{"_id":"6a75affdd1a86ac0280d8d11","slug":"deo-ki-diary-political-satir-social-media-like-share-and-thumb-2026-08-07","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"देव की डायरी: ‘लाइक, शेयर और सब्सक्राइब’ के इस काल में अंगूठे की महिमा अपरंपार","category":{"title":"Blog","title_hn":"अभिमत","slug":"blog"}}
देव की डायरी: ‘लाइक, शेयर और सब्सक्राइब’ के इस काल में अंगूठे की महिमा अपरंपार
सार
भारतीय संस्कृति में अंगूठे का बड़ा सम्मान रहा है। इतिहास गवाह है कि जिसने समय पर अंगूठे का महत्व नहीं समझा, वह या तो अंगूठाछाप कहलाया या एकलव्य हो गया। पहले आदमी दस्तावेज पर अंगूठा लगाता था, तो लोग कहते थे कि इसे कोई अंगूठे पर नचा रहा है। आज वह हर तीसरे वीडियो पर अंगूठा लगा रहा है और खुश है कि वह अपनी मर्जी से नाच रहा है। पहले लोग काम के वक्त अंगूठा दिखा देते थे या चिढ़ाने के लिए अंगूठा नचाते थे।
अब सहमति जताने के लिए भी अंगूठा दिखाते हैं। दुनिया का शायद यही एक अंग है जो विरोध, समर्थन, चापलूसी और ठगी, सबका ठेका अकेले निभा रहा है। ‘लाइक, शेयर और सब्सक्राइब’ के इस महान काल में अंगूठे की महिमा अपरंपार है।
विज्ञापन
सोशल मीडिया के दौर में अंगूठे की कीमत
- फोटो : Amarujala.com/AI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारतीय भाषाओं का सबसे लोकप्रिय वाक्य कौन-सा है, इस पर अभी तक कोई अंतिम बहस नहीं हुई। लेकिन इस डिजिटल युग ने अपना फैसला बहुत पहले सुना दिया है। आज देश का सबसे ज्यादा बोला जाने वाला वाक्य शायद यही है- "वीडियो पसंद आया हो तो लाइक करें, शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करना न भूलें।" और यहीं से शुरू होती है अंगूठादान की कहानी।
विज्ञापन
वैसे तो अपने देश में मांगने की परंपरा बहुत पुरानी है। पुरोहित दक्षिणा मांगते थे, संत भिक्षा, नेता वोट, दुकानदार उधार का पैसा और रिश्तेदार शादी का कार्ड। डिजिटल युग ने इस सूची में बस एक नया पात्र जोड़ दिया है। वह हाथ जोड़कर कहता है-"बस दो सेकंड का काम है... चैनल सब्सक्राइब कर दीजिए।"
विज्ञापन
मुझे इस ‘बस’ शब्द से हमेशा डर लगता है। दुनिया के सबसे कठिन काम अक्सर इसी से शुरू होते हैं-’बस, पांच मिनट।’’बस, एक सिग्नेचर।’ ‘बस एक ओटीपी।’ और अब-’बस, एक सब्सक्राइब।’ सब्सक्राइब की इस गुहार में दान का भाव छिपा है।
विज्ञापन
डिजिटल युग में अंगूठादान
भारतीय संस्कृति में दान के अनेक प्रकार बताए गए हैं। अन्नदान भूख मिटाता है। जलदान प्यास बुझाता है। विद्यादान अज्ञान दूर करता है। भूमिदान किसी को आसरा देता है। देहदान मृत्यु के बाद भी जीवन देता है। लेकिन डिजिटल युग ने इन सबके बीच एक नया दान खोज निकाला है-अंगूठादान। यह बड़ा विलक्षण दान है। इसमें न दाता का कुछ घटता है, न पाने वाले का कभी भरता है। जितना मिलता है, उतनी ही भूख बढ़ती जाती है।
एक लाख सब्सक्राइबर के बाद दस लाख चाहिए, दस लाख के बाद एक करोड़। यह संसार शायद ऐसा है, जहां संतोष का एल्गोरिदम अभी तक किसी ने नहीं बनाया। महाभारत में एकलव्य ने अपना अंगूठा काटकर गुरु को दे दिया था। आज का एकलव्य अंगूठा नहीं काटता, दिन भर स्क्रीन पर रगड़ता रहता है। गुरु भी बदल गए हैं। अब वे धनुर्विद्या नहीं सिखाते। वे बताते हैं कि थंबनेल पर लाल तीर कहां लगाना है?
वैसे देखें तो अंगूठे का भारतीय इतिहास बड़ा गौरवशाली रहा है। कभी इसी से राजाओं की मुहर लगती थी। अनपढ़ आदमी इसी से अपनी पहचान देता था। चुनाव में यही अंगूठा लोकतंत्र की स्याही पहनकर लौटता था। आज वही अंगूठा सुबह से रात तक लाइक, शेयर और सब्सक्राइब के राष्ट्रीय अभियान में लगा रहता है। इस अंगूठादान का फल भी तत्काल मिलता है। इधर आपने अंगूठा दबाया, उधर सामने वाले ने मुस्कराकर कहा- "थैंक्यू फॉर योर सपोर्ट।"
मुझे डर है कि यदि यह परंपरा इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो अगली पीढ़ी इतिहास की किताब में पढ़ेगी कि भारतीय संस्कृति में दान के छह प्रकार थे-अन्नदान, जलदान, विद्यादान, भूमिदान, देहदान और सबसे लोकप्रिय अंगूठादान। बाकी पांच दानों में त्याग चाहिए था। छठे दान में सिर्फ नेटवर्क।
अब आदमी दो जगह सबसे ज्यादा विनम्र होता है। पहली बार जब बैंक से कर्ज मांगता है। दूसरी बार जब सब्सक्राइब मांगता है। बाकी समय वही आदमी ऐसा आत्मविश्वास लेकर घूमता है कि बड़े-बड़े ज्ञानी भी अपने ज्ञान पर संदेह करने लगें। सब्सक्राइबर प्रसिद्धि देते हैं और प्रसिद्धि भी अब बेहद लोकतांत्रिक हो गई है। पहले प्रसिद्ध होने के लिए तप करना पड़ता था, किताब लिखनी पड़ती थी, युद्ध जीतना पड़ता था या कोई असाधारण काम करना पड़ता था। अब प्रसिद्धि की पूरी दुनिया विनती पर टिकी हुई है।
कोई किसी को धमकाकर सब्सक्राइब नहीं कराता। सब हाथ जोड़कर कहते हैं- "सपोर्ट कर दीजिए... मोटिवेशन मिलता है।" भारतीय शिष्टाचार की नई किताब शायद यही कहेगी-"किसी के घर जाइए, पानी पीजिए, हालचाल पूछिए और लौटते समय उनका चैनल सब्सक्राइब करना मत भूलिए।"
कभी-कभी सोचता हूं, अगर कालिदास आज होते तो शायद 'मेघदूत' के अंत में लिखते-"यदि यह काव्य पसंद आया हो तो यक्ष के चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब अवश्य करें।" इतिहासकारों को भी शायद हमारे समय का परिचय कुछ इस तरह लिखना होगा-"यह वह सभ्यता थी जहां लोग पहले खाना खाते थे, फिर उसकी तस्वीर लेते थे और अंत में उसे लाइक करते थे।"
लाइक्स का दौर
लाइक के इस दौर में प्रेम पत्र लिखने की भी खास जरूरत नहीं रही। बस इतना लिख दीजिए—"लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करना मत भूलिए।" सामने वाला समझ जाएगा कि संबंध अभी जीवित है। कभी सबसे आत्मीय वाक्य था-"खाना खाकर जाना।" फिर आया-"घर पहुंचकर खबर देना।" अब हम सब ने इन सबको हटाकर सिंहासन पर बैठा दिया है-"वीडियो पसंद आए तो चैनल जरूर सब्सक्राइब करें।"
यही नहीं, आशीर्वाद भी समय के साथ अपडेट हो गया है। पहले बुजुर्ग कहते थे-"यशस्वी भव।" अब मन करता है कहें-"एक मिलियन सब्सक्राइबर भव।"
आदमी की पहचान उसके काम से कम, उसके फॉलोअर्स से ज्यादा होती है। पांच लाख लोग आपके पीछे चल रहे हों तो आप विचारक भी माने जाते हैं, कलाकार भी, अर्थशास्त्री भी और कभी-कभी चिकित्सक भी।
दो दिन पहले एक पुराने मित्र मिले। बरसों तक अध्यापक रहे। बोले, "अब समाज सेवा करता हूं।" मैंने पूछा, "कैसी समाज सेवा?"
कहने लगे, "जिसकी भी पोस्ट दिखती है, लाइक कर देता हूं।" मैंने कहा, "यह तो बड़ा पुण्य का काम है।" वे गर्व से बोले, "सिर्फ लाइक नहीं, कभी-कभी शेयर भी कर देता हूं।" मुझे लगा, महर्षि दधीचि ने हड्डियां दी थीं, उन्होंने अंगूठा दे दिया। इतिहास दोनों को अपने-अपने संदर्भ में याद रखेगा।
साहित्य भी अंगूठे की चाल से मापा जाने लगा है। कविता कितनी अच्छी है, यह पाठक नहीं बताता; मोबाइल बताता है। कहानी का कथानक कमजोर हो सकता है, भाषा लड़खड़ा सकती है, लेकिन यदि शीर्षक में ‘चौंकाने वाला’, ‘यकीन नहीं होगा’ और "देखिए" जैसे शब्द मौजूद हैं तो सफलता की संभावना स्वतः बढ़ जाती है। राजनीति भी इस अंगूठादान से अछूती नहीं रही।
पहले कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर नारे लगाते थे। अब संदेश आगे बढ़ा देते हैं और मान लेते हैं कि लोकतंत्र का पहिया उनके अंगूठे से घूम रहा है। सबसे दिलचस्प दृश्य तब होता है जब कोई घोषणा करता है-"मैं सोशल मीडिया से दूर रहता हूं।" इतना कहकर वह जेब से मोबाइल निकालता है और यह देखने लगता है कि उसकी इस घोषणा पर कितने लाइक्स आए।
अस्तित्व का अर्थ है, दिखते रहना
मैंने एक दिन निश्चय किया कि आज किसी पोस्ट को लाइक नहीं करूंगा। दस मिनट बाद बेचैनी होने लगी। पंद्रह मिनट बाद लगा, लोग कहीं मुझे असामाजिक न समझ लें। आधे घंटे बाद मैंने एक सज्जन की चाय की तस्वीर पर दिल लगा दिया। मन को ऐसी शांति मिली जैसे किसी उपवासी को पहला कौर मिला हो। डॉक्टर इसे जो भी नाम दें, मुझे तो यह अंगूठे की खुजली ही लगती है।
हमारे एक रिश्तेदार हैं। हर सुबह दो सौ लोगों को ‘सुप्रभात’ भेजते हैं। फूल रोज बदलते हैं, सूरज वही रहता है। मैंने पूछा, "इतने लोगों को जानते भी हैं?" बोले, "जानना जरूरी नहीं, इनबॉक्स में दिखना जरूरी है।" उस दिन लगा कि आधुनिक दर्शन की सबसे छोटी और सबसे सटीक परिभाषा मुझे मिल गई। अब अस्तित्व का अर्थ है, दिखते रहना। चाहे विचार न दिखे, आदमी दिखना चाहिए।
सच तो यह है कि अब हम बातचीत भी अंगूठे की सुविधा के अनुसार करने लगे हैं। कभी-कभी लगता है कि आदमी के भीतर एक छोटा-सा डाकिया रहता है, जिसे हर बात आगे पहुंचाने की जल्दी है। गांव-जवार का पारंपरिक डाकिया कम से कम पोस्टकार्ड को बिना पढ़े उसके गंतव्य तक नहीं पहुंचाता था। यह उसकी पेशागत कमजोरी थी या लोक संस्कृति का हिस्सा, कहना मुश्किल है। लेकिन हमने डाकिए की वह आदत भी पीछे छोड़ दी। हम तो संदेश पढ़ते भी नहीं, समझते भी नहीं। बस आगे बढ़ा देते हैं।
किसी ने खाना बनाय-शेयर। किसी ने कविता लिखी-शेयर। किसी ने छींक दी-शेयर। किसी ने कुछ नहीं किया-वह भी शेयर। जानकारी से ज्यादा उसकी आवाजाही महत्वपूर्ण हो गई है। सत्य बाद में चलता है, फॉरवर्ड पहले पहुंच जाता है।
अंगूठादान के एक दिग्गज मित्र से मैंने पूछा, "तुम यह सब पढ़ते भी हो?" वह बोला, "इतना समय किसके पास है? पढ़ने लगूं तो लाइक कब करूंगा?"
उसका उत्तर सुनकर मुझे शिक्षा व्यवस्था की चिंता नहीं हुई। मुझे पढ़ने की परिभाषा की चिंता हुई। अब पढ़ना वह क्रिया नहीं रही, जिसमें आंखें शब्दों पर टिकती हैं। पढ़ना वह है, जिसमें अंगूठा दो सेकंड के लिए रुक जाए। हमने विचारों की गति नहीं बढ़ाई है। हमने सिर्फ अंगूठे की गति बढ़ाई है। विचार अभी भी पैदल चलते हैं।
अंगूठा बुलेट ट्रेन से दौड़ रहा है। इसीलिए आजकल किसी काम में हाथ बंटाने की जगह अब पोस्ट के नीचे अंगूठा लगाया जाता है। आदमी को लगता है कि उसने अपना सामाजिक और नागरिक कर्तव्य निभा दिया। गांव में रहने वाले एक मित्र से बाढ़ पर बात हो रही थी। मैंने पूछा, "बाढ़ पीड़ितों के लिए कुछ किया?" वह बोला, "तीन पोस्ट शेयर की हैं।"
मैंने फिर पूछा, "पानी उतर गया?" वह मुस्कराया, "नहीं... लेकिन मेरी जिम्मेदारी उतर गई।"
यहीं आकर मुझे अंगूठादान का असली मर्म समझ में आया। यह ऐसा दान है जिसमें त्याग नहीं, तसल्ली मिलती है। हम मदद कम करते हैं, मदद करने का अहसास ज्यादा जुटाते हैं। दुख पर दुखी होने का इमोजी भेजकर मान लेते हैं कि दुख का कुछ हिस्सा हमने भी उठा लिया। सेवा का सबसे विश्वसनीय हिस्सा अब सेवा नहीं, उसका फुटेज है।
अब धीरे-धीरे मुझे अपने अंगूठे से शिकायत रहनी बंद हो गई है। बेचारा वही कर रहा है जो मैंने उसे सिखाया है। असली परेशानी अंगूठे में नहीं, उस दिमाग में है, जिसने सोचने का ठेका एल्गोरिदम को दे दिया है। मुझे मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से उतना डर नहीं लगता, जितना इस बात से लगता है कि हम अपना विवेक 'ऑटो अपडेट' पर डालकर निश्चिंत बैठे हैं। शायद भविष्य का इतिहासकार हमारे समय के बारे में लिखते हुए एक वाक्य यह भी जोड़े-"यह वह सभ्यता थी, जिसने मनुष्य के मस्तिष्क से ज्यादा उसके अंगूठे पर भरोसा किया।" बात बस इतनी सी थी, और अगर आपको पसंद आया हो तो आगे का वाक्य मुझे बोलने की शायद जरूरत नहीं है।
-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।