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बुजुर्गों के चेहरे पर लौट रही मुस्कान: युवाओं की पहल से मिल रहा अपनापन; सामाजिक इंटर्नशिप क्यों बन रही मिसाल?
Fri, 07 Aug 2026 06:59 AM IST
शिवम गर्ग
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शिवम गर्ग
Updated Fri, 07 Aug 2026 06:59 AM IST
सार
वृद्धाश्रम में अगर युवा कुछ घंटे बुजुर्गों के साथ बिताएं, तो यह दोनों पीढ़ियों के लिए सीख और खुशियों का कारण बन सकता है।
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बुजुर्ग के चेहरे पर मुस्कान
- फोटो : Freepik.com
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विस्तार
वृद्धाश्रम केवल एक आश्रय स्थल नहीं, बल्कि उन असंख्य बुजुर्गों की विवशता का प्रतीक है, जिन्हें जीवन की सांध्य बेला में अपने ही परिवार से दूरी का दर्द सहना पड़ता है। कल्पना कीजिए कि जब बच्चे अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेजने की बात करते होंगे, तो शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त हो रहे माता-पिता के ऊपर क्या बीतती होगी? वृद्धाश्रमों में रहने वाले बुजुर्गों को भोजन, दवा और रहने की सुविधा तो मिल जाती है, पर क्या उन्हें अपने बच्चों जैसा अपनापन और प्यार मिल पाता है? शायद नहीं!
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परिवार से बिछड़ चुके और उपेक्षित बुजुर्गों को खुशहाल, सम्मानजनक और सामाजिक रूप से सक्रिय जीवन देने के उद्देश्य से जम्मू के अम्फल्ला स्थित वृद्धाश्रम में एक सराहनीय पहल शुरू की गई है। इसका मकसद सार्थक संवाद, सहभागिता और अपनत्व के माहौल के जरिये उनके अकेलेपन को कम करना तथा परिवार और समाज से जुड़ाव की भावना को फिर से मजबूत करना है। यहां विभिन्न सामाजिक संगठनों और शैक्षणिक संस्थाओं के सहयोग से एक कार्यक्रम संचालित किया जाता है, जिसे बाकायदा ‘सामाजिक इंटर्नशिप’ का नाम दिया है। इस आश्रम का नाम है ‘होम फॉर द एजेड एंड इनफर्म’, यानी वृद्ध और मानसिक एवं शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के लिए आश्रय स्थल। इसका ध्येय वाक्य है, ‘स्क्रीन टाइम-सेवा टाइम’, यानी अपने मोबाइल के रील समय को सेवा समय में तब्दील करें।
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दस दिन की लघुकालिक इंटर्नशिप करने वाले विद्यार्थी न केवल इन बुजुर्गों का मनोबल बढ़ाते हैं, बल्कि उन्हें अपने बच्चों के साथ होने जैसा भी महसूस कराते हैं। इस पहल के अंतर्गत विद्यार्थी नियमित रूप से आश्रम जाकर वृद्धजनों के साथ समय व्यतीत करते हैं। उन्हें देश-दुनिया की ताजा खबरों से अवगत कराने के साथ मनोरंजक गतिविधियों व सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि के जरिये उन्हें जीने का उद्देश्य प्रदान करते हैं। इसके अलावा, बेहतर शारीरिक स्वास्थ्य के लिए योग व ध्यान भी करवाते हैं।
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इन कोशिशों से बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान लौटती है और उन्हें महसूस होता है कि वे अपने बच्चे के साथ हैं। वहीं, विद्यार्थियों को बुजुर्गों के अनुभवों, संघर्षों व संस्कारों से सीखने, जमीनी स्तर की सेवा तथा राष्ट्र निर्माण में अहम योगदान देने का अमूल्य अवसर प्राप्त होता है। इससे बुजुर्गों का आत्मबल तो बढ़ता ही है, साथ ही बच्चों में करुणा, धैर्य, कृतज्ञता, संवेदनशीलता और बड़ों के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है। उनकी सहभागिता से आश्रम का वातावरण अधिक आत्मीय, आनंदमय और परिवार जैसा बनता है। बुजुर्ग भी सुबह से ही बच्चों की बाट जोहने लगते हैं।
यह पहल स्पष्ट करती है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री या प्रमाण-पत्र प्राप्त करना नहीं, बल्कि संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक तैयार करना भी है। करुणा, धैर्य, कृतज्ञता और बड़ों के प्रति सम्मान जैसे गुण पुस्तकों से नहीं, बल्कि ऐसे अनुभवों से विकसित होते हैं। आज अनेक प्रतिष्ठित संस्थाएं भी ऐसे युवाओं को प्राथमिकता देती हैं, जिनमें नैतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना हो। -रवि शंकर शर्मा