा बिना क्या देह और देह बिना क्या आत्मा। दोनो ही आसमान से उतरी हुई ऐसी आवाजें हैं, जो सदियों में पैदा होती हैं। लताजी सादगी, पवित्रता, विनम्रता और दैवी स्वर आभा के सर्वोच्च शिखर का प्रतीक हैं तो आशाजी मानव जीवन के संघर्षों, उतार-चढ़ाव, राग द्वेष, जिजीविषा और श्रेष्ठतम को हासिल करने की अंतहीन जिद का सर्वदा फहराता ध्वजदंड हैं।
संगीत की मस्तानी जादूगरनी
आशा भोसले के रूप में हमने, इस देश ने भारतीय फिल्म और सुगम संगीत के सुनहरे दौर की अंतिम जीवित रचयिता और साक्षी खो दिया है। जीवन और संगीत को आशाजी ने हमेशा एक चुनौती के रूप में लिया और हर मोड़ पर उसे पराजित कर दिखाया। निजी जिंदगी में नियति के कई आघात सहने के बाद भी आशा भोसले विजय पताका हमेशा अपने हाथों में थामे दिखीं। लताजी के विपरीत बगावत और प्रयोगधर्मिता उनके स्वभाव का हिस्सा रहा। जीवन में आए तमाम उतार- चढ़ावों का असर उन्होंने अपनी संगीत साधना पर कभी नहीं होने दिया।
गायन का संपूर्ण स्कूल
91 साल की उम्र में भी आशाजी उसी मस्तानी अदा से मंच पर गाती थीं कि लोग दांतो तले उंगली दबा लेते थे। हिंदी सिने और गैरफिल्मी गीतों के अनमोल रत्नों में से कई आशाजी के नाम हैं। वह अपने आप में गायन का स्कूल हैं। सुरों और शब्दों की अदायगी, ठहराव, झटके और परफेक्ट स्वराभिनय के माध्यम से किरदार को साकार करना आशाजी की खूबी है। सिने संगीत का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी युगल गीत ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं’, आशाजी ने मोहम्मद रफी के साथ जिस अंदाज में गाया है, वहां मानो वक्त भी ठहर गया- सा लगता है। भाव और रस कोई सा भी हो, सुरों की शक्ल में आशाजी हर किरदार में अपने बेहतरीन किरदार में नमूदार होती हैं।
20 भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गानों का विशाल सफर
आवाज पर उनका असाधारण कंट्रोल, सुरों के साथ कभी टेस्ट क्रिकेट तो कभी टी-20 की तरह सहज और पावरफुल बैटिंग करना आशाजी जैसी गायिकाओं के लिए ही संभव था। यूं तो उनके लाजवाब गीतों की लिस्ट बहुत लंबी है। लेकिन स्वरों के माध्यम से चुहलबाजी, मादकता, अल्हड़पन, दीवानगी, प्रेम, वियोग, मिलन, रूठना, हंसाना, कव्वाली, अर्द्ध शास्त्रीय गायन, गजल गायन, भक्तिभाव, लोकगीत, हर रंग में आशा भोसले हर बार अलग नजर आती हैं। अपने पांच दशक लंबे गायन कॅरियर में उन्होंने 20 भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गाने गाएं। लेकिन कभी घंमड नहीं किया।
किरदारों को जीवंत करती आवाज
ये वो दौर था, जहां साधना ही पुरस्कार थी। प्रयोगधर्मिता और नई चुनौतियों की स्वीकारना आशाजी की फितरत थी। फिल्म ‘उमराव जान’ में आशाजी ने गीत ‘ ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है’ में एक जवान और अलग तरह की पुरअसर आवाज निकाल कर सभी को चौंका दिया था। आशाजी ने करीब साठ वर्षों तक देश के सभी महान संगीतकारों के लिए गाया। फिर चाहे ‘अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे’ जैसी ब्याहता बेटी की मार्मिक गुहार हो या फिर ‘दम मारो दम’ जैसी नशीली आवाज हो। छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा जैसी शर्मीली छेड़छाड़ हो अथवा ‘मैं जब भी अकेली होती हूं तुम चुपके से आ जाते हो,’ सपनीली युवती की भावना हो। ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ जैसी भक्ति में डूबी प्रार्थना हो या फिर ‘बलमा माने ना’ जैसी शिकायत हो अथवा ‘नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है’ जैसा बालगीत हो, ‘पान खाए सैंया हमारो’ जैसे नौटंकी गीत हो अथवा ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, जैसी मनुहार हो।
संगीतकारों की पहली पसंद
आशाजी हर रंग और रस के साथ सम्बन्धित किरदार से एकाकार होती दिखती हैं। महान संगीतकार ओ.पी. नैयर के साथ आशाजी के गाए लाजवाब गीतों ने तो सिने संगीत के माधुर्य और मस्ती का ऐसा अध्याय रचा है कि जो कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। इसी तरह क्रांतिकारी संगीतकार और दूसरे पति आर.डी.बर्मन के साथ भी आशाजी ने कई बेमिसाल गीत गाए। केवल राष्ट्रभक्ति गीतों के मामले में दीदी लता मंगेशकर उनसे फिनिश लाइन से आगे जाती दिखती हैं। खास बात यह है कि दोनो बहनों ने जो युगल गीत गाए हैं वो भी डुएट सिंगिंग के बेहतरीन नमूने हैं। यही नहीं मराठी में आशाजी के छोटे भाई और महान संगीतकार ह्रदयनाथ मंगेशकर ने कई कालजयी गीत गवाए हैं। भारत रत्न छोड़कर आशाजी को अपनी सृजनात्मकता के लिए सभी बड़े पुरस्कार मिले।
मंगेशकर परिवार की अनमोल विरासत
मंगेशकर परिवार पर यूं तो सरस्वती का ही हाथ है, भारतीय फिल्म संगीत की वह यकीनन ‘फर्स्ट फैमिली’ है। ऐसा परिवार जिसमें तकरीबन सभी को संगीत का अमृत कलश जन्मजात मिला हो। ऐसे परिवार में संगीत साधना के साथ संगीत की अघोषित आंतरिक प्रतिस्पर्द्धा भी उतनी ही कठिन और कठोर होती है। ऐसे में जब कभी-कभार लताजी अपनी इस छोटी बहन के किसी गाने को सुनकर सराहना मिलती कि आशा तूने यह गीत मुझसे भी अच्छा गाया है तो मानिए कि श्रेष्ठता के पैमाने अपनी सतह से खुद ऊपर उठ जाते हैं।
अमर रहेगी सुरों की विरासत
आज जो पीढ़ी साठ के दशक में है या पचास से ऊपर है, वह इस मामले में सौभाग्यशाली है कि उसने सिने संगीत के इन महान नक्षत्रों की अनंत सुखदायी चांदनी के बीच जन्म लिया, उस संगीत को भोगा और आजतक उसकी रसवर्षा से उबर नहीं पाए हैं। संभव है कि एआई की पीढ़ी संगीत के आत्मिक दौर को कभी समझ और महसूस न कर पाए। लेकिन आशाजी जैसी महान गायिकाओं ने अपने सुरों के मयूरपंख से रची जो कालजयी स्वरांजलियां विरासत में छोड़ी हैं, वो उनके भौतिक रूप से देवलोकगमन के बाद भी सदैव करोड़ों मनों को आह्लादित करती रहेंगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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फिल्म संगीत के महान स्त्री-स्वरों में आशाजी की स्पर्द्धा केवल अपनी बड़ी बहन और गान सरस्वती लता मंगेशकर से रही। हालांकि इन दोनो में श्रेष्ठतम कौन ये बहस पहले अंडा या मुर्गी सी अनंत है। संक्षेप मे कहें तो लताजी अगर संगीत की मीरा हैं तो आशाजी राधा। गायन में अपनी रेंज, विविधता और वर्सटेलिटी में तो वो कभी-कभी लताजी को भी पीछे छोड़ती प्रतीत होती हैं।
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महान संगीतकार अनिल विश्वास ने लता और आशा की अद्भुत तुलना करते हुए कहा था कि लता आत्मा से गाती हैं और आशा शरीर से। लेकिन समग्रता में ये दोनो परस्परपूरक हैं। आत्मा बिना क्या देह और देह बिना क्या आत्मा। दोनो ही आसमान से उतरी हुई ऐसी आवाजें हैं, जो सदियों में पैदा होती हैं। लताजी सादगी, पवित्रता, विनम्रता और दैवी स्वर आभा के सर्वोच्च शिखर का प्रतीक हैं तो आशाजी मानव जीवन के संघर्षों, उतार-चढ़ाव, राग द्वेष, जिजीविषा और श्रेष्ठतम को हासिल करने की अंतहीन जिद का सर्वदा फहराता ध्वजदंड हैं।
संगीत की मस्तानी जादूगरनी
आशा भोसले के रूप में हमने, इस देश ने भारतीय फिल्म और सुगम संगीत के सुनहरे दौर की अंतिम जीवित रचयिता और साक्षी खो दिया है। जीवन और संगीत को आशाजी ने हमेशा एक चुनौती के रूप में लिया और हर मोड़ पर उसे पराजित कर दिखाया। निजी जिंदगी में नियति के कई आघात सहने के बाद भी आशा भोसले विजय पताका हमेशा अपने हाथों में थामे दिखीं। लताजी के विपरीत बगावत और प्रयोगधर्मिता उनके स्वभाव का हिस्सा रहा। जीवन में आए तमाम उतार- चढ़ावों का असर उन्होंने अपनी संगीत साधना पर कभी नहीं होने दिया।
गायन का संपूर्ण स्कूल
91 साल की उम्र में भी आशाजी उसी मस्तानी अदा से मंच पर गाती थीं कि लोग दांतो तले उंगली दबा लेते थे। हिंदी सिने और गैरफिल्मी गीतों के अनमोल रत्नों में से कई आशाजी के नाम हैं। वह अपने आप में गायन का स्कूल हैं। सुरों और शब्दों की अदायगी, ठहराव, झटके और परफेक्ट स्वराभिनय के माध्यम से किरदार को साकार करना आशाजी की खूबी है। सिने संगीत का सर्वश्रेष्ठ और कालजयी युगल गीत ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं’, आशाजी ने मोहम्मद रफी के साथ जिस अंदाज में गाया है, वहां मानो वक्त भी ठहर गया- सा लगता है। भाव और रस कोई सा भी हो, सुरों की शक्ल में आशाजी हर किरदार में अपने बेहतरीन किरदार में नमूदार होती हैं।
20 भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गानों का विशाल सफर
आवाज पर उनका असाधारण कंट्रोल, सुरों के साथ कभी टेस्ट क्रिकेट तो कभी टी-20 की तरह सहज और पावरफुल बैटिंग करना आशाजी जैसी गायिकाओं के लिए ही संभव था। यूं तो उनके लाजवाब गीतों की लिस्ट बहुत लंबी है। लेकिन स्वरों के माध्यम से चुहलबाजी, मादकता, अल्हड़पन, दीवानगी, प्रेम, वियोग, मिलन, रूठना, हंसाना, कव्वाली, अर्द्ध शास्त्रीय गायन, गजल गायन, भक्तिभाव, लोकगीत, हर रंग में आशा भोसले हर बार अलग नजर आती हैं। अपने पांच दशक लंबे गायन कॅरियर में उन्होंने 20 भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गाने गाएं। लेकिन कभी घंमड नहीं किया।
किरदारों को जीवंत करती आवाज
ये वो दौर था, जहां साधना ही पुरस्कार थी। प्रयोगधर्मिता और नई चुनौतियों की स्वीकारना आशाजी की फितरत थी। फिल्म ‘उमराव जान’ में आशाजी ने गीत ‘ ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है’ में एक जवान और अलग तरह की पुरअसर आवाज निकाल कर सभी को चौंका दिया था। आशाजी ने करीब साठ वर्षों तक देश के सभी महान संगीतकारों के लिए गाया। फिर चाहे ‘अब के बरस भेज भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे’ जैसी ब्याहता बेटी की मार्मिक गुहार हो या फिर ‘दम मारो दम’ जैसी नशीली आवाज हो। छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा जैसी शर्मीली छेड़छाड़ हो अथवा ‘मैं जब भी अकेली होती हूं तुम चुपके से आ जाते हो,’ सपनीली युवती की भावना हो। ‘तोरा मन दर्पण कहलाए’ जैसी भक्ति में डूबी प्रार्थना हो या फिर ‘बलमा माने ना’ जैसी शिकायत हो अथवा ‘नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है’ जैसा बालगीत हो, ‘पान खाए सैंया हमारो’ जैसे नौटंकी गीत हो अथवा ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, जैसी मनुहार हो।
संगीतकारों की पहली पसंद
आशाजी हर रंग और रस के साथ सम्बन्धित किरदार से एकाकार होती दिखती हैं। महान संगीतकार ओ.पी. नैयर के साथ आशाजी के गाए लाजवाब गीतों ने तो सिने संगीत के माधुर्य और मस्ती का ऐसा अध्याय रचा है कि जो कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। इसी तरह क्रांतिकारी संगीतकार और दूसरे पति आर.डी.बर्मन के साथ भी आशाजी ने कई बेमिसाल गीत गाए। केवल राष्ट्रभक्ति गीतों के मामले में दीदी लता मंगेशकर उनसे फिनिश लाइन से आगे जाती दिखती हैं। खास बात यह है कि दोनो बहनों ने जो युगल गीत गाए हैं वो भी डुएट सिंगिंग के बेहतरीन नमूने हैं। यही नहीं मराठी में आशाजी के छोटे भाई और महान संगीतकार ह्रदयनाथ मंगेशकर ने कई कालजयी गीत गवाए हैं। भारत रत्न छोड़कर आशाजी को अपनी सृजनात्मकता के लिए सभी बड़े पुरस्कार मिले।
मंगेशकर परिवार की अनमोल विरासत
मंगेशकर परिवार पर यूं तो सरस्वती का ही हाथ है, भारतीय फिल्म संगीत की वह यकीनन ‘फर्स्ट फैमिली’ है। ऐसा परिवार जिसमें तकरीबन सभी को संगीत का अमृत कलश जन्मजात मिला हो। ऐसे परिवार में संगीत साधना के साथ संगीत की अघोषित आंतरिक प्रतिस्पर्द्धा भी उतनी ही कठिन और कठोर होती है। ऐसे में जब कभी-कभार लताजी अपनी इस छोटी बहन के किसी गाने को सुनकर सराहना मिलती कि आशा तूने यह गीत मुझसे भी अच्छा गाया है तो मानिए कि श्रेष्ठता के पैमाने अपनी सतह से खुद ऊपर उठ जाते हैं।
अमर रहेगी सुरों की विरासत
आज जो पीढ़ी साठ के दशक में है या पचास से ऊपर है, वह इस मामले में सौभाग्यशाली है कि उसने सिने संगीत के इन महान नक्षत्रों की अनंत सुखदायी चांदनी के बीच जन्म लिया, उस संगीत को भोगा और आजतक उसकी रसवर्षा से उबर नहीं पाए हैं। संभव है कि एआई की पीढ़ी संगीत के आत्मिक दौर को कभी समझ और महसूस न कर पाए। लेकिन आशाजी जैसी महान गायिकाओं ने अपने सुरों के मयूरपंख से रची जो कालजयी स्वरांजलियां विरासत में छोड़ी हैं, वो उनके भौतिक रूप से देवलोकगमन के बाद भी सदैव करोड़ों मनों को आह्लादित करती रहेंगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।