स्मृतिशेष आशा भोसले: चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया
End Of Golden Era Of Indian Music: सुरों की मल्लिका आशा भोसले के निधन से संगीत का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। ओ.पी. नैयर और आर.डी. बर्मन के साथ उनके सृजनात्मक सफर ने उनकी आवाज को इंद्रधनुषी विस्तार और अद्वितीय वर्सटैलिटी प्रदान की।
विस्तार
Versatility Of Asha Bhosle Songs: आशा भोसले के अवसान के साथ ही स्वरों के उस समूह का अंतिम सितारा भी टूट गया, जिसे सुनते हुए अनेक पीढियां बढ़ीं और बूढ़ी हुईं। लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मन्नाडे, मुकेश , महेन्द्र कपूर और अब आशा भोसले।
आशा भोसले को द आशा बनाने वाले दो संगीतकार रहे हैं : ओ पी नैयर और आर डी बर्मन।
लता जैसे बरगद के नीचे आशा का पनपना अगर मुमकिन हुआ तो ओ पी नैयर की वजह से, वरना सम्भव था कि आशा भी ऊषा मंगेशकर की तरह एक और हाशिए की गायिका बनी रहतीं। ओ पी नैयर के खटकेदार, पंजाबी पश्चिमी संगीत में आशा की खनकदार आवाज़ इतनी सहजता से पूर्णता में ढली कि जैसे ये धुनें उनकी आवाज़ के लिए ही थीं। यह वह समय था जब गीता दत्त अपने बिखराव में गुम हो रही थीं और आशा का जादू छाता जा रहा था।
लंबे समय तक सृजनात्मकता के साझेदारों में व्यक्तिगत स्तर पर क्या कुछ चलता है, इसे तीसरा व्यक्ति क्या जान सकता है? हर सम्बन्ध और उसमें निहित हर साझेदारी और समझदारी की भी एक एक्सपायरी डेट होती है। 1973 की 'प्राण जाए पर वचन न जाए ' का संगीत नैयर आशा जुगलबंदी का स्वान सॉन्ग है। इसमें सारे गीत आशा के हैं। पुरुष कंठ का कोई गीत नहीं।
इसके बाद यह साथ टूटता है। तेज़ी से उभरते आर डी बर्मन , उतनी ही तेज़ी से अस्त होते नैयर। दिलराज कौर से पुष्पा पागधरे तक तमाम आवाज़ों में नैयर उस आवाज़ को खोजते रहे जो उनके जीवन और संगीत से जा चुकी थी। नैयर को भी अब जाना ही था।
आशा को अब पंचम का साथ था, जो चढ़ते सूरज थे। पंचम का नवाचारी संगीत और अगली पीढ़ी का था। पश्चिम का असर लेने में उस तरह के संकोच न थे और प्रयोगधर्मिता में कोई कसर न थी। इसमें एक बड़ी रेंज भी थी: लोक, शास्त्रीय, पश्चिमी किसी संगीत से परहेज न था। समय बदल चुका था, संगीत बदल चुका था, सम्बन्ध बदल रहा था।
हमें नहीं मालूम यह कैसी शादी थी। लेकिन ज़रा सोचिए आर डी के साथ ने आशा स्वर की कितनी आश्चर्यजनक व्याप्ति से हमें परिचित करवाया। नैयर इस स्वर के जिन आयामों तक पहुंचे थे पंचम उनसे आगे गए और नतीजे में हमें आशा की आवाज़ का पूरा इंद्रधनुष दिखाई दे सका,आशा की इस शिकायत के बावजूद कि अच्छे गीतों के लिए पंचम की पहली पसंद भी लता ही रहती थीं।
लता और आशा के युग्म में आशा को ज्यादा वर्सेटाइल मानने वालों की संख्या कभी कम नहीं रही। एक समय उन्हें सिर्फ क्लब गीत, कैबरे आदि ही मिलते थे। अपनी ऐंद्रिक आवाज और स्टाइल के कारण वे उनमें सरताज गायिका रहीं। लेकिन धीरे धीरे पहचाना गया कि वे सिर्फ ऐसे शोख गीतों तक ही सीमित नहीं हैं। उनकी रेंज बड़ी है। 'ओ पंछी प्यारे, सांझ सकारे' , 'अबके बरस भेज भैया को बाबुल', 'तोरा मन दर्पन कहलाए' ,'जा री पवनिया पिया के देस जा' ' चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया','फिर से आइयो बदरा बिदेसी' ,'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' ' कोई आग लगे लग जाए'।
इस सुरीले सफर में इतने स्मृति गीत हैं कि हर सूची छोटी पड़ जाएगी। इसमें अजीत वर्मन की एक बंदिश भी जोड़ता हूं। 'विजेता' फिल्म की रचना है: घन आनन्द आनन्द छायो। सुनिएगा।
आशा जी के जाने के साथ फिल्मसंगीत का वह अध्याय समाप्त होता है जिसमें रहते-बहते हुए हमने एक उम्र बिताई है।
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