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‘इस्लामाबाद टॉक्स’ बेनतीजा: बड़ा सवाल- इस भव्य इवेंट का बिल कौन भरेगा?

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Sun, 12 Apr 2026 12:03 PM IST
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सार

इस वार्ता में एक और बात साफ दिखी, दुनिया की बड़ी ताकतों की मध्यस्थ बनने को लेकर चुप्पी। न यूरोपीय संघ ने कोई ठोस पहल की, न चीन और न ही रूस ने खुलकर मध्यस्थता की। उल्टा, कुछ देश अपने-अपने पक्षों के साथ खड़े नजर आए, जिससे स्थिति और जटिल हो गई।

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जेडी वेंस, अमेरिकी उपराष्ट्रपति - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

ईरान और अमेरिका के बीच इस्लामाबाद में हुई वार्ता खत्म हो चुकी है। दोनों देश अपने-अपने रास्ते लौट गए हैं, लेकिन पीछे छोड़ गए हैं कई सवाल, कई शंकाएं और एक अधूरी कोशिश का एहसास।

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सच कहें तो शुरुआत से ही यह उम्मीद कम ही थी कि इस वार्ता से कोई ठोस नतीजा निकलेगा। फिर भी, दुनिया की नजरें इस पर टिकी थीं। शायद कोई रास्ता निकल आए, शायद तनाव थोड़ा कम हो जाए, लेकिन जो हुआ, उसने उम्मीदों से ज्यादा सवाल खड़े कर दिए।
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इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान की भूमिका को लेकर रही। उसने खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश किया, लेकिन क्या वह सच में मध्यस्थ था? या सिर्फ एक ऐसा मंच, जहां दो पक्ष आकर अपनी-अपनी बातें कहकर लौट गए?

कूटनीति में कई बार छोटी-छोटी बातें भी बड़ा संकेत दे जाती हैं। जब ईरानी प्रतिनिधिमंडल रावलपिंडी के नूर खान एयरबेस पर उतरा तो पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर सैन्य वर्दी में उनका स्वागत करते दिखे। उस पल में एक तरह का भाव था, जैसे कोई अपनापन या शायद एक खास संदेश, लेकिन जब अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पहुंचा तो तस्वीर थोड़ी अलग थी। वही व्यक्ति, लेकिन इस बार सूट-बूट में, थोड़ा औपचारिक, थोड़ा झुका हुआ अंदाज।

यह अंतर शायद बहुतों को सामान्य लगे, लेकिन सवाल यहीं से शुरू होते हैं, क्या यह सिर्फ प्रोटोकॉल था या इसके पीछे कोई झुकाव भी था? जब कोई देश खुद को मध्यस्थ कहता है तो उससे उम्मीद होती है कि वह दोनों पक्षों के बीच बराबर की दूरी बनाए रखे। यहां वह संतुलन साफ नजर नहीं आया।

इस पूरी वार्ता का एक और पहलू ध्यान खींचता है, जिस तरह से इसे प्रस्तुत किया गया। पूरा इस्लामाबाद जैसे एक बड़े आयोजन में बदल गया था। सड़कों पर पोस्टर, शहर में सुरक्षा के नाम पर लॉकडाउन और ‘इस्लामाबाद टॉक्स’ का प्रचार, सबकुछ एक बड़े इवेंट जैसा लग रहा था।

समाधान से ज्यादा प्रदर्शन

सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें और वीडियो सामने आए, उनमें चर्चा इस बात की कम थी कि वार्ता में क्या हुआ और ज्यादा इस बात की कि मेहमानों को कैसी सुविधाएं मिलीं, फ्री वाई-फाई, अच्छा खाना, गीत-संगीत, शानदार इंतजाम। जैसी भारत के ले. जनरल (रिटा.) केजेएस ढिल्लो ने चुटकी ली, ‘होटल का बिल कौन भरेगा?’ यहां मन में एक सीधा सवाल उठता है, क्या कूटनीति अब समाधान से ज्यादा प्रदर्शन बनती जा रही है? जब दो देश अपने-अपने दर्द और दबाव के साथ बातचीत के लिए आते हैं, तब क्या यह माहौल उनके हालात के अनुरूप था?

अगर हम थोड़ा ठहर कर सोचें तो समझ आता है कि इस वार्ता में शामिल दोनों पक्ष अपने-अपने बोझ के साथ आए थे। ईरान, जो हाल के संघर्ष में काफी नुकसान झेल चुका है। वहां के लोगों का दर्द, बुनियादी ढांचे की तबाही और भीतर की बेचैनी, यह सब उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ ही इस्लामाबाद पहुंचा होगा।

दूसरी ओर, अमेरिका भी इस पूरे घटनाक्रम में पूरी तरह सहज नहीं है। मध्य पूर्व में उसके सैन्य ठिकानों पर हमले हुए हैं, उसकी रणनीति पर सवाल उठे हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे वैसा समर्थन नहीं मिला, जैसा वह उम्मीद करता था। ऐसे में, जब दोनों पक्ष एक टेबल पर बैठते हैं तो वहां केवल शब्द नहीं होते, वहां उनके देशों की स्थिति, उनकी मजबूरियां और उनकी प्रतिष्ठा भी साथ होती है।

इस वार्ता को लेकर भारत का रुख

हालांकि, पूरे घटनाक्रम के बीच भारत का रुख दिलचस्प रहा। भारत ने इस वार्ता में कोई सक्रिय भूमिका नहीं निभाई। न उसने मध्यस्थ बनने की कोशिश की, न ही खुद को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया। देश के भीतर कुछ लोगों ने इसकी आलोचना भी की, कहा गया कि भारत ने एक बड़ा अवसर गंवा दिया, लेकिन अब, जब वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई है तो वही सवाल उल्टा खड़ा होता है, क्या हर मौके पर आगे बढ़ना जरूरी होता है?

क्या हर संघर्ष में खुद को शामिल करना ही कूटनीति है? कई बार दूरी बनाकर रखना भी एक सोच-समझकर लिया गया फैसला होता है। शायद भारत ने यही किया।

इस वार्ता में एक और बात साफ दिखी, दुनिया की बड़ी ताकतों की मध्यस्थ बनने को लेकर चुप्पी। न यूरोपीय संघ ने कोई ठोस पहल की, न चीन और न ही रूस ने खुलकर मध्यस्थता की। उल्टा, कुछ देश अपने-अपने पक्षों के साथ खड़े नजर आए, जिससे स्थिति और जटिल हो गई। नाटो भी इस पूरे मामले में उतना सक्रिय नहीं दिखा, जितनी उससे उम्मीद थी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति भी कई जगह सवालों के घेरे में है। ऐसे में सबसे बड़ा डर यही है, क्या यह असफल वार्ता आने वाले बड़े टकराव की भूमिका बन रही है?

अगर पूरे घटनाक्रम को एक नजर से देखें तो यह वार्ता एक ठोस समाधान से ज्यादा एक अधूरी कोशिश लगती है। पाकिस्तान ने इसे एक बड़ी उपलब्धि की तरह पेश किया, लेकिन उसके व्यवहार और प्रस्तुति ने उसकी भूमिका को लेकर संदेह भी पैदा कर दिया।

दूसरी ओर, दुनिया की बड़ी ताकतें या तो चुप रहीं या अपने-अपने हितों में उलझी दिखीं। और अंत में, वही हुआ जिसका डर था, कोई नतीजा नहीं, कोई स्पष्ट दिशा नहीं। क्या यह सब सिर्फ एक औपचारिकता थी? या फिर यह दिखाता है कि आज की कूटनीति कहीं न कहीं अपने असली उद्देश्य से भटक रही है?  

शायद सबसे जरूरी सवाल यही है, क्या दुनिया सच में शांति चाहती है या सिर्फ अपने-अपने हितों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है?


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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