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Iran War: इस्राइल क्यों मजबूत होता गया और अरब देश पीछे क्यों छूटते गए?

Zahid Khan जाहिद खान
Updated Sat, 11 Apr 2026 07:31 PM IST
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सार

पश्चिम एशिया की राजनीति को समझने की कोशिश में यह सवाल बार-बार सामने आता है कि इस्राइल इतना मजबूत कैसे बन गया और उसके सामने अरब देशों की एकजुट ताकत क्यों नहीं बन पाई। इसका जवाब सिर्फ युद्धों में नहीं, बल्कि लंबी रणनीति, तकनीक, कूटनीति और अरब दुनिया के बिखराव में छिपा है।

US Iran War Why did Israel grow stronger while Arab nations fell behind know west asia geopolitics
पश्चिम एशिया संघर्ष - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार

1948 में इस्राइल की स्थापना के साथ ही संघर्ष शुरू हो गया था। इसके बाद 1948, 1967 और 1973 की जंगों ने पूरे इलाके की दिशा तय की। खासकर 1967 की छह दिन की जंग में इस्राइल ने मिस्र, सीरिया और जॉर्डन को पीछे धकेलते हुए वेस्ट बैंक, गाजा और गोलान हाइट्स जैसे अहम इलाकों पर कब्जा कर लिया। यह सिर्फ सैन्य ताकत का मामला नहीं था, बल्कि बेहतर तैयारी, योजना और तेज फैसलों का भी परिणाम था।

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आज इस्राइल की आबादी करीब 90 लाख के आसपास मानी जाती है, लेकिन उसकी सेना दुनिया की आधुनिक सेनाओं में गिनी जाती है। उसके पास उन्नत मिसाइल सिस्टम, मजबूत एयर डिफेंस, साइबर क्षमता और बेहद प्रभावी खुफिया तंत्र है। इस्राइल की ताकत का एक बड़ा कारण यह भी है कि उसने रक्षा, तकनीक और रणनीतिक ढांचे को लगातार मजबूत किया। उसने अपनी सुरक्षा को हमेशा पहली प्राथमिकता दी और उसी हिसाब से संसाधनों का इस्तेमाल किया।
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अमेरिका का समर्थन भी इस्राइल की मजबूती का एक बड़ा आधार रहा है। उसे हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता मिलती है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अमेरिका ने कई बार उसका खुलकर साथ दिया। संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल के खिलाफ आने वाले प्रस्तावों पर अमेरिकी वीटो इसका बड़ा उदाहरण है। इससे साफ है कि इस्राइल की लड़ाई सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसे कूटनीतिक सुरक्षा भी मिलती रही।

दूसरी ओर अरब देशों की स्थिति अलग रही। मिस्र, जो कभी अरब दुनिया का बड़ा शक्ति केंद्र माना जाता था, उसने 1979 में इस्राइल के साथ शांति समझौता कर लिया। जॉर्डन ने 1994 में ऐसा ही रास्ता अपनाया। खाड़ी के कई देशों ने भी धीरे-धीरे अपने रिश्ते बदलने शुरू किए। उधर, सीरिया गृहयुद्ध में उलझ गया, इराक लंबे समय तक संघर्ष और अस्थिरता से जूझता रहा, लीबिया बिखर गया। ऐसे में वह साझा मोर्चा कभी मजबूत रूप में नहीं बन सका, जिसकी चर्चा लंबे समय तक होती रही।

यहां सबसे बड़ा फर्क रणनीति का दिखता है। इस्राइल ने अपनी सुरक्षा, तकनीक, सेना और वैश्विक समर्थन को एक दिशा में जोड़े रखा। इसके विपरीत अरब देशों के सामने अलग-अलग प्राथमिकताएं रहीं। किसी के लिए आंतरिक स्थिरता अहम रही, किसी के लिए सत्ता बचाना, किसी के लिए आर्थिक हित। नतीजा यह हुआ कि सामूहिक ताकत होने के बावजूद वह एकजुट रणनीति में नहीं बदल सकी।

तकनीक के क्षेत्र में भी इस्राइल ने खुद को मजबूत बनाया। कम आबादी के बावजूद उसने रिसर्च, नवाचार और रक्षा तकनीक में लगातार निवेश किया। इसी कारण उसे दुनिया में स्टार्टअप नेशन के तौर पर भी पहचान मिली। वहीं, कई अरब देशों के पास संसाधन और धन तो बहुत रहे, लेकिन तकनीक और अनुसंधान की वह बढ़त नहीं बन सकी, जो लंबे समय में रणनीतिक ताकत देती है।

आज की स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। यह कई दशकों की तैयारी, लगातार निवेश, साफ राष्ट्रीय लक्ष्य और दूसरी तरफ अरब दुनिया के राजनीतिक बिखराव का नतीजा है, इसलिए इस्राइल की बढ़त को सिर्फ सैन्य शक्ति से समझना अधूरा होगा। इसके पीछे तकनीक, कूटनीति, वैश्विक समर्थन और विरोधी पक्ष की असंगठित स्थिति भी बराबर की वजहें हैं।

इस्राइल की मजबूती एक लंबी रणनीति, तकनीकी बढ़त, सैन्य तैयारी और अमेरिकी समर्थन का नतीजा है। दूसरी तरफ अरब देश साझा ताकत होने के बावजूद एकजुट दिशा में आगे नहीं बढ़ सके। यही कारण है कि आज मध्य पूर्व की तस्वीर इस्राइल के पक्ष में ज्यादा झुकी हुई दिखाई देती है।

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