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दूसरा पहलूः हर गांठ का मतलब कैंसर नहीं होता; स्पष्ट और सही संवाद ही बेहतर इलाज की पहली सीढ़ी

डॉ. सीमा जावेद Published by: Pavan Updated Wed, 08 Apr 2026 08:56 AM IST
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सार

शरीर के किसी हिस्से में होने वाली असामान्य सूजन या गांठ को ट्यूमर कहते हैं, वहीं कैंसर कोशिकाओं में होने वाला जेनेटिक बदलाव है। जरूरी नहीं कि हर ट्यूमर घातक हो, पर कैंसर की कोशिकाएं आसपास के ऊतकों पर हमला करती हैं और शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल सकती हैं। ट्यूमर या कैंसर की सही पहचान के लिए अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जांचें की जाती हैं। ऊतक का सैंपल लेकर माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है, जिससे यह तय होता है कि ट्यूमर घातक है या नहीं।

Not every lump means cancer; clear and accurate communication is the first step to better treatment.
हर गांठ का मतलब कैंसर नहीं होता - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

ट्यूमर और कैंसर, ये दोनों शब्द अक्सर एक-दूसरे के लिए इस्तेमाल कर दिए जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर ट्यूमर कैंसर नहीं होता और हर कैंसर गांठ की शक्ल में नहीं दिखता? आम लोगों के साथ-साथ कई बार स्वास्थ्य क्षेत्र के पेशेवर भी इन्हें लेकर भ्रम में पड़ जाते हैं। इसलिए यह समझना बेहद जरूरी है कि ट्यूमर व कैंसर में असल अंतर क्या है और सही शब्दों का इस्तेमाल क्यों मायने रखता है।
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दरअसल, ट्यूमर का मतलब है शरीर के किसी हिस्से में होने वाली असामान्य सूजन या गांठ।

यह शरीर के किसी भी हिस्से-जैसे फैट, मांसपेशियों, हड्डियों, नसों या ग्रंथियों-में बन सकता है। लेकिन हर ट्यूमर कैंसर नहीं होता। ट्यूमर दो तरह के होते हैं-सौम्य (यानी कैंसर-रहित) और घातक (यानी कैंसर संबंधी)। कई सौम्य ट्यूमर बिल्कुल हानिरहित होते हैं, जैसे लिपोमा (त्वचा के नीचे फैट का जमाव) या हेमेंजियोमा (रक्त वाहिकाओं का बढ़ना)। हालांकि, कुछ सौम्य ट्यूमर अपनी जगह की वजह से परेशानी खड़ी कर सकते हैं, जैसे गर्भाशय के फाइब्रॉइड या पिट्यूटरी एडेनोमा, जो हार्मोन असंतुलन पैदा कर सकते हैं। ऐसे मामलों में भले ये कैंसर न हों, लेकिन इलाज या सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। ़
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दूसरी तरफ, कैंसर एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं जेनेटिक बदलाव (म्यूटेशन) के कारण अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगती हैं और शरीर के प्राकृतिक नियंत्रण तंत्र से बाहर हो जाती हैं। कैंसर की सबसे बड़ी पहचान यह है कि इसकी कोशिकाएं आसपास के ऊतकों पर हमला करती हैं और शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल सकती हैं। यही इसे खतरनाक बनाते हैं। कई कैंसर ठोस गांठ (ट्यूमर) बनाते हैं, जैसे स्तन या फेफड़े का कैंसर, लेकिन कुछ, जैसे ल्यूकेमिया, बिना गांठ बनाए भी विकसित होते हैं।

ट्यूमर या कैंसर की सही पहचान के लिए अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जांचें की जाती हैं, और जरूरत पड़ने पर ऊतक का सैंपल लेकर माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है, जिससे यह तय होता है कि ट्यूमर घातक है या नहीं। कुछ मामलों में सर्जरी करके ट्यूमर निकाला जाता है। लेकिन कैंसर का इलाज आमतौर पर सर्जरी के साथ रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी जैसे तरीकों के संयोजन से किया जाता है।

सबसे अहम बात यह है कि इनके सही शब्दों का इस्तेमाल बेहद जरूरी है। ‘कैंसर’ शब्द के साथ डर जुड़ा होता है, लेकिन आज कई तरह के कैंसर का इलाज संभव है और मरीज पूरी तरह ठीक भी हो सकते हैं। स्पष्ट और सही संवाद ही बेहतर इलाज की पहली सीढ़ी है। संक्षेप में कहें, तो ठोस कैंसर को ट्यूमर कहा जा सकता है, लेकिन सभी ट्यूमर घातक नहीं होते। यही अंतर समझना और समझाना, दोनों ही जरूरी हैं। - द कन्वर्सेशन
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