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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: ईरानियन सिनेमा- आंदोलन, प्रतिरोध का सिनेमा

Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Thu, 09 Apr 2026 03:33 PM IST
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सार

सेंसरशिप के बावजूद ईरानी निर्देशकों ने अपने देश-समाज के कट्टरपंथ, बुराइयों, कमियों को बिना लाउड हुए सिनेमा में दिखाया है। यह महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने भिन्न समय, भिन्न स्थान, मनुष्यता की रक्षा करते हुए कभी प्रेम, कभी बच्चों, कभी स्त्रियों के माध्यम से साहस के साथ दिखाया।

history of world cinema iranian cinema and directors
सिनेमा की दुनिया - फोटो : Freepik.com
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विस्तार

अक्सर दुनिया में सिनेमा मनोरंजन है, ईरान में यह 'प्रतिरोध की भाषा' है। एक जाना-माना तथ्य है दुनिया के किसी देश में सच्चाई पर सिनेमा सरकार एवं सत्ता को अप्रसन्न किए बिना नहीं बनाया जा सकता है। देश-समाज का सच दिखा कर निर्देशक सत्ता के प्रकोप से बच नहीं सकता है।

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विकट स्थिति में भी कुछ निर्देशक सिनेमा के माध्यम से अपनी बात कहते हैं, सिनेमा का एक हथियार की तरह उपयोग करते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता को उसका असली, घिनौना, क्रूर चेहरा दिखाते हैं। सरकार-सेंसरशिप के होते हुए कौशल के साथ फिल्म बनाते हैं। प्रतीक, परिकथा, मिथक आदि माध्यम से अपना मन्तव्य प्रदर्शित करते हैं। देखें, आंतरिक पाबंदियों के बीच ईरानी फिल्मकारों ने कैसे कैमरे को सत्ता से सवाल करने का हथियार बनाया?
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अक्सर आज के ईरानी सिनेमा को 1979 की क्रांति की उपज बताया जाता है। 

ईरान के एक सर्वाधिक सम्मानित निर्देशक अब्बास कियारोस्तमी खंडन करते हुए कहते हैं, यह सिद्धांत इतिहास का मिथ्याकरण है। ईरान की नव-लहर का उदय क्रांति के पूर्व हो चुका था। यह सरकार के पिट्ठुओं और सत्ता से लाभ पाने वाले संस्थानों की साजिश है। हां, कह सकते हैं, क्रांति पश्चात लगे सेंसरशिप, भाई-भतीजावाद एवं कट्टरता के बावजूद यह फला-फूला। क्रांति का सकारात्मक पक्ष है, ईरान के साहित्य, कला एवं सिनेमा का पश्चिम तथा दुनिया भर में इसका प्रचार-प्रसार।

सेंसरशिप के बावजूद ईरानी निर्देशकों ने अपने देश-समाज के कट्टरपंथ, बुराइयों, कमियों को बिना लाउड हुए सिनेमा में दिखाया है। यह महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने भिन्न समय, भिन्न स्थान, मनुष्यता की रक्षा करते हुए कभी प्रेम, कभी बच्चों, कभी स्त्रियों के माध्यम से साहस के साथ दिखाया। इसके लिए इन लोगों ने जोखिम उठाया, गिरफ्तार हुए, जेल गए। यहां तककि देश भी छोड़ा।

मोहम्मद रसूलोफ, जफर पनाही, अब्बास कियारोस्तमी, मोहसिन मखमलबाफ, समीरा मखमलबाफ आदि ने समाज को आईना दिखाया है। देश-समाज-समुदाय की बुराइयों-कमियों को दूर करना है, तो आवाज भीतर से आनी चाहिए, बाहरी शक्तियां इनको नहीं सुलझा सकती हैं। यही काम ये सिनेमाकार कर रहे हैं।

युवा निर्देशक समीरा मखमलबाफ ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है, यह बात उन्होंने ईरानी स्त्रियों के संबंध में कही है, पर सब पर लागू होती है। उन्होंने कहा है, ईरानी स्त्रियां मीठे पानी का सोता हैं, जितना दबाव पड़ेगा उतने वेग से फूटेंगी। उन्होंने संस्थानी शिक्षा कम ली है, फिल्म बनाने की व्यवहारिक शिक्षा पिता मोहसिन मखमलबाफ की फिल्मों में काम कर, उनको फिल्म बनाते देख और फिल्म बनाने में उनकी सहायता करते हुए प्राप्त की है। अधिकांश देशों की भांति ईरान में भी बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है।

पिता से अधिक प्रसिद्ध समीरा 2000 में ‘ब्लैकबोर्ड’ में इसी लकवाग्रस्त समस्या के विरुद्ध मानवीय पहलू को उजागर करती हैं। लोगों का जीवन नियंत्रित करने वाली क्रूर सत्ता से दर्शक को रू-ब-रू कराती हैं। बच्चे आजीविका के लिए भटक रहे हैं, बूढ़े मृत्यु खोज रहे हैं। टीचर पढ़ाने केलिए किसी को प्रेरित नहीं कर पा रहे हैं।

ड्रामा ‘दि एप्पल’

ईराकी सेना कभी भी आक्रमण कर सकती है। सब कुछ अनिश्चित है। फिल्म एक नॉनस्टेट कुर्देस्तान में स्थापित है। बहु-पुरस्कृत समीरा ने इसके पहले डॉक्यू-ड्रामा ‘दि एप्पल’ बनाई जो दो साल में करीब 100 फिल्म समारोह में गई और 30 देशों में प्रदर्शित हुई।

यहां अनपढ़ पिता ने अपनी दो बेटियों को कैद किया हुआ है, इसका कारण लड़कियां चलना, बात करना नहीं सीख पाई हैं। ‘एट फाइव इन द आफ्टरनून’, ‘टू-लेग्ड होर्स’ उनकी अन्य फिल्में हैं।

ईरान में गिरफ्तारी, जेल, गोली आम बात है। कई बार गिरफ्तार हो जेल जाने के बावजूद जफर पनाही एवं मोहम्मद रसूलोफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से समाज का असली चेहरा अपनी अपनी फिल्मों में प्रस्तुत करते हैं। रसूलोफ ने एक बार एक जेल अधिकारी से पूछा, यह गहन मोहभंग का सिस्टम काम कैसे करता है?

उत्तर मिला, पैसा, क्रूरता और प्रतिबंध से। प्रतिबंध को धता बताते हुए रसूलोफ ने ‘द सीड ऑफ द सेक्रेड  फिग’ उस समय बनाई जब 2022 में सड़कों पर ‘वीमेन, लाइफ, फ्रीडम’ का आंदोलन चल रहा था। कार में छिप कर यह फिल्म बना उन्होंने आंदोलन काल में भयभीत घर के भीतर रहते लोगों एवं सड़क पर जोखिम उठा रही आंदोलनकारी स्त्रियों का जीवन दिखाया। कोई सुरक्षित नहीं है, कभी भी गिरफ्तार हो सकता है, गोली खा सकता है।

रसूलोफ ने ‘आइरन आइलैंड’ में क्रूर सत्ता का प्रतीक जहाज कैप्टन को बनाया है, वह दिखावे केलिए कल्याणकारी कार्य करता है। ‘देयर इज नो इविल’ उनकी एक अन्य फिल्म है।

मोहम्मद रसूलोफ के साथ कई बार जेल गए और देश छोड़ने को मजबूर जफर पनाही अब एक बार फिर ईरान लौट आए हैं। उनके बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा, 20 साल के लिए उन्हें लेखन एवं फिल्म बनाने की मनाही हुई। पर उन्होंने जान जोखिम में डाल कर फिल्में बनाई और दुनिया के श्रेष्ठ निर्देशकों में गिने गए।

‘दिस इज नॉट ए फिल्म’, ‘क्लोज्ड कर्टन’, ‘टैक्सी’, ‘3 फेसेस’ उनकी कुछ फिल्में हैं। गरीबों, बच्चों, औरतों, पूर्व सैनिकों को उन्होंने पटुता के साथ प्रमुखता दी। अब्बास कियारोस्तमी की ‘व्हेयर इज द फ्रैंड’स हाउस’, ‘लाइफ एंड नथिंग मोर’, ‘थ्रो दि ओलिव ट्रीज’ त्रयी तथा ‘टेस्ट ऑफ चेरी’ विश्व प्रसिद्ध फिल्में हैं। इनमें वे संस्कृति, स्मृति, गुजरे जमाने और आज के जमाने के ईरान को दिखाते हैं।

असगर फरहादी अपनी फिल्मों में (‘द पास्ट’, ‘ए सेपरेशन’, ‘द सेल्समैन’, ‘अबाउट एली’) में परिवार, बच्चों, पति-पत्नी, ईरान एवं अन्य देश की सभ्यता-संस्कृति का अंतर आदि लाते हैं। खासकर पति-पत्नी के तलाक की प्रक्रिया का बच्चों पर असर और उनकी प्रतिक्रिया उनकी फिल्मों के मुख्य विषय होते हैं। वे सिनेमा जैसे औजार का कुशलता से प्रयोग कर सामाजिक और सांस्कृतिक मानकों की आलोचना करते हुए उनको चुनौती देते हैं।

अब्बास कियारोस्तमी एवं असगर फरहादी जैसे ईरानी सिने-निर्देशकों ने देश-दुनिया का ध्यान ईरान की ओर खींचा है, सिने-जगत में ईरानी सिनेमा को पहचान दिलाई है। ईरानी समाज के सामान्य जन के नैतिक एवं दैंनदिन जीवन का अन्वेषण किया है।

ईरान प्रारंभ से उथल-पुथल का देश रहा है, अभी भयंकर संघर्ष से गुजर रहा है। ऐसे में ईरान में दरिउश मेहरजुइ, बहमान घोबादी, तेहमीनेह मिलनी जैसे सिने-निर्देशक का काम महत्वपूर्ण हो उठता है, जो जोखिम और साहस के साथ आंदोलन, प्रतिरोध का सिनेमा बना रहे और अपने देशवासियों को जागरूक कर रहे हैं। दुनिया को ईरानी सभ्यता-संस्कृति से परिचित करा रहे हैं।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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