सबरीमाला मामला : संविधान और आस्था, दोनों एक साथ सम्मानपूर्वक आगे बढ़ें
सबरीमाला मामला केवल मंदिर प्रवेश का मुद्दा नहीं, बल्कि संविधान और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन की बड़ी बहस है। यह सवाल उठाता है कि न्यायपालिका की सीमाएं क्या हों और धार्मिक स्वायत्तता का सम्मान कैसे बनाए रखा जाए।
विस्तार
भारतीय लोकतंत्र के विकासक्रम में न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के बीच शक्ति के पृथक्करण का सिद्धांत हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। यही संतुलन लोकतंत्र को मजबूती देता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ‘संवैधानिक नैतिकता’ के नाम पर जिस तरह धार्मिक संप्रदायों की आंतरिक परंपराओं में न्यायिक हस्तक्षेप बढ़ा है, उसने एक गंभीर संवैधानिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया है।
दरअसल, अभी सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट में 9 न्यायाधीशों की बेंच सुनवाई कर रही है और यह मामला इस बहस का सबसे प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यह केवल एक मंदिर में प्रवेश का नहीं है। असल सवाल इससे कहीं बड़ा है, आखिर वह सीमा क्या होनी चाहिए, जहां राज्य और न्यायपालिका को रुक जाना चाहिए, ताकि धार्मिक स्वायत्तता सुरक्षित रह सके?
भारत का संविधान अपनी प्रस्तावना में ही ‘विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता’ की बात करता है। अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों को स्वयं संचालित करने का अधिकार देता है। यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है कि अनुच्छेद 26 केवल व्यक्तिगत अधिकार नहीं है, बल्कि यह ‘सामूहिक स्वायत्तता’ की रक्षा करता है। जाहिर है शिरूर मठ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ किया था कि किसी संप्रदाय की पहचान उसके अनुयायियों की आस्था और परंपराओं से तय होती है। ऐसे में सबरीमाला के संदर्भ में ‘नैष्ठिक ब्रह्मचर्य’ की परंपरा को केवल भेदभाव के रूप में देखना क्या उस संप्रदाय की विशेषता को नजरअंदाज करना नहीं है?
इस पूरे विवाद का एक और अहम पहलू इसके याचिकाकर्ता हैं। ‘इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ और अन्य लोग, जो इस मामले को अदालत तक लेकर गए, वे स्वयं उस आस्था के अनुयायी नहीं थे। यहां एक सीधा सवाल उठता है, क्या किसी धार्मिक परंपरा को चुनौती देने का अधिकार उस व्यक्ति को होना चाहिए, जिसकी उस आस्था से कोई सीधी जुड़ाव ही न हो?
दरअसल, कानून भी यह मानता है कि ‘आध्यात्मिक अभाव’ का दावा वही व्यक्ति कर सकता है, जो उस परंपरा में विश्वास रखता हो। ऐसे में जनहित याचिका के जरिए किसी मंदिर की परंपराओं को चुनौती देना कहीं न कहीं न्यायिक प्रक्रिया के दायरे को जरूरत से ज्यादा फैलाने जैसा लगता है।
धर्म और धार्मिक प्रथाएं मूलतः विश्वास का विषय हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी परंपरा को नहीं मानता तो वह उस मंदिर में न जाने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उस परंपरा को बदलने की कोशिश करना, जिसमें उसकी खुद की आस्था ही न हो, क्या सही ठहराया जा सकता है? अदालतों ने समय-समय पर ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ का सिद्धांत विकसित किया है, लेकिन यहां भी संतुलन जरूरी है। न्यायिक समीक्षा का दायरा इतना ही होना चाहिए कि यह देखा जाए कि कोई प्रथा वास्तव में धार्मिक है या नहीं। क्या यह तय करना भी अदालत का काम है कि कोई प्रथा ‘जरूरी’ है या नहीं? या यह अधिकार उस समुदाय का होना चाहिए, जो उस परंपरा को जी रहा है?
विश्वास हमेशा तर्क से नहीं चलता। कई बार वह तर्क से परे होता है। एक लोकतांत्रिक समाज में यह स्वीकार करना जरूरी है कि हर चीज को वैज्ञानिक या तर्कसंगत कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। जब तक कोई परंपरा सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता को सीधा नुकसान नहीं पहुंचा रही, तब तक उसमें हस्तक्षेप सीमित रहना चाहिए।
सबरीमाला मामले में अनुच्छेद 25(2)(b) का भी बार-बार जिक्र किया गया। यह कहा गया कि मंदिर सभी ‘वर्गों’ के लिए खुले होने चाहिए, लेकिन यहां ‘वर्ग’ शब्द को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना जरूरी है। यह प्रावधान मुख्य रूप से ‘छुआछूत’ जैसी सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए लाया गया था, जैसा कि अनुच्छेद 17 में भी स्पष्ट है। इसे सीधे ‘लैंगिक समानता’ से जोड़ देना क्या उसके मूल उद्देश्य को बदलना नहीं है?
सबरीमाला में महिलाओं के एक विशेष आयु वर्ग का प्रवेश निषेध कई लोगों को भेदभाव लगता है, लेकिन उस संप्रदाय के भीतर इसे देवता के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप के सम्मान के रूप में देखा जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हर धार्मिक परंपरा को एक ही तरह के ‘समानता’ के पैमाने से मापा जाना चाहिए? राज्य की भूमिका यहां बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील हो जाती है। उसे परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाना होता है। धार्मिक संस्थानों के प्रशासनिक और आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करना एक बात है, लेकिन उनके मूल धार्मिक आचरण में दखल देना दूसरी बात। क्या राज्य को नियंत्रक बनना चाहिए, या एक संरक्षक की भूमिका निभानी चाहिए?
इतिहास बताता है कि धार्मिक सुधार तब ज्यादा प्रभावी और स्वीकार्य होते हैं, जब वे समाज के भीतर से आते हैं। बाहर से थोपी गई बातें अक्सर असंतोष और विरोध को जन्म देती हैं। सबरीमाला के मामले में भी कई महिला भक्त स्वयं परंपरा के पक्ष में थीं। यह स्थिति अपने आप में अनोखी थी, जहां जिनके अधिकार की बात हो रही थी, वे ही उस परंपरा के साथ खड़ी नजर आईं। यह दिखाता है कि यह मामला केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि आस्था और दृष्टिकोण का भी था। न्यायपालिका की मर्यादा इसी में है कि वह ‘संवैधानिक नैतिकता’ को लागू करते समय ‘धार्मिक नैतिकता’ को भी समझे। संवैधानिक मूल्यों का उद्देश्य विविधता को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे संतुलित करना होना चाहिए।
भारत एक बहुवादी समाज है। यहां विविधता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर हर परंपरा को एक ही ढांचे में ढालने की कोशिश की जाएगी तो यह विविधता धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। आज यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि क्या कुछ समूह जनहित याचिकाओं का उपयोग अपने विचारों को लागू करने के लिए कर रहे हैं? जब याचिकाकर्ता स्वयं उस आस्था से जुड़े नहीं होते तो उनकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या यह न्यायिक सक्रियता है या फिर न्यायिक अतिक्रमण?
सबरीमाला का विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का तंत्र नहीं है, बल्कि यह विश्वास, विविधता और सह-अस्तित्व का भी आधार है। अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों को जो स्वायत्तता दी गई है, उसे ‘सुधार’ के नाम पर कमजोर करना क्या सही होगा?
न्यायपालिका को अपनी सीमाओं को समझना होगा। उसे उन क्षेत्रों में जाने से बचना चाहिए, जहां तर्क खत्म हो जाता है और आस्था शुरू होती है। एक मजबूत और आधुनिक भारत के लिए जरूरी है कि वह प्रगति करे, लेकिन अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों को भी साथ लेकर चले। सबरीमाला का मुद्दा केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। यह उस संतुलन का प्रश्न है, जहां संविधान और आस्था दोनों एक साथ, सम्मानपूर्वक आगे बढ़ सकें।