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मेटा का माफीनामाः संयोग, प्रयोग या कुछ और?

Fri, 07 Aug 2026 02:15 PM IST
Hari Verma हरि वर्मा
Updated Fri, 07 Aug 2026 02:15 PM IST
सार

जेन जी आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवाओं से अपील वाले वीडियो संदेश को हटाने के मामले में मेटा ने माफी मांग ली है। माना कि पैसे और पेड प्रमोशन के चलते यह चूक हुई। माफीनामा से अब कई सवाल उपजे हैं। क्या मोदी का वीडियो संदेश हटाया जाना कोई संयोग है या प्रयोग।

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Meta apologisesfor restricting PM narendra Modi post what it means
मेटा ने पीएम मोदी का वीडियो हटाने पर मानी गलती - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जेन जी आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवाओं से अपील वाले वीडियो संदेश को हटाने के मामले में मेटा ने माफी मांग ली है। माना कि पैसे और पेड प्रमोशन के चलते यह चूक हुई। माफीनामा से अब कई सवाल उपजे हैं। क्या मोदी का वीडियो संदेश हटाया जाना कोई संयोग है या प्रयोग? क्या यह भारत की अनदेखी का हिस्सा है या कोई साजिश। दरअसल, ऐसा विवाद पहली बार नहीं हुआ है।

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अब जरा याद करें 2021 का किसान आंदोलन। आंदोलनकारियों में शामिल कुछ उपद्रवी तत्वों ने लाल किले पर उत्पात मचाया।  देश उबल रहा था, तभी स्वीडन की पर्यावरणविद ग्रेटा थनवर्ग ने 3 फरवरी 2021 को सोशल मीडिया पर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में  टूलकिट ट्वीट कर दिया। इस पर बखेरा खड़ा हुआ।
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अंतर्राष्ट्रीय साजिश के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने राजद्रोह की धाराओं में थनवर्ग पर एफआईआर दर्ज की। सरकार की ओर से सोशल मीडिया पर ऐसे टूलकिट को लेकर कंपनी के सामने पुरजोर आपत्ति जताई गई। तब यह साफ हो गया था कि यह भारत के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय साजिश वाला एक प्रयोग था, कोई संयोग नहीं।
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अब याद करें जेन जी आंदोलन को। पिछले महीने फिर अंदर ही अंदर चिंगारी भड़क रही थी।हालात को देखते हुए इस माहौल को शांत करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने आंदोलनकारी युवाओं के नाम अपील वाला एक वीडियो संदेश सोशल मीडिया पर डाला। मेटा ने इसे हटा दिया। यह महज संयोग था या प्रयोग। अब मेटा के माफीनामा से इसकी कलई खुल रही है।

मेटा ने मान लिया है कि मोटी रकम और पेड प्रमोशन के तहत ऐसा हुआ। क्या यह भी किसान आंदोलन की तरह माहौल बिगाड़ने की कोई और साजिश थी। तब किसानों ने लाल किले पर कूच किया था और अब जेन जी संसद कूच करने का एलान कर चुके थे। सोशल मीडिया पर देश के खिलाफ रची जा रही इस साजिश को देखते हुए सरकार अब इस मुद्दे पर तह तक जाने के लिए तहकीकात में जुटी है। मेटा के अधिकारियों से लगातार बातचीत का सिलसिला जारी है।

सरकार ने जताया एतराज

सरकार की ओर से तीन दिनों की मोहलत दी गई थी, लेकिन मेटा ने आनन-फानन में पहले ही दिन माफी मांग ली। सरकार ने मेटा के मध्यस्थ के दर्जे पर एतराज जताते हुए जानना चाहा कि क्या कंपनी भारत के कानून का पालन कर रही है। यदि कानून का पालन करती तो देश के प्रधानमत्री का शांति संदेश ही देश में सोशल मीडिया के प्लेटफार्म से गायब नहीं हो जाता। हालांकि इससे पहले भी सोशल मीडिया कंपनियों को सरकार की ओर से चेतावनी दी जा चुकी है कि देश में उन्हें भारत का कानून मानना ही होगा।

सवाल यह उठता है कि ग्रेटा थनवर्ग जिन पर राजद्रोह की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई, उनका टूलकिट हटाने में सोशल मीडिया ने सरकार के एतराज के बाद भी अरसे तक उसे जारी रखा, जबकि जेन जी आंदोलन के दौरान उबलते माहौल के बीच देश के प्रधानमंत्री के अपील संदेश पर ही ब्रेक लगाने में तनिक भी देर नहीं की। क्या यह महज चूक थी या कोई और साजिश।

इस विवाद के साथ-साथ बच्चों के यौन शोषण व अश्लीलता के मामलों को लेकर भी सोशल मीडिया खासकर मेटा कटघरे में है। और यह कोई पहला मौका नहीं है। 2025 में भी सोशल मीडिया पर बच्चों के अश्लील वीडियो परोसे जाने को लेकर सरकार की ओर से आपत्ति जताई गई थी। तब भी यह बहस और विवाद का मुद्दा बना लेकिन हालात नहीं बदले।

सोशल मीडिया की इस मनमानी को देखते हुए सरकार ने 2021 के आईटी नियम में 20 फरवरी 2026 में बदलाव किया। संशोधित नियम के तहत सोशल मीडिया प्लेटफार्म से 36 घंटे के बजाय 3 घंटे के भीतर आपत्तिजनक व अश्लील पोस्ट हटाने का प्रावधान किया गया। बाल यौन शोषण और निजी आपित्तजनक पोस्ट हटाने के लिए महज 2 घंटे की मोहलत दी गई।

विवादित पोस्ट हटाने का अधिकार संयुक्त सचिव या डीआईजी स्तर के अधिकारियों को सौंपा गया। भारत में सोशल मीडिया कंपनियों को शिकायत अधिकारी तैनात करना अनिवार्य किया गया। डीपफेक, कृत्रिम जनरेटेड, सिथेंटिक या एआई  तैयार आपत्तिजनक पोस्ट अदालत या सरकार के हस्तक्षेप पर हटाने की व्यवस्था की गई। यूजर्स के निजता की शिकायत पर भी पोस्ट हटाने की व्यवस्था की गई।

निजता के अधिकार को संरक्षित किया गया। सरकार की सख्ती पर सोशल मीडिया कंपनी ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और उसे मुंह की खानी पड़ी। तब देश में लोकतंत्र में आवाज दबाने को लेकर कुछ खास वर्ग की चिल्ल-पौं से वैचारिक बहस छिड़ गई लेकिन बच्चों के अश्लील वीडियो परोसे जाने को लेकर हालात अब भी नहीं सुधरे।

बच्चों-किशोरों को सोशल मीडिया से दूर रखने की पहल

यही कारण है कि इस खतरे को दुनिया में सबसे पहले आस्ट्रेलिया ने पहचाना। वहां 16 साल के किशोरों के लिए सोशल मीडिया पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। दीगर बात है कि इस प्रतिबंध के बावजूद वहां पहचान छिपाकर या फोटो बदल कर हजारों किशोरों ने फिर से सोशल मीडिया के एकाउंट बना लिए। आस्ट्रेलिया की राह पर इंडोनेशिया, फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन और डेनमार्क भी है। इन देशों में भी अलग-अलग उम्र के बालकों, किशोरों को सोशल मीडिया से दूरी बनाने की कोशिश की जा रही है।

सोशल मीडिया का ताजा खतरा भारत के लिए भी चिंताजनक और चुनौतीपूर्ण है। चीन के बाद भारत में सर्वाधिक 56 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हैं। इनमें युवाओं-महिलाओं की अच्छी खासी संख्या है।

अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफार्म यानी व्हाट्सएप पर करीब 56 करोड़, यू-ट्यूब पर करीब 50 करोड़, इंस्टाग्राम पर 48 करोड़, फेसबुक पर 40 करोड़, स्नैपचेट पर 21 करोड़ और एक्स पर 2 करोड़ से अधिक यूजर्स हैं। आर्थिक सर्वे के मुताबिक, यूजर्स में युवाओं की संख्या ज्यादा है। 18 करोड़ नाबालिग यूजर्स हैं। 18 से 34 साल के आयुवर्ग के करीब 44 फीसदी यूजर्स हैं। इंस्टाग्राम पर 18 से 24 आयु वर्ग के 64 फीसदी युवा हैं। सोशल मीडिया पर किशोरों-युवाओं, महिलाओं की तादाद ज्यादा है।

ऐसे में इन मंचों पर परोसे जाने वाली अश्लील सामग्री चिंता का सबब है। चुनौती भी। ताजा घटना से सोशल मीडिया कंपनियों की अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता और डिजिटल संप्रभुता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सरकार ने मेटा की वैश्विक टीम को दो टूक कह दिया है कि मध्यस्थ की भूमिका मंजूर नहीं। फेक, अश्लील कंटेट, हिंसा को उकसाने और राष्ट्रविरोधी पोस्ट के लिए सोशल मीडिया कंपनी महज डाकिया की भूमिका नहीं अदा कर सकती। स्वचालित एल्गोरिदम को आधार बनाकर मुनासिब बताना वाजिब नहीं। कंटेट के लिए कंपनियों को भी जिम्मेदार होना पड़ेगा।

हालांकि तमाम खतरे के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने खुद पार्टी नेताओं से अपनी सक्रियता इंस्टाग्राम पर बढ़ाने की अपील की  है ताकि अधिक से अधिक युवाओं तक पहुंच बनाई जा सके। जेन जी के जमाने में सोशल मीडिया खास मंच साबित हुआ है। अब तो यह आंदोलन का हथियार भी बनता जा रहा है। यूपी के कानपुर के एक स्कूल के जेन अल्फा ने पंखा-बिजली के लिए सोशल मीडिया के सहारे अपनी मांग मनाने का दबाव बनाया। यहां तक कि विदेश मंत्रालय ने भी स्नैपचेट के जरिये जेन जी तक पहुंच बनाने की पहल की है। देखादेखी कॉकरोच जनता पार्टी ने अगले महीने से सोशल मीडिया पर देशव्यापी मुहिम चलाने की घोषणा की है तो नेता विपक्ष राहुल गांधी खुद आस्क एनी थिंग के जरिये जुड़ने वाले हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिये युवा मानस पर छाप छोड़ने की होड़ छिड़ गई है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जेन जी और जेन अल्फा से संवाद किया, तो उन्होंने भी विरोध को बातचीत का जरिया और आम सहमति तक पहुंचने का तरीका बताया। हालांकि, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का मानना है कि सोशल मीडिया पर सबकुछ सच नहीं परोसा जाता है और हद यह सच भी है।

ऐसे में सोशल मीडिया से जवाबदेही की उम्मीद की जा सकती है लेकिन जब सोशल मीडिया प्लेटफार्म ही देशद्रोह और देशप्रेम के वीडियो में फर्क मोटी रकम और पेड प्रमोशनल के जरिये तय करने लगे, तो ऐसी चूक या पुनरावृत्ति की गुंजाइश बनी रह जाती है। सोशल मीडिया पर आज  विश्वसनीयता के साथ-साथ बड़ा संकट अश्लीलता को लेकर भी है। ताजा विवाद के बाद सरकार ने जब सोशल मीडिया कंपनियों पर नकेल डाली है तो उम्मीद की जानी चाहिए है कि भविष्य में फिर किसी किसान आंदोलन या जेन जी आंदोलन की तरह चिंगारी सुलगाने में सोशल मीडिया प्लेटफार्म हथियार न बऐ।

यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि महज कमाई (मोटी रकम) की खातिर भविष्य में सामाजिक तानाबाना न बिगड़े। सोशल मीडिया को जवाबदेह होना होगा, सरकार को सख्ती बरतनी होगी और यूजर्स को आत्मसंयम व अनुशासन पर ध्यान देना होगा, तभी हम तकनीक के सहारे विकास की राह पर अग्रसर रह पाएंगे।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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