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पश्चिम बंगाल चुनाव: सत्ता के सवाल पर भाजपा में असमंजस
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सार
लकाता और उससे सटे इलाके तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहे हैं। लेकिन भाजपा ने इस बार यहां भी सेंध लगाने की रणनीति तैयार की है। उसे उम्मीद है कि इस बार घुसपैठ और भ्रष्टाचार के पारंपरिक मुद्दों के अलावा प्रतिष्ठान विरोधी लहर का भी फायदा मिलेगा।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों का हुआ एलान
- फोटो : ANI
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विस्तार
मतदाता सूची के गहन विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए कटे लाखों नामों पर होने वाले विवाद के बावजूद भाजपा को अबकी बंगाल की सत्ता पर काबिज होने का भरोसा है। उसके संकल्प पत्र में भी यही भरोसा झलकता है। लेकिन उसके बड़े-बड़े दावों के बावजूद नेताओं के निजी बातचीत में इस सवाल पर पार्टी में असमंजस का संकेत मिलता है।
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पार्टी ने पिछली बार की गलतियों से सबक लेते हुए इस बार राज्य की तमाम 294 सीटों के लिए अलग-अलग रणनीति तैयार की है। शुभेंदु अधिकारी को नंदीग्राम के अलावा ममता के गढ़ भवानीपुर में उतारना और आर.जी. कर कांड की पीड़िता की मां को पानीहाटी सीट पर टिकट देना उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है।
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भवानीपुर में शुभेंदु के मैदान में उतारने का एकमात्र मकसद ममता पर मानसिक दबाव बना कर उनको इसी इलाके में फंसाए रखना है ताकि वो राज्य के दूसरे इलाकों में चुनाव प्रचार पर ज्यादा समय नहीं दे सकें।
पहले चरण के मतदान
पहले चरण में जिन 152 सीटों पर मतदान होना है उनमें उत्तर बंगाल के वो इलाके भी शामिल हैं जहां पार्टी पारंपरिक तौर पर मजबूत रही है। लेकिन बावजूद इसके वो वहां अतिरिक्त आत्मविश्वास का शिकार होने से बच रही है। भाजपा नेताओं का कहना है कि हम तमाम सीटों पर कांटे की टक्कर मान कर आगे बढ़ रहे हैं। चुनाव से पहले करीब छह महीने तक केंद्रीय नेताओं के साथ चले मंथन के बाद हर सीट के लिए अलग रणनीति तैयार की गई है।
दक्षिण बंगाल में खासकर कोलकाता और उससे सटे इलाके तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहे हैं। लेकिन भाजपा ने इस बार यहां भी सेंध लगाने की रणनीति तैयार की है। उसे उम्मीद है कि इस बार घुसपैठ और भ्रष्टाचार के पारंपरिक मुद्दों के अलावा प्रतिष्ठान विरोधी लहर का भी फायदा मिलेगा।
दक्षिण 24-परगना में आम लोग भी इस बार बदलाव के पक्ष में नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि एक बार भाजपा को भी मौका देना चाहिए। हालांकि लोग इस पुरानी कहावत की भी याद दिलाते हैं कि जे जाय लंका सोई होए रावन यानी जो लंका जाता है वह रावण हो जाता है। बावजूद इसके कुछ इलाकों में भाजपा पिछली बार के मुकाबले मजबूत नजर आती है। पहले जिन इलाकों में उसका कोई नामलेवा तक नहीं था वहां भी उसके झंडे और पोस्टर नजर आने लगे हैं।
तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी को भी इस खतरे का अंदाजा है, इसलिए वो अपनी तमाम रैलियो में लोगों से भाजपा को एक भी वोट नहीं देने की अपील कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी इस बार उन करीब पांच दर्जन सीटों पर खास ध्यान दे रही है जहां पिछली बार हार-जीत का अंतर कम था। वर्ष 2018 के लोकसभा चुनाव से उसकी स्थिति लगातार मजबूत होने की एक वजह वाममोर्चे के ज्यादातर वोट उसके पक्ष में जाना है। उस साल पार्टी के मिलने वाले वोट 17 फीसदी बढ़े थे। उसे इस बार भी वाममोर्चा के तृणमूल कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाने की उम्मीद है।
भाजपा नेताओं के मुताबिक, हुमायूं कबीर और ओवैसी के अलावा सीपीएम और वाममोर्चा तृणमूल कांग्रेस के वोट बैंक में ही सेंध लगाएंगे। इसकी वजह से पार्टी को कई अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं। पार्टी का अंदरूनी हिसाब 125 से 150 सीटों का है।
लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि पूरा जोर लगाने के बावजूद वह अधिकतम सौ सीटों तक पहुंच सकती है। इसकी वजह कई इलाकों में उसके संगठन का कमजोर होना है। लेकिन उसके साथ इस बार चुनाव आयोग की सक्रियता और भारी तादाद में सुरक्षाबलों की तैनाती से ग्रामीण इलाकों में चुनावी धांधली पर अंकुश लग सकता है। इससे तृणमूल को नुकसान होगा और उसका नुकसान पार्टी के लिए फायदे का सौदा बन सकता है।
दक्षिण बंगाल में मेदिनीपुर इलाके में अधिकारी परिवार के कारण पार्टी की स्थिति मजबूत है। इसके अलावा बीरभूम, मुर्शिदाबाद और मालदा में वह कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने की उम्मीद कर रही है। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक बहुल जिले मुर्शिदाबाद की 22 सीटों में पिछली बार उसे दो सीट मिली थी, बाकी तृणमूल कांग्रेस को मिली थी। हुमायूं कबीर के मैदान में होने की वजह से पार्टी को अबकी वहां कम से कम पांच सीटें जीतने की उम्मीद है।
दूसरी ओर, वाममोर्चा इस बार कांग्रेस का साथ छोड़ कर अकेले मैदान में उतरी है। उसने अपने पैरों तले खिसकती जमीन पर अंकुश लगाने के लिए बेदाग छवि वाले नए चेहरों पर भरोसा जताया है।
असंतुष्ट वोटरों को मनाने की कोशिश
उम्मीदवारों की सूची में 27 महिलाओं के अलावा दर्जनों ऐसे उम्मीदवार हैं जिनकी उम्र 40 साल से कम है। इनको टिकट देने का मकसद राज्य के युवा वोटरों को आकर्षित करना है। सीपीएम ने जिन युवाओं को मैदान में उतारा है उनमें से कई लोग आरजी कर कांड के खिलाफ लंबे समय तक आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे हैं। मोर्चा का दावा है कि इस बार उसने तृणमूल और भाजपा से असंतुष्ट वोटरों के सामने एक नया विकल्प पेश किया है।
वर्ष 2011 में तृणमूल कांग्रेस से हारने के बावजूद पार्टी ने इस लाल किले में करीब 40 फीसदी वोटों पर कब्जा बरकरार रखा था। लेकिन अगले दस साल में यह आंकड़ा घटकर पांच फीसदी से नीचे पहुंच गया। इसी वजह से वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में उसका खाता तक नहीं खुल सका। वैसे, वोटों में गिरावट का यह सिलसिला काफी पहले ही शुरू हो गया था।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सीपीएम और उसके सहयोगी दलों को महज 6.28 फीसदी वोट और दो सीटें मिली थी। दोनों सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी रहे थे। तब भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा था और वह दो से 18 सीटों तक पहुंच गई थी। यही वजह है कि 2019 में भाजपा को मिले वोटों का आंकड़ा 23 फीसदी बढ़ कर 40.6 फीसदी तक पहुंच गया।
वाममोर्चा के कई नेता मानते हैं कि वामपंथी दल अपने समर्थकों की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहे हैं। ज्यादातर नेता 34 साल तक सत्ता में रहने की खुमारी से मुक्त नहीं हो सके हैं। लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण पार्टी और प्रशासन के बीच की विभाजन रेखा धूमिल हो गई थी। विपक्ष से खास चुनौती नहीं मिलने की वजह से खासकर सीपीएम सर्वशक्तिमान होकर उभरी और पार्टी में भ्रष्टाचार भी जड़ें जमाने लगा।
ज्यादातर सरकारी काम पार्टी दफ्तर से ही होने लगे थे। यह कहना ज्यादा सही होगा कि सीपीएम के दफ्तर समानांतर प्रशासन का केंद्र बन गए थे। लेकिन पुरानी गलतियों को भुला कर पार्टी इस बार अपने बूते बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है।
लोगों की नब्ज समझती हैं ममता
लेकिन बंगाल में आखिर ऐसा क्या है जो भाजपा वर्ष 2021 से ही तमाम संसाधन झोंकने के बावजूद ममता को सत्ता से हटाने में नाकाम रही है? जानकारों का कहना है कि बंगाल के चुनाव दूसरे राज्यों से इस मायने में भिन्न हैं कि राज्य के लोग अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। ममता बनर्जी लोगों की यह नब्ज अच्छी तरह समझती है। इसलिए वो बार-बार बंगाली अस्मिता और भाषा का मुद्दा उठाती रही हैं।
क्या बंगाल के फार्मूले को राष्ट्रीय स्तर पर लागू नहीं किया जा सकता? इस सवाल पर विश्लेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी की प्राथमिकता सूची में बंगाल सबसे ऊपर है। यूपीए की घटक होने के बावजूद उन्होंने अब तक राज्य में कांग्रेस के लिए एक इंच जमीन नहीं छोड़ी है। अहम की लड़ाई ही राष्ट्रीय स्तर पर उनको कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने से रोक रही है। ऐसे में फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर बंगाल माडल लागू होना संभव नहीं नजर आता।
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं कि 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की कड़ी चुनौती से निपटने के बाद ममता ने राष्ट्रीय राजनीति में कुछ सक्रियता दिखाई थी। लेकिन नेतृत्व के सवाल पर पेंच फंसने के बाद उन्होंने बंगाल पर ही ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया। अब उनका एकमात्र लक्ष्य इस चुनाव में जीत कर चौथी बार सरकार का गठन करना है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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