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कार्तवीर्य अर्जुन के चार वरदान, जो पूरे भी हुए
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सार
अर्जुन ने दत्तात्रेय से चार वरदान मांगे-हजार भुजाएं, अधर्मियों को दंड देने की शक्ति, संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर धर्मपूर्वक शासन करने की क्षमता। अंत में उसने मांगा कि उसका वध उससे बलवान योद्धा के हाथों ही हो।
कार्तवीर्य के वरदान
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
ययाति के वंश में कनक नाम का राजा हुआ। कनक के चार पुत्र हुए- कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा और कृतौजा। इनमें कृतवीर्य का पुत्र अर्जुन अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी था। उसकी हजार भुजाएं थीं, इसलिए वह सहस्रार्जुन या कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से विख्यात हुआ। बचपन से ही उसमें असाधारण शक्ति के संकेत दिखाई देते थे, परंतु वह केवल बलवान ही नहीं, बल्कि धर्मप्रिय भी था।
युवावस्था में पहुंचकर अर्जुन के मन में एक विचार उठा-’सिर्फ शक्ति पर्याप्त नहीं है, मुझे दिव्य बल भी चाहिए। ऐसा बल, जो धर्म की रक्षा कर सके।’ यह सोचकर अर्जुन वन में चला गया और महर्षि अत्रि के पुत्र भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करने लगा। दिन, सप्ताह, मास और वर्ष बीतते गए, और इस तरह अर्जुन सैकड़ों वर्षों तक तपस्या करता रहा। उसकी तपस्या इतनी कठोर थी कि देवता भी चकित हो उठे।
आखिर एक दिन भगवान दत्तात्रेय ने अर्जुन को दर्शन दिए। उन्होंने कहा, ‘वत्स अर्जुन, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। मांगो, क्या चाहते हो?’ अर्जुन ने विनम्र स्वर में कहा, ‘प्रभो! मुझे ऐसी शक्ति दीजिए, जिससे मैं धर्म की रक्षा कर सकूं।’
तब अर्जुन ने दत्तात्रेय से चार वरदान मांगे-हजार भुजाएं, अधर्मियों को दंड देने की शक्ति, संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर धर्मपूर्वक शासन करने की क्षमता और अंत में उसने मांगा कि मेरा वध मुझसे अधिक शक्तिशाली योद्धा के हाथों ही हो। दत्तात्रेय ने अर्जुन को चारों वरदान दिए और चले गए। अब अर्जुन पहले जैसा नहीं रहा।
वह जब चाहता उसकी हजार भुजाएं प्रकट हो जातीं। वह युद्धभूमि में उतरता, तो शत्रु कांप उठते। उसने सातों द्वीपों सहित संपूर्ण पृथ्वी को जीत लिया। परंतु उसने विजय के साथ ही धर्मपूर्वक शासन भी किया। उसके राज्य में न्याय, व्यवस्था और समृद्धि थी। वह स्वयं रथ पर बैठकर राज्य का निरीक्षण करता और चोर-डाकुओं पर कड़ी नजर रखता। उसने दस हजार यज्ञ किए। उन यज्ञों में स्वर्ण के स्तंभ लगाए जाते थे, वेदियां भी स्वर्ण की होती थीं और देवता स्वयं आकर उनमें भाग लेते थे। एक बार देवर्षि नारद अर्जुन के पास आए और बोले, ‘भविष्य में कोई भी राजा यज्ञ, दान, तप और पराक्रम में कार्तवीर्य अर्जुन की बराबरी नहीं कर सकेगा।’ यह सुनकर भी अर्जुन के भीतर अहंकार नहीं जगा। वह अपनी हजार भुजाओं से समुद्र को मथ सकता था।
एक दिन अर्जुन, नर्मदा नदी के तट पर जलक्रीड़ा कर रहा था। उसने अपनी भुजाओं से नदी के प्रवाह को रोक दिया। उस समय लंका नरेश रावण वहां आया। उसने देखा कि अर्जुन ने भुजाओं से नदी का प्रवाह रोक रखा था। उसे देखकर रावण ने अर्जुन को युद्ध के लिए चुनौती दे दी, परंतु अर्जुन ने केवल पांच बाणों से रावण को मूर्छित कर दिया और उसे बांधकर अपनी राजधानी माहिष्मती ले आया। यह समाचार सुनकर रावण के पितामह महर्षि पुलस्त्य स्वयं अर्जुन के पास पहुंचे और उन्होंने रावण को मुक्त करने का आग्रह किया। तब अर्जुन ने रावण को बंधनमुक्त कर दिया।
अर्जुन का यश चारों ओर फैलता गया। उसने अनेक वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य किया, परंतु एक दिन उसने अनजाने में महर्षि वशिष्ठ के वन को जला दिया। क्रोधित होकर वसिष्ठ ने उसे शाप दिया, ‘अर्जुन! तुम्हारी ये सहस्र भुजाएं एक दिन नष्ट होंगी, और एक ब्राह्मण तुम्हारा वध करेगा।’ अर्जुन ने वशिष्ठ के शाप को स्वीकार कर लिया। एक दिन भृगुवंशी परशुराम उससे युद्ध करने आए। अर्जुन अपनी हजार भुजाओं से प्रहार करता रहा, और परशुराम अपने परशु से उनका उत्तर देते रहे।
अंततः वशिष्ठ का शाप सत्य हुआ। परशुराम ने कार्तवीर्य अर्जुन की सहस्र भुजाएं काट डालीं और उसका वध कर दिया। अंत समय में अर्जुन ने कहा, ‘आज मेरा चौथा वरदान सत्य हो गया। मुझसे अधिक शक्तिशाली योद्धा के हाथों मेरा अंत हुआ है।’
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युवावस्था में पहुंचकर अर्जुन के मन में एक विचार उठा-’सिर्फ शक्ति पर्याप्त नहीं है, मुझे दिव्य बल भी चाहिए। ऐसा बल, जो धर्म की रक्षा कर सके।’ यह सोचकर अर्जुन वन में चला गया और महर्षि अत्रि के पुत्र भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या करने लगा। दिन, सप्ताह, मास और वर्ष बीतते गए, और इस तरह अर्जुन सैकड़ों वर्षों तक तपस्या करता रहा। उसकी तपस्या इतनी कठोर थी कि देवता भी चकित हो उठे।
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आखिर एक दिन भगवान दत्तात्रेय ने अर्जुन को दर्शन दिए। उन्होंने कहा, ‘वत्स अर्जुन, मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। मांगो, क्या चाहते हो?’ अर्जुन ने विनम्र स्वर में कहा, ‘प्रभो! मुझे ऐसी शक्ति दीजिए, जिससे मैं धर्म की रक्षा कर सकूं।’
तब अर्जुन ने दत्तात्रेय से चार वरदान मांगे-हजार भुजाएं, अधर्मियों को दंड देने की शक्ति, संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर धर्मपूर्वक शासन करने की क्षमता और अंत में उसने मांगा कि मेरा वध मुझसे अधिक शक्तिशाली योद्धा के हाथों ही हो। दत्तात्रेय ने अर्जुन को चारों वरदान दिए और चले गए। अब अर्जुन पहले जैसा नहीं रहा।
वह जब चाहता उसकी हजार भुजाएं प्रकट हो जातीं। वह युद्धभूमि में उतरता, तो शत्रु कांप उठते। उसने सातों द्वीपों सहित संपूर्ण पृथ्वी को जीत लिया। परंतु उसने विजय के साथ ही धर्मपूर्वक शासन भी किया। उसके राज्य में न्याय, व्यवस्था और समृद्धि थी। वह स्वयं रथ पर बैठकर राज्य का निरीक्षण करता और चोर-डाकुओं पर कड़ी नजर रखता। उसने दस हजार यज्ञ किए। उन यज्ञों में स्वर्ण के स्तंभ लगाए जाते थे, वेदियां भी स्वर्ण की होती थीं और देवता स्वयं आकर उनमें भाग लेते थे। एक बार देवर्षि नारद अर्जुन के पास आए और बोले, ‘भविष्य में कोई भी राजा यज्ञ, दान, तप और पराक्रम में कार्तवीर्य अर्जुन की बराबरी नहीं कर सकेगा।’ यह सुनकर भी अर्जुन के भीतर अहंकार नहीं जगा। वह अपनी हजार भुजाओं से समुद्र को मथ सकता था।
एक दिन अर्जुन, नर्मदा नदी के तट पर जलक्रीड़ा कर रहा था। उसने अपनी भुजाओं से नदी के प्रवाह को रोक दिया। उस समय लंका नरेश रावण वहां आया। उसने देखा कि अर्जुन ने भुजाओं से नदी का प्रवाह रोक रखा था। उसे देखकर रावण ने अर्जुन को युद्ध के लिए चुनौती दे दी, परंतु अर्जुन ने केवल पांच बाणों से रावण को मूर्छित कर दिया और उसे बांधकर अपनी राजधानी माहिष्मती ले आया। यह समाचार सुनकर रावण के पितामह महर्षि पुलस्त्य स्वयं अर्जुन के पास पहुंचे और उन्होंने रावण को मुक्त करने का आग्रह किया। तब अर्जुन ने रावण को बंधनमुक्त कर दिया।
अर्जुन का यश चारों ओर फैलता गया। उसने अनेक वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य किया, परंतु एक दिन उसने अनजाने में महर्षि वशिष्ठ के वन को जला दिया। क्रोधित होकर वसिष्ठ ने उसे शाप दिया, ‘अर्जुन! तुम्हारी ये सहस्र भुजाएं एक दिन नष्ट होंगी, और एक ब्राह्मण तुम्हारा वध करेगा।’ अर्जुन ने वशिष्ठ के शाप को स्वीकार कर लिया। एक दिन भृगुवंशी परशुराम उससे युद्ध करने आए। अर्जुन अपनी हजार भुजाओं से प्रहार करता रहा, और परशुराम अपने परशु से उनका उत्तर देते रहे।
अंततः वशिष्ठ का शाप सत्य हुआ। परशुराम ने कार्तवीर्य अर्जुन की सहस्र भुजाएं काट डालीं और उसका वध कर दिया। अंत समय में अर्जुन ने कहा, ‘आज मेरा चौथा वरदान सत्य हो गया। मुझसे अधिक शक्तिशाली योद्धा के हाथों मेरा अंत हुआ है।’