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भारत की अर्थव्यवस्था का नया इंजन 'नेट जीरो उद्योग'

राजेश्वर सिंह, अमर उजाला Published by: Nitin Gautam Updated Sun, 12 Apr 2026 07:04 AM IST
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सार

दुनिया के सबसे विश्वसनीय वैज्ञानिक मंच आईपीसीसी के अनुसार, वैश्विक तापमान पहले ही लगभग 1.1 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ चुका है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन हर साल प्रदूषण से लगभग 70 लाख मौतों की पुष्टि करता है। नीति आयोग के अनुसार, भारत में 60 करोड़ लोग जल संकट की स्थिति में हैं। ये आंकड़े केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि आर्थिक चेतावनी भी हैं।

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नेट जीरो उद्योग - फोटो : फ्रीपिक
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विस्तार

भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विस्तार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा है, तो दूसरी ओर जलवायु संकट, बढ़ती ऊर्जा लागत और पर्यावरणीय दबाव। ऐसे समय में नेट जीरो उद्योग केवल पर्यावरण की चर्चा नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक रणनीति का केंद्रीय विषय बन चुका है। यह समझना होगा कि नेट जीरो अब व्यावहारिक आर्थिक आवश्यकता है। दुनिया बदल रही है और जो देश या उद्योग इस बदलाव को नहीं अपनाएंगे, वे वैश्विक दौड़ में पीछे छूट जाएंगे।
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जलवायु परिवर्तन के संकेत अब स्पष्ट और डरावने हैं। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य और जल संसाधनों पर पड़ रहा है। लेकिन यह केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक चेतावनी भी है। विशेष रूप से उद्योगों पर इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण श्रमिकों की उत्पादकता घट रही है और कच्चे माल की उपलब्धता अनिश्चित होती जा रही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार हीट स्ट्रेस के कारण भारत में कार्य घंटों का भारी नुकसान हो रहा है। एक औसत लघु उद्योग हर साल लाखों रुपये का नुकसान केवल ऊर्जा की बर्बादी और प्रदूषण के कारण उठा रहा है।
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अब वैश्विक बाजार की शर्तें भी बदल चुकी हैं। चुनौती केवल अधिक उत्पादन की नहीं, बल्कि ग्रीन उत्पादन की है। यूरोपीय संघ जैसे बड़े बाजार अब उन उत्पादों पर कड़ा रुख अपना रहे हैं, जो पर्यावरणीय मानकों को पूरा नहीं करते। ऐसे में भारतीय निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए नेट जीरो अपनाना अनिवार्य है। यह भ्रम दूर करना आवश्यक है कि नेट जीरो केवल खर्च बढाता है। वास्तविकता यह है कि सोलर ऊर्जा और आधुनिक मशीनों के उपयोग से बिजली की लागत में भारी कमी आती है। ऊर्जा दक्षता के माध्यम से होने वाली बचत कुछ ही वर्षों में निवेश की लागत वसूल कर देती है।

भारत और विभिन्न राज्य सरकारों की नीतियां अब हरित विकास की दिशा में स्पष्ट हैं। सरकारी योजनाएं, सस्ती वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग आज पहले से कहीं अधिक उपलब्ध हैं। इतिहास गवाह है कि जो अर्थव्यवस्थाएं समय के साथ नहीं बदलती, वे अप्रासंगिक हो जाती हैं। नेट जीरो उद्योग पृथ्वी को बचाने के साथ-साथ भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत और भविष्य के लिए सुरक्षित बनाने का मार्ग है। यदि आज हमारे उद्योग इस दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो भारत केवल मेक इन इंडिया नहीं, बल्कि ग्रीन मेक इन इंडिया का वैश्विक केंद्र बन सकता है। यही हमारे आर्थिक भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी होगी।
(लेखक उत्तर प्रदेश असेंबली के मेंबर हैं।)
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