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अगस्त क्रांति विशेष: जब बिना सेनापति के जीती गई जंग

Sat, 08 Aug 2026 11:53 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sat, 08 Aug 2026 11:53 AM IST
सार

जब औपनिवेशिक सत्ता ने नेतृत्व को सलाखों के पीछे धकेला, तो भारत का आम नागरिक स्वयं अपना नेता बन गया। छात्र, किसान, मजदूर, महिलाएं और दुकानदार—हर कोई इस महायज्ञ का ऋत्विक बन गया। बिना किसी केंद्रीय कमान या औपचारिक आदेशों के देश भर के लोगों ने एक ही समय पर एक जैसा सोचना और कार्य करना शुरू कर दिया।

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August Kranti: A battle won without a commander
अगस्त क्रांति - फोटो : Amar Ujala AI

विस्तार

9 अगस्त 1942 की भोर में जब पूरा देश सो रहा था, तब ब्रिटिश हुकूमत ने 'ऑपरेशन जीरो आवर' का चक्रव्यूह रचा। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आजाद समेत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तमाम शीर्ष नेताओं को रातों-रात गिरफ्तार कर गुप्त ठिकानों पर भेज दिया गया।

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अंग्रेजों का गणित बेहद सीधा  था- यदि आंदोलन के शीर्ष दिमागों को जेल में बंद कर दिया जाए, तो शरीर अपने आप बेजान हो जाएगा। लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य की यह सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। शीर्ष नेतृत्व के गायब होते ही क्रांति समाप्त होने के बजाय और अधिक विस्फोटक, व्यापक और विकेंद्रीकृत हो गई।
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1942 की 'अगस्त क्रांति' इतिहास के पन्नों में भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी और सफल नेतृत्वहीन क्रांति बनकर दर्ज हो गई।

जब औपनिवेशिक सत्ता ने नेतृत्व को सलाखों के पीछे धकेला, तो भारत का आम नागरिक स्वयं अपना नेता बन गया। छात्र, किसान, मजदूर, महिलाएं और दुकानदार—हर कोई इस महायज्ञ का ऋत्विक बन गया। बिना किसी केंद्रीय कमान या औपचारिक आदेशों के देश भर के लोगों ने एक ही समय पर एक जैसा सोचना और कार्य करना शुरू कर दिया।
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बंबई के गवालिया टैंक मैदान में पुलिस की बंदूकों की परवाह किए बिना 22 वर्षीय अरुणा आसफ अली ने तिरंगा फहराया। 22 साल की छात्रा उषा मेहता ने अंग्रेजों की नाक के नीचे से 'कांग्रेस गुप्त रेडियो' का संचालन कर क्रांति की अलख जगाई। 73 वर्ष की वयोवृद्ध मातंगिनी हाजरा ने बंगाल के तामलुक में सीने पर गोलियां खाकर भी राष्ट्रीय ध्वज को झुकने नहीं दिया।

बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में स्थानीय निवासियों ने अंग्रेजों को खदेड़कर अपनी सरकार स्थापित कर ली, तो महाराष्ट्र के सतारा में 'प्रति सरकार' का गठन हो गया। अंग्रेजों के पास इस बात का कोई तोड़ नहीं था कि वे उस आंदोलन को कैसे कुचलें, जिसका कोई एक चेहरा ही नहीं था।

नेतृत्वहीन आंदोलनों की यह अद्भुत विशेषता केवल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक सीमित नहीं रही। भारतीय इतिहास के उत्तर-औपनिवेशिक दौर में भी जब-जब जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा हुई, तब-तब जनता ने किसी स्थापित राजनीतिक दल या कद्दावर चेहरे का इंतजार किए बिना खुद कमान संभाली।

इसका सबसे बड़ा और सशक्त उदाहरण 1990 के दशक का 'उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन' है। पहाड़ी क्षेत्र की विशिष्ट भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की उपेक्षा के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन पूरी तरह से जन-संचालित था।

यद्यपि इसमें कई समितियां और स्थानीय नेता शामिल थे, लेकिन इस आंदोलन की असली रीढ़ वहां के आम नागरिक थे। विशेषकर पर्वतीय महिलाओं (मातृशक्ति) ने इस आंदोलन में अग्रिम पंक्ति की भूमिका निभाई।

उत्तराखंड आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि यह किसी एक नेता या राजनीतिक दल की महत्वाकांक्षा का मोहताज नहीं था। जब 1994 में खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) में निहत्थे आंदोलनकारियों पर बर्बर दमन चक्र चलाया गया, तो आंदोलन कमजोर पड़ने के बजाय राज्य के कोने-कोने में फैल गया।

गांव-गांव में महिलाओं ने घास-लकड़ी का काम छोड़कर सड़कों पर धरना दिया, छात्रों ने पढ़ाई छोड़कर जन-जागरण की कमान संभाली और पूर्व सैनिकों ने अपनी सेवाएं दीं। यह जनता के स्व-स्फूर्त आक्रोश का ही परिणाम था कि देश की संसद को जन-भावनाओं के आगे झुकना पड़ा और आखिरकार वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ।

यह आंदोलन इस बात का जीवंत प्रमाण था कि जब मुद्दा जनता की अस्मिता और अस्तित्व से जुड़ जाता है, तो उसे किसी करिश्माई नेता के दिशा-निर्देशों की आवश्यकता नहीं होती।

समय बदला, दौर बदला और 21वीं सदी के आगमन के साथ क्रांतियों के स्वरूप और माध्यम भी बदल गए। आज के दौर में नेतृत्वहीन क्रांतियों की कमान 'जेनरेशन-जेड', यानी 1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2010 के शुरुआती वर्षों के बीच जन्मे युवाओं के हाथों में है।

1942 में जो काम गुप्त पर्चों, प्रभात फेरियों और भूमिगत रेडियो से होता था, आज वही काम जेनरेशन-जेड स्मार्टफ़ोन, एनक्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और सोशल मीडिया हैशटैग्स के माध्यम से कर रही है। जेनरेशन-जेड के आंदोलनों की सबसे बड़ी खासियत उनका 'नेटवर्क-आधारित' और 'अहंकार-मुक्त' होना है।

2019 का हांगकांग का 'बी वॉटर' आंदोलन जेनरेशन-जेड की इस नई क्रांति शैली का उत्कृष्ट उदाहरण था। ब्रूस ली के प्रसिद्ध वाक्य "पानी की तरह बनो" से प्रेरित होकर लाखों युवाओं ने चीनी प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोला। इस आंदोलन का न तो कोई मुख्य कार्यालय था और न ही कोई औपचारिक नेता, जिसे पुलिस गिरफ्तार कर सके।

टेलीग्राम और फ़ोरम्स के ज़रिए युवा वास्तविक समय में तय करते थे कि कब कहाँ एकत्र होना है और पुलिस के आते ही पानी की तरह बहकर दूसरी जगह जमा हो जाना है। ठीक इसी तरह 2022 में श्रीलंका का 'अरागालया' (संघर्ष) आंदोलन देखा गया, जहां आर्थिक बदहाली से तंग आकर जेनरेशन-जेड और आम जनता बिना किसी राजनीतिक झंडे या नेता के सीधे राष्ट्रपति भवन में दाखिल हो गई और सत्ता को उखाड़ फेंका।

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर दुनिया भर में फैला 'फ्राइडेज़ फॉर फ्यूचर' आंदोलन हो या नस्लवाद के खिलाफ उभरा 'ब्लैक लाइव्स मैटर', या फिर नेपाल और केन्या में युवाओं द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ किए गए हालिया डिजिटल प्रदर्शन—इन सभी में जेनरेशन-जेड ने यह साबित किया है कि वे पारंपरिक राजनीति और स्थापित नेतृत्व के ढर्रे को खारिज करते हैं।

जेनरेशन-जेड किसी एक व्यक्ति को मसीहा मानने के बजाय विचार और सामूहिक कार्रवाई पर विश्वास करती है। सोशल मीडिया एल्गोरिदम के दौर में एक हैशटैग लाखों युवाओं को एक विचार के तहत रातों-रात एकजुट कर देता है।

सत्ता तंत्र के नजरिए से देखा जाए तो नेतृत्वहीन क्रांतियां हमेशा से सबसे बड़ा दुःस्वप्न रही हैं। चाहे वह 1942 की ब्रिटिश हुकूमत हो, या आधुनिक दौर की अधिनायकवादी और लोकतांत्रिक सरकारें—सत्ता हमेशा एक 'चेहरे' की तलाश करती है।

किसी आंदोलन में यदि कोई एक नेता होता है, तो सत्ता के पास उससे निपटने के तय हथकंडे होते हैं; उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, डराया-धमकाया जा सकता है, प्रलोभन दिया जा सकता है या फिर बातचीत की मेज पर लाकर आंदोलन को शिथिल किया जा सकता है। लेकिन जब आंदोलन 'नेतृत्वहीन' या 'बहु-नेतृत्वीय' होता है, तो सत्ता की पारंपरिक दमन नीतियां पूरी तरह विफल हो जाती हैं। आप उस विचार को कैसे गिरफ्तार करेंगे जो हर नागरिक के मन में तैर रहा है?

1942 की अगस्त क्रांति से लेकर उत्तराखंड आंदोलन और आज के जेनरेशन-जेड के डिजिटल अभियानों तक एक बात पूरी तरह स्पष्ट है—लोकतंत्र और जन-संघर्ष की असली ताकत किसी एक व्यक्ति के कड़े कंधों पर नहीं, बल्कि जागृत जन-चेतना के सामूहिक हाथों में होती है।

1942 में जब गांधी जी ने 'करो या मरो' का नारा दिया था, तो उन्होंने जाने-अनजाने में हर भारतीय को अपना नेता स्वयं बनने का अधिकार दे दिया था।

आज की जेनरेशन-जेड उसी भावना को नए तकनीकी कलेवर में जी रही है। यह इतिहास का वह शाश्वत पाठ है जो हर दौर के शासकों को यह याद दिलाता है कि जब जनता स्वयं अपनी नेता बन जाती है, तो दुनिया की कोई भी व्यवस्था या हुकूमत उसके कदम नहीं रोक सकती।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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