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युवाओं के अधिकार और राजनीति: परीक्षा भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनों के मायने और राजनीतिक दलों की भूमिका

Fri, 07 Aug 2026 05:46 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Fri, 07 Aug 2026 05:46 PM IST
सार

JPSC Civil Services Controversy: देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में हो रहे भ्रष्टाचार और पेपर लीक के खिलाफ युवाओं का मुखर होना उनके अधिकारों के प्रति जागृति का प्रतीक है, लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा इन आंदोलनों को अपने सियासी हितों के लिए इस्तेमाल करने का गंभीर खतरा भी लगातार बना हुआ है।

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Youth Protests and Political Exploitation: Analyzing Student Agitations Over Examination Corruption in India
Jantar Mantar Protest - फोटो : Jantar Mantar Protest

विस्तार

Youth Protests Exam Corruption India: जेन जी का पहले जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन और अब झारखंड में सरकारी नौकरियों की प्रतियोगी परीक्षा में भारी भ्रष्टाचार को लेकर चल रहा आंदोलन जहां देश में युवाओं के अपने अधिकारों को लेकर जागने का सुखद संकेत है, वहीं दूसरी तरफ युवाओं का अब राजनीतिक दलों का नया टूल बनने का खतरा है, जिनका इस्तेमाल अपने सियासी हितों को साधने के लिए बड़ी चतुराई से किया जा रहा है।

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दिल्ली के जेन ज़ी आंदोलन के पीछे मुख्य भूमिका आम आदमी पार्टी, वामपंथियों और कुछ हद तक कांग्रेस की थी तो झारखंड की राजधानी रांची में चल रहे आंदोलन के पीछे भाजपा है। दोनो आंदोलनों में युवाओं की मांगे जायज हैं, लेकिन उनसे डील करने का सरकारों का तरीका लगभग एक सा है। यानी पहले अनदेखा करो और पानी सिर से गुजरने लगे तो समझौता करो।
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दरअसल, छात्रों की समस्या का निदान करने से ज्यादा ध्यान इस बात पर है कि कहीं विपक्ष इसका राजनीतिक लाभ न उठा ले। युवा भी सियासी दलों की धूर्तता को समझ रहे हैं। शायद इसी वजह से दिल्ली में आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने खुद को गैर राजनीतिक संगठन बताते हुए युवाओं के हित में एक प्रेशर ग्रुप बनाने की बात कही है।
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दिल्ली में जेन ज़ी का आंदोलन तो केन्द्रीय शिक्षा मंत्री डॉ.धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के साथ फिलहाल समाप्त हो गया है। लेकिन इस आंदोलन ने युवाओं को अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। ऐसे में जिन राज्यों में जहां लगेगा कि युवाओं के अन्याय हो रहा है, अब आगे भी आंदोलन होते रहेंगे। क्योंकि युवाओं की समझ आ गया है कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलता। अलबत्ता जंतर-मंतर और झारखंड के युवाओं के आंदोलन में बुनियादी फर्क यह है कि दिल्ली में युवा बेदाग और पारदर्शी शिक्षा पद्धति के लिए  लड़ रहे थे तो झारखंड के शिक्षित युवा योग्यतानुसार सरकारी नौकरियों में चयन की पारदर्शिता के लिए लड़ रहे हैं।

यूं तो भ्रष्टाचार देश के अधिकांश लोक सेवा आयोगो में है, लेकिन झारखंड ने तो लगता है कि आंख का पर्दा भी खत्म कर दिया है। यहां आंदोलन में पदों के हिसाब से रेट लिस्ट तक टंग गई है। यह आंदोलन झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा में भारी धांधली के खिलाफ शुरू हुआ था। रांची के जयपालसिंह स्टेडियम में छात्र नेता देवेन्द्रनाथ महतो ने छात्रों की मांगों के समर्थन में आमरण अनशन शुरू कर दिया है। इसे जंतर मंतर पर अनशन करने वाले सोनम वांगचुक का भी समर्थन प्राप्त है।

दरअसल, समूचे विवाद की शुरुआत 2 जुलाई की रात से हुई,  हुई, जब जेपीएससी ने परीक्षा में 103 सिविल सेवा पदों के लिए 2 हजार 204 अभ्यर्थियों के सफल होने की घोषणा की। लेकिन शुरुआती खुशी का माहौल जल्द ही विवाद में बदल गया। क्योंकि एक तो जेपीएससी ने अभ्यर्थियों को मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए केवल 17 दिन का समय दिया। और नतीजे जारी करते समय विभिन्न श्रेणियों के कट-ऑफ अंक जारी नहीं किए जबकि यह पारदर्शिता की बुनियादी शर्त है। इससे लगा कि दाल में काला है। कुछ ही हफ्तों में यह विवाद आपराधिक जांच तक पहुंच गया।


21 जुलाई को झारखंड सीआईडी ने आठ लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता के अलावा परीक्षा प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्सों की जिम्मेदारी संभालने वाली लखनऊ की कंपनी टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लि (टीडीपीएल) के निदेशक और कर्मचारी शामिल थे। हैरानी की बात यह है कि टीडीपीएल को पहले झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ब्लैकलिस्ट कर चुका था। फिर भी उसे जेपीएससी में भरती का ठेका मिला। 

परीक्षा प्रक्रिया में डिजिटल छेड़छाड़ और ओएमआर शीट में गड़बडि़यों के खुलासे के बाद जेपीएससी के अध्यक्ष एवं राज्य के पूर्व मुख्य सचिव रहे एल. खियांगते ने पद से इस्तीफा दे दिया। साथ ही राज्य सिविल सेवा मुख्य परीक्षा सहित नौ प्रतियोगी परीक्षाएं स्थगित कर दी गईं। इससे लाखों परीक्षार्थियों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। उनके पास सड़क पर उतरने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। उन्हीं दिनों दिल्ली के जंतर मंतर  पर भी पेपर लीक के खिलाफ जेन ज़ी का आंदोलन शबाब पर था।

झारखंड के आंदोलनरत छात्रों की मांग है कि जेपीएससी द्वारा आयोजित 14वीं संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा रद्द की जाए, कथित अनियमितताओं की जांच सीआईडी के बजाए  सीबीआई से कराई जाए, परीक्षा के श्रेणीवार कट-ऑफ अंक जारी किए जाएं, जेपीएससी और जेएसएससी दोनो की कार्यप्रणाली में संरचनात्मक सुधार किए जाएं, भविष्य की भर्तियों में अधिक पारदर्शिता लाई जाए और परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता से समझौता करने वाले सभी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

गौरतलब है कि झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार है, जो कांग्रेस के समर्थन से चल रही है। कांग्रेस सरकार में भी शामिल है। चूंकि यह आंदोलन विपक्ष द्वारा शासित राज्य की सरकार के खिलाफ चल रहा था, इसलिए भाजपा उसे खुलकर समर्थन दे रही है। जो ट्रोल आर्मी दिल्ली के जेन ज़ी आंदोलन को एंटी नेशनल और बदचलन युवाओं का आंदोलन बता रही थी, वही झारखंड के छात्रों के आंदोलन को सात्विक और जायज बता रही है। इसके विपरीत सोशल मीडिया की जो फौज जंतर मंतर आंदोलन के देश के युवाओं की आवाज बता रही थी, वो झारखंड के युवाओं के आंदोलन को प्रायोजित और फर्जी बताने में संकोच नहीं कर रही है।

इस पूरे मामले में राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की भूमिका टालमटोल की ज्यादा है। वो आंदोलन के प्रति संवेदनशीलता तो दिखा रहे हैं, लेकिन युवाओं की मांगों का निदान करने में हीलाहवाली कर रहे हैं। इसके पीछे डर छिपा है कि अगर आंदोलन सफल हो गया तो भाजपा इसका सेहरा अपने सिर बांधने से नहीं चूकेगी। दिलचस्प यह है कि भाजपा और उसके सहयोगी संगठन छात्रों की मांगें न मानने के लिए सीधे मुख्यमंत्री को घेरने के बजाए कांग्रेस पर हमला कर रहे हैं। क्योंकि उसे अगले चुनाव में झामुमो से समझौते की आस है। 

उधर जंतर मंतर के आंदोलनकारी छात्रों के प्रति लगातार सहानुभूति जता रही कांग्रेस के झारखंड सरकार में मंत्री इरफान अंसारी ने निर्लज्जता से कहा कि परीक्षा में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। यह सब भाजपा का खेला है। इस बयान के बाद जब कांग्रेस की ट्रोलिंग होने लगी तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इस आंदोलन के प्रति भी सहानुभूति जतानी पड़ी। उन्होंने बयान जारी कर कहा कि वो आंदोलनकारी छात्रों की बात मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से कराएंगे। हालांकि ये बात कब और कैसे होगी, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है। जबकि भाजपा लगातार सवाल कर रही है कि जेन ज़ी के प्रति जैसी हमदर्दी राहुल और कांग्रेस ने दिखाई वैसी झारखंड के छात्रों को लेकर क्यों नहीं है? इसी बीच सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी आंदोलन को समर्थन दे दिया है और कहा है कि वो जहां भी जरूरत होगी, युवाओं के हकों के लिए लड़ेंगे।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो युवा अब किसी भी सत्तारूढ़ दल की चूलें हिलाने का प्रभावी टूल बनते जा रहे हैं। क्योंकि समस्याएं हर राज्य में हैं। इसके लिए सत्ताधारी दल पर निशाना साधने के लिए युवाओं के कंधों की ताकत का अहसास राजनीतिक पार्टियों को हो गया है। अभिजीत दिपके के अघोषित मार्गदर्शक अरविंद केजरीवाल जेन ज़ी के हक में तो खूब बोले, लेकिन आप शासित पंजाब में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में गड़बडि़यों के आरोपों पर मौन हैं। करीब दस राज्यों में ऐसी ही परीक्षाओं और भर्ती में गड़बडि़यों के गंभीर आरोप हैं। लेकिन सरकारों का रवैया सिलेक्टिव है।

यहां असल मुद्दा राजनीतिक रूप से अपनी कमीज के मुकाबिल दूसरे की कमीज ज्यादा गंदी दिखाने से ज्यादा व्यवस्था और भ्रष्टाचार के गड्ढों  को भरकर पूरे परीक्षा तंत्र को एक विश्वसनीय बनाने की जरूरत है। जिसे कालीन के नीचे सरकाने की कोशिश  की जा रही है। राजनीतिक दलों में इस बात को लेकर गहरी चिंता तो है कि आज जेन ज़ी और जेन अल्फा के युवा कल के चालीस करोड़ से ज्यादा मतदाता होंगे और उनका असंतोष किसी को भी सत्ता से बेदखल करने के लिए काफी होगा। लिहाजा उन्हें कैसे साधें ताकि सत्ता की डोर भी हाथ में रहे। हालांकि इसके लिए युवा सड़कों पर ही उतरें, यह जरूरी नहीं है। तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह सत्ता परिवर्तन ईवीएम से ही हो गया। जेन ज़ी का भारत की भावी राजनीति और निर्माण में कितना महत्व है यह सरसंघचालक द्वारा मुंबई में जेन ज़ी से संवाद और उनके आंदोलनों  को जायज ठहराने से समझा जा सकता है। बावजूद इसके ट्रोल आर्मियां अभी भी निंदा अभियान में उसी शिद्दत से जुटी हैं। 

इस समूचे घटनाक्रम को जो रंग देने की जो सियासी कोशिशें हो रही हैं, उससे युवाओं को सावधान रहना होगा। ये आंदोलन युवाओं की आकांक्षाओं और जायज मांगों  को मनवाने पर केन्द्रित रहे तो बेहतर है। वरना राजनीति इसमें अपना पूरा स्पेस हथियाने की कोशिश कर रही है। सच्चाई यही है कि कोई दूध का धुला नहीं है। परीक्षा तंत्र में भ्रष्टाचार का चेहरा सभी सरकारों में लगभग एक सा ही है। यानी अगर जेपीएससी का ठेका किसी ब्लैकलिस्टेड कंपनी को मिलता है तो नीट कराने वाली एनटीए में भी ऐसी ही कंपनी अपने प्रभाव के जरिए ठेका हासिल कर लेती है। कहीं सांपनाथ है तो कहीं नागनाथ। युवाओं का अपने हकों की खातिर मुखर होना स्वस्थ लोकतंत्र की जमानत है। यही उनकी ताकत भी है। इतनी सावधानी जरूरी है कि उनकी यह ताकत किसी की राजनीतिक स्वार्थ सिद्धी का टूल बनकर न रह जाए।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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