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खुद को जानने का वक्त: वृद्धावस्था नहीं, आत्मिक परिपक्वता का समय है जीवन का संध्याकाल

Fri, 07 Aug 2026 06:56 AM IST
Devesh Tripathi जीन-जैक्स रूसो
जीन-जैक्स रूसो Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 07 Aug 2026 06:56 AM IST
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सार
वृद्धावस्था जीवन का वह पड़ाव है, जहां सभी अशांत भावनाएं शांत हो जाती हैं। जैसे सांझ के सूरज की किरणें अधिक कोमल व सुखद हो जाती हैं, वैसे ही ढलती उम्र की चेतना में एक गहरी शांति और करुणा घुल जाती है।
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वृद्धावस्था - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

जीवन के इस संध्याकाल में, जब मेरी अवस्था साठ वर्ष को पार कर चुकी है और दुनिया के कोलाहल से मैं दूर हो चुका हूं, मुझे एहसास होता है कि उम्र का बढ़ना कोई क्षति नहीं, बल्कि आत्मा का  पुनर्जन्म है। जब मैंने अपनी पुस्तक रेवेरीज ऑफ द सोलिटरी वॉकर की रचना शुरू की, तब मेरा उद्देश्य किसी जगत-कल्याण या दार्शनिक बहस का हिस्सा बनना नहीं था; मैं तो केवल अपने भीतर के उस शांत समंदर को खंगालना चाहता था, जो जवानी के उफनते ज्वार के शांत होने के बाद मुझे प्राप्त हुआ है।


जवानी के दिनों में हम महत्वाकांक्षाओं, सामाजिक प्रतिष्ठा और दूसरों के निर्णय के गुलाम बने रहते हैं। पर, ढलती उम्र इन्सान को उसकी मूल प्रकृति की ओर वापस मोड़ देती है। जैसे-जैसे शरीर शिथिल होता है, मन सांसारिक लालसाओं के बोझ से मुक्त होने लगता है। अब मुझे इसकी कोई परवाह नहीं कि समाज मेरे बारे में क्या सोचता है। अब मैं केवल इस बात का साक्षी हूं कि मैं भीतर से क्या महसूस करता हूं। उम्र बढ़ने के साथ जो सबसे सुंदर बदलाव आता है, वह है समय के साथ हमारी एकात्मता। जब मैं प्रकृति की गोद में, किसी झील के किनारे या नीरव जंगलों में टहलता हूं, तो मुझे लगता है कि समय ठहर गया है। मेरे लिए अतीत की स्मृतियांं और भविष्य की चिंताएं, दोनों बेमानी हो जाती हैं। मैं केवल ‘वर्तमान क्षण’ की अनुभूति में जीता हूं।


मेरे दृष्टिकोण में, यदि आपने प्रकृति के नियमों का सम्मान किया है, तो वृद्धावस्था जीवन का वह पड़ाव है, जहां सभी अशांत भावनाएं शांत हो जाती हैं। जैसे शाम के समय सूरज की किरणें अधिक कोमल और सुखद हो जाती हैं, वैसे ही ढलती उम्र की चेतना में एक गहरी शांति और करुणा घुल जाती है।

मैं मानता हूं कि इन्सान की उम्र केवल उसके शरीर के वर्षों से नहीं, बल्कि उसकी आत्मा की स्वतंत्रता से मापी जानी चाहिए। यदि हम उम्र के साथ अपनी लालसाओं पर विजय पा लें और प्रकृति के शाश्वत प्रवाह को स्वीकार कर लें, तो जीवन का अंतिम अध्याय ही सबसे अधिक संतुष्टिदायक और सत्य के सबसे करीब होता है।
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