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सिनौली: 21वीं शताब्दी की सबसे बड़ी पुरातात्विक खोज
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सार
सिनौली से प्राप्त मानव समाधियों की एक विशिष्टता और है जो 2018 के उत्खनन में ही ज्ञात हुई है l यहां समाधिस्थ शवों को काष्ठ निर्मित शवपेटिका में रख कर दफनाया गया था
सिनौली से प्राप्त रथ
- फोटो : साभार - डॉ संजय कुमार मंजुल
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विस्तार
भारत के गौरवशाली अतीत के पन्नों व रहस्यों को उद्घाटित करने का एकमात्र मार्ग पुरातत्व में ही निहित है l पुरातात्विक उत्खननों ने समय-समय पर भारतीय इतिहास के गौरवशाली पृष्ठों को विश्व पटल पर अंकित किया है l वर्तमान शताब्दी दूसरे दशक में हुई एक पुरातात्विक खोज ने भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया l
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राजधानी दिल्ली से लगभग 70 किलोमीटर की दुरी पर यमुना नदी के किनारे पर स्थित बागपत जिले के ग्राम सिनौली से 2018 में जो पुरावशेष उत्खनन से प्राप्त हुए उन्होंने भारतीय इतिहास के दृष्टिकोण को पूर्णतः परिवर्तित कर दिया। वैसे तो सिनौली उत्खनन 2004- 2005 में भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा करवाया गया था l परन्तु, 2018 में विभाग के ही अतिरिक्त महानिदेशक डॉक्टर संजय कुमार मंजुल के नेतृत्व में हुए उत्खनन में जो पुरानिधियां प्राप्त हुई वो आज से पूर्व भारत में कभी प्राप्त नहीं हुई थीं l
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सिनौली से प्राप्त पुरानिधि
इस पुरास्थल पर आज से 4000 वर्ष पूर्व (यह तिथि कार्बन डेटिंग पर आधारित है) की 116 मानव समाधियां प्रकाश में आई हैं l इन मानव समाधियों के साथ मिली पुरानिधियां अपने आप में विशिष्ट हैं l सिनौली से प्राप्त सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुरानिधि है घोड़े से संचालित होने वाला काष्ठ व ताम्र निर्मित रथ l यह पहला अवसर है जब भारत की भूमि पर उत्खनन में रथ के अवशेष प्राप्त हुए हैं l
यहां यह बात उल्लेखनीय है की भारत के प्राचीन ग्रंथों में रथों का विशिष्ट स्थान है l उत्खनन में कुल 3 रथ प्राप्त हुए हैं। यह रथ अत्यंत ही उन्नत तकनीक से बनाए गए हैं तथा यह प्राचीन भारतीय ज्ञान के परिचायक हैंl यह रथ मानव समाधियों के साथ ही दफनाए गए थेl वस्तुतः समाधिस्थ मानव ही इन रथों के स्वामी थे l
रथों के साथ ही हमें ताम्र निर्मित तलवारें भी सिनौली की समाधियों से प्राप्त हुई हैं। पुरातत्व की भाषा में इन तलवारों को शृंगिका तलवार या एंटीना स्वोर्ड कहा जाता है l
सिनौली के एक शवाधान से तो हमें काष्ठ निर्मित धनुष के भी अवशेष प्राप्त हुए हैं l यहां यह बात उल्लेखनीय हो जाती है कि समाधिस्थ कंकालों में स्त्री व पुरुष दोनों के ही कंकाल विद्यमान हैं l इन कंकालों के साथ विभिन्न प्रकार के पुरावशेष रखे गए हैं l कुछ समाधियों से हमें युद्ध में उपयोग होने वाली ढालें भी प्राप्त हुई हैं, इनका निर्माण भी काष्ठ व ताम्बे से किया गया था l
इसके साथ में सिनौली से पहली बार योद्धाओं द्वारा पहने जाने वाला शिरस्त्राण भी प्राप्त हुआ है l यह भी शव के साथ ही दफनाया गया था तथा यह ताम्र निर्मित है l मानव कंकालों के साथ मिलने वाले पुरावशेष निःसंदेह इस बात के अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत करते हैं की सिनौली में रहने वाले भारतियों के पूर्वज योद्धा वर्ग के थेl
इतना ही नहीं नारियों के कंकाल के साथ मिली तलवारें व अन्य पुरावशेष इस बात के प्रमाण उपलब्ध करते हैं की प्राचीन भारत में नारी की सामाजिक स्थिति पुरुषों के समतुल्य थी l प्राचीन हिन्दू ग्रंथों में भी नारियों के योद्धा होने के पर्याप्त विवरण उपलब्ध हैं।
उत्खनन से प्राप्त मानव समाधियां
सिनौली से प्राप्त मानव समाधियों की एक विशिष्टता और है जो 2018 के उत्खनन में ही ज्ञात हुई है l यहां समाधिस्थ शवों को काष्ठ निर्मित शवपेटिका में रख कर दफनाया गया था l शव पेटिकाओं की लकड़ी तो समय के साथ नष्ट हो गई परन्तु लकड़ी की सतह पर ताम्बे व सेलखड़ी का उपयोग कर किए गए अंलकरण ने यह सिद्ध कर दिया की शवों को चार पैर वाली काष्ठ निर्मित शवपेटिकाओं में रखा गया था l
इन्हीं शवपेटिकाओं में से एक की ऊपरी सतह पर ताम्बे का उपयोग कर नौ मानवों की मुखाकृतियां बनाई गई हैं l इन मुखाकृतियों के शीर्ष पर दो सींग व पीपल की पत्ती युक्त मुकुट बनाया गया है l यह सम्भवतः किसी धार्मिक प्रयोजन हेतु किया गया होगा l
सिनौली की समाधियों से ताम्र निर्मित उपकरणों के अतिरिक्त भी विभिन्न प्रकार के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं l मृतकों के साथ में मिट्टी के बर्तनों में खाद्य पदार्थ, मनके, हड्डी के बने बाणाग्र आदि भी दफनाए गए थे l सिनौली के समाधी स्थल के पास से पकी हुई ईंटों का बना एक पवित्र कक्ष मिला है जिसकी छत सम्भवतः लकड़ी का उपयोग करके बनाई गई थी l ऐसा प्रतीत होता है की शवों को समाधी देने से पहले इस कक्ष में लाया जाता था तथा यहाँ अंतिम धार्मिक क्रियाएं सम्पादित की जाती थी l
2005 में हुए उत्खनन में रहवासी क्षेत्र के प्रमाण सिनौली से प्राप्त नहीं हुए थे l 2018 में हमें सिनौली से मिट्टी के बर्तनों को पकाने की व ताम्बे को गलाने की भट्टियों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं l इतना ही नहीं सिनौली से बड़ी संख्या में पकी ईंटों भी प्राप्त हुई हैं जो 50 सेंटीमीटर लम्बी व 30 सेंटीमीटर चौड़ी हैं l इन पुरावशेषों ने यह स्पष्ट कर दिया है की सिनौली में रहने वाले लोग यहीं स्थाई तौर पर रहा करते थे l
भारतीय इतिहास में सरस्वती सिंधु सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्थान है l सिनौली के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेष सरस्वती सिंधु सभ्यता से पूर्णतः भिन्न है l विगत वर्षों में पुरातत्वविदों द्वारा किये गए सर्वेक्षण से ऐसी संभावनाएं प्रकट की जाने लगी है की गंगा व यमुना के दोआब में 4000 वर्ष पूर्व सरस्वती सिंधु सभ्यता से भिन्न एक संस्कृति विद्यमान थी जिसपर अभी और अधिक शोध करने की आवश्यकता है l सिनौली से प्राप्त पुरावशेषों पर वैज्ञानिक आधार पर कार्य किया जा रहा हैl
उत्खननकर्ता के अनुसार सिनौली के कंकाल का डीएनए व राखीगढ़ी से मिले 4500 वर्ष पुराने कंकाल का डीएनए समान है l ऐसा प्रतीत होता है की सिनौली के पुरातात्विक अवशेष व डीएनए की रिपोर्ट भारतीय इतिहास में फैलाए गए भ्रम को शीघ्र ही धराशाई कर देगी ऐसी प्रबल सम्भावना हैl
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