फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Constitutional Limits of Nomination: A Way to Save Power or a Constitutional Window for Experts

मनोनयन की संवैधानिक मर्यादा: सत्ता बचाने का रास्ता या विशेषज्ञों के लिए संवैधानिक खिड़की?

सार

संविधान में मनोनयन का उद्देश्य विशेषज्ञता और विशिष्ट अनुभव वाले लोगों को विधायिका में लाना था। लेकिन यदि इसका इस्तेमाल मुख्यमंत्री या मंत्री का पद बचाने के लिए होने लगे, तो यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक नैतिकता का भी सवाल बन जाता है। ऐसे में मनोनयन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुधार जरूरी हैं।

विज्ञापन
Constitutional Limits of Nomination: A Way to Save Power or a Constitutional Window for Experts
भारत का संविधान। - फोटो : AI Generated

विस्तार

भारतीय लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने वाले प्रतिनिधियों तक सीमित नहीं है। संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया था कि समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जिनके पास असाधारण ज्ञान, अनुभव और उपलब्धियां हैं, लेकिन वे चुनावी राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। ऐसे लोगों की विशेषज्ञता कानून बनाने की प्रक्रिया में आए, इसी सोच के तहत राज्यसभा और विधान परिषद में मनोनयन की व्यवस्था की गई।

विज्ञापन


राज्यसभा में राष्ट्रपति 12 सदस्यों को मनोनीत करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार इनका संबंध साहित्य, विज्ञान, कला और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों से होना चाहिए। 
विज्ञापन


विधान परिषद के मामले में अनुच्छेद 171(5) साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाजसेवा में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव को आधार बनाता है। यानी मनोनयन का मूल चरित्र विशेषज्ञता आधारित है, राजनीतिक नहीं।
विज्ञापन
विज्ञापन


जब विशेषज्ञता की जगह राजनीतिक जरूरत ले ले

समस्या व्यवस्था में नहीं, उसके इस्तेमाल में पैदा होती है। यदि कोई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार, समाजसेवी या सहकारी आंदोलन का अनुभवी व्यक्ति मनोनीत होता है तो संविधान की भावना मजबूत होती है। लेकिन यदि किसी राजनीतिक व्यक्ति को केवल इसलिए मनोनीत किया जाता है कि वह सदन में पहुंच जाए या सत्ता के समीकरण को बनाए रखा जा सके, तो मनोनयन की मूल भावना पर सवाल उठता है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति हर स्थिति में मनोनयन के लिए अयोग्य नहीं हो जाता। निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या उसके पास संविधान में निर्धारित क्षेत्र में वास्तव में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है। यदि नहीं, तो केवल राजनीतिक जरूरत के कारण मनोनयन करना संवैधानिक उद्देश्य से विचलन का प्रश्न पैदा करता है।

मुख्यमंत्री या मंत्री के लिए मनोनयन क्यों विवादास्पद?

सबसे संवेदनशील स्थिति तब बनती है जब कोई मुख्यमंत्री या मंत्री विधानमंडल का सदस्य नहीं है और उसके पद को बनाए रखने के लिए विधान परिषद में मनोनयन का रास्ता तलाशा जाता है।

संविधान का अनुच्छेद 164(4) गैर-सदस्य व्यक्ति को सीमित अवधि के लिए मंत्री बनने की अनुमति देता है, लेकिन छह महीने के भीतर उसे विधानमंडल का सदस्य बनना होता है। जहां विधान परिषद मौजूद है, वहां उसके लिए परिषद का चुनाव लड़कर सदस्य बनने का रास्ता उपलब्ध है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब चुनाव का रास्ता उपलब्ध है तो मनोनयन का रास्ता क्यों?
यदि कोई व्यक्ति चुनाव लड़कर विधान परिषद में आता है तो वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनता है। इसके विपरीत, मनोनयन में जनता या निर्वाचक मंडल सीधे निर्णय नहीं करता। इसलिए संविधान ने मनोनीत सदस्य के लिए अलग पात्रता निर्धारित की है।

यही वह बिंदु है जहां मुख्यमंत्री या मंत्री को मनोनीत किए जाने का मामला सामान्य मनोनयन से अलग दिखाई देता है।

पद बचाना संवैधानिक उद्देश्य नहीं हो सकता

संविधान ने मनोनयन की व्यवस्था इसलिए नहीं की कि किसी राजनीतिक व्यक्ति को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखकर सत्ता में बनाए रखा जाए। अनुच्छेद 164(4) की छह महीने की सीमा स्वयं बताती है कि गैर-सदस्य मंत्री को अंततः विधायिका का सदस्य बनना है।

इसलिए यदि किसी मुख्यमंत्री या मंत्री को विधान परिषद में लाने का वास्तविक कारण उसकी संवैधानिक विशेषज्ञता नहीं, बल्कि उसका पद बचाना है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अनुच्छेद 171 की व्यवस्था को उसके मूल उद्देश्य से अलग करके इस्तेमाल किया जा रहा है।

यहां कानून और संवैधानिक नैतिकता के बीच का अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है। कोई कदम तकनीकी रूप से तत्काल अवैध घोषित न हो, फिर भी यह पूछा जा सकता है कि क्या वह संविधान की भावना के अनुरूप है।

राज्यपाल की भूमिका भी कसौटी पर

राज्यपाल द्वारा विधान परिषद के सदस्यों का मनोनयन संसदीय शासन व्यवस्था में मंत्रिपरिषद की भूमिका से जुड़ा हुआ है। लेकिन मनोनयन का प्रस्ताव सरकार की ओर से आने का अर्थ यह नहीं कि संवैधानिक पात्रता अप्रासंगिक हो जाती है।

राज्यपाल के सामने मूल प्रश्न यह होना चाहिए कि प्रस्तावित व्यक्ति वास्तव में उस श्रेणी में आता है या नहीं, जिसके लिए संविधान ने मनोनयन की व्यवस्था की है।

इसलिए मनोनयन की प्रक्रिया को केवल राजनीतिक सहमति तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। इसमें संवैधानिक कसौटी की पारदर्शी जांच भी होनी चाहिए।

क्या मनोनयन समाप्त कर देना चाहिए?

दुरुपयोग की आशंका के कारण मनोनयन की पूरी व्यवस्था समाप्त कर देना आसान समाधान दिखाई दे सकता है, लेकिन इससे संविधान का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भी समाप्त हो जाएगा।

चुनाव जीतना विशेषज्ञता का प्रमाण नहीं है। देश में अनेक ऐसे वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार और समाजसेवी हो सकते हैं जिनका योगदान राष्ट्रीय स्तर का हो, लेकिन वे चुनावी राजनीति में आने के इच्छुक न हों। उनकी विशेषज्ञता संसद और विधान परिषद के लिए उपयोगी हो सकती है।

इसलिए व्यवस्था खत्म करने के बजाय उसकी शुचिता सुनिश्चित करना अधिक उचित होगा।

मनोनयन के लिए नई पारदर्शिता क्यों जरूरी?

हर मनोनयन के साथ यह सार्वजनिक होना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति को किस संवैधानिक श्रेणी के तहत चुना गया है और उस क्षेत्र में उसका योगदान क्या है। नामों की जांच के लिए विशेषज्ञों की स्वतंत्र समिति बनाई जा सकती है। राजनीतिक दल से निकटता को मनोनयन का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

विशेष रूप से यदि मनोनीत किए जाने वाले व्यक्ति का संबंध सक्रिय राजनीति से है, तो सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसकी विशेषज्ञता राजनीतिक पहचान से स्वतंत्र रूप से क्या है।

मुख्यमंत्री और मंत्री के मामले में कसौटी और कठोर होनी चाहिए। यदि वह व्यक्ति चुनाव के माध्यम से विधान परिषद में आ सकता है तो सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। मनोनयन तभी उचित ठहराया जा सकता है जब वह व्यक्ति स्वतंत्र रूप से अनुच्छेद 171(5) की संवैधानिक कसौटी पूरी करता हो।

जनादेश की मर्यादा और संविधान की भावना

लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोपरि है। संविधान ने अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व और मनोनयन दोनों की व्यवस्था करके लोकतंत्र को अधिक व्यापक बनाया है। लेकिन कोई भी संवैधानिक व्यवस्था राजनीतिक सुविधा के लिए मूल उद्देश्य से अलग नहीं की जा सकती।

यदि किसी मुख्यमंत्री को जनता के सामने चुनावी चुनौती से बचाकर मनोनयन के रास्ते सत्ता में बनाए रखने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो इससे एक असहज संदेश जा सकता है—कि चुनावी जनादेश की कमी को संवैधानिक मनोनयन से पूरा किया जा सकता है।

यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वस्थ संकेत नहीं होगा।

तीन सवाल, जिनसे बचना मुश्किल है

पहला-  क्या मनोनयन वास्तव में विशेषज्ञों को विधायिका में लाने के लिए हो रहा है या राजनीतिक जरूरत पूरी करने के लिए?

दूसरा- यदि मुख्यमंत्री या मंत्री विधान परिषद में चुनाव के रास्ते से आ सकता है तो केवल पद बचाने के लिए मनोनयन क्यों?

तीसरा- क्या मनोनयन की संवैधानिक शक्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट और पारदर्शी मानदंड तय करने का समय नहीं आ गया है?

व्यवस्था बचे, लेकिन उद्देश्य भी बचे

मनोनयन भारतीय संविधान की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी व्यापक लोकतांत्रिक सोच का हिस्सा है। लेकिन किसी भी संवैधानिक व्यवस्था की शक्ति तभी कायम रहती है जब उसका इस्तेमाल उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप हो।

इसलिए समाधान मनोनयन को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक दुरुपयोग पर रोक लगाना है। मनोनयन विशेषज्ञता का संवैधानिक माध्यम रहे, सत्ता बचाने का वैकल्पिक रास्ता नहीं।

मुख्यमंत्री या मंत्री का विधान परिषद में आना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है। लेकिन यदि मनोनयन का प्राथमिक उद्देश्य केवल पद बचाना हो और संवैधानिक पात्रता गौण हो जाए, तो यह लोकतांत्रिक नैतिकता और संविधान की भावना—दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

अंततः सवाल किसी एक मुख्यमंत्री, मंत्री, राज्यपाल या सरकार का नहीं है। सवाल यह है कि क्या संविधान द्वारा बनाई गई संस्थाओं का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए हो रहा है, जिसके लिए उन्हें बनाया गया था?

यदि उत्तर अस्पष्ट है, तो सुधार की जरूरत निश्चित है। क्योंकि संविधान में रास्ते केवल इसलिए नहीं बनाए गए कि सत्ता को रास्ता मिल जाए; वे लोकतंत्र को अधिक सार्थक बनाने के लिए बनाए गए हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed