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मोहन भागवत का 'जेन-जी' से संवाद: अतीत के गौरव में सिमटने के बजाय भविष्य की ओर देख रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

Fri, 07 Aug 2026 01:07 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Fri, 07 Aug 2026 01:07 PM IST
सार

संवाद के दौरान संघ प्रमुख का यह कहना, "यदि किसी पर आंख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है तो वह जेन जी है", युवाओं के साथ विश्वास का सेतु निर्माण करने की दिशा में उठाया गया कदम है। वर्ष 1925 में अपनी स्थापना से लेकर अब तक संघ ने कई पीढ़ीगत बदलाव देखे हैं।

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Mohan Bhagwat RSS is looking towards the future instead of remaining confined to the glory of the past
मोहन भागवत, सरसंघचालक, आरएसएस - फोटो : पीटीआई

विस्तार

मुंबई में 'इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस' के सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और 'जेन जी' व 'जेन अल्फा' के युवाओं के बीच हुआ सीधा संवाद भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

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हालिया छात्र असंतोष और प्रतियोगी परीक्षाओं में अव्यवस्था की पृष्ठभूमि में आयोजित यह कार्यक्रम केवल सवाल-जवाब तक सीमित नहीं था। यह संवाद संघ के 100 वर्षों के इतिहास में समय के साथ खुद को ढालने और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझने की संगठनात्मक प्रक्रिया को रेखांकित करता है।
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दरअसल, आज का युवा इंटरनेट, सोशल मीडिया और तुरंत प्राप्त होने वाली सूचनाओं के दौर में पला-बढ़ा है। वह परंपरा का सम्मान करता है, लेकिन किसी भी विचार को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करता कि वह किसी बड़े पद या संगठन से आया है। वह तर्क, पारदर्शिता और त्वरित समाधान चाहता है।
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हाल के समय में शिक्षा के व्यावसायीकरण, पेपर लीक और रोजगार के अवसरों की कमी ने युवाओं में एक प्रकार की निराशा और आक्रोश पैदा किया है। ऐसे माहौल में संघ प्रमुख का आगे बढ़कर युवाओं से सीधा संवाद करना दर्शाता है कि संघ ने नई पीढ़ी से दूरी बनाने के बजाय आमने-सामने बैठकर उनकी बात सुनना आवश्यक माना है।

संवाद के दौरान संघ प्रमुख का यह कहना, "यदि किसी पर आंख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है तो वह जेन जी है", युवाओं के साथ विश्वास का सेतु निर्माण करने की दिशा में उठाया गया कदम है। वर्ष 1925 में अपनी स्थापना से लेकर अब तक संघ ने कई पीढ़ीगत बदलाव देखे हैं। यह पहल दर्शाती है कि संघ अपने मूल विचारों को बनाए रखते हुए संवाद शैली में बदलाव करने की लोचशीलता रखता है।

संवाद में संघ प्रमुख ने जिन संवेदनशील मुद्दों पर संघ का रुख स्पष्ट किया, वे युवाओं को आकर्षित करने और संघ के आधुनिक दृष्टिकोण को सामने रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे, संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में अपनी जायज मांगों को लेकर विरोध या आंदोलन करना नागरिक का अधिकार है। यह संवाद का ही एक रूप है।

आंदोलन करने वाले हर युवा को 'राष्ट्र-विरोधी' ठहरा देना गलत है। यह बयान आज के युवाओं के सबसे बड़े डर और शिकायत को दूर करता है। पिछले कुछ वर्षों में छात्र आंदोलनों को अक्सर मुख्यधारा के विमर्श में राष्ट्र-विरोधी करार देने की प्रवृत्ति देखी गई है। संघ प्रमुख का यह स्पष्टीकरण युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों को मान्यता देता है। संघ की छवि को अधिक उदार व समावेशी बनाता है।

शिक्षा को व्यापार के बजाय समाज के निर्माण का आधार मानते हुए संघ प्रमुख ने कुल बजट का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने की पुरानी मांग का समर्थन किया। यह मुद्दा आज के मध्यमवर्गीय परिवार और छात्र की सबसे बड़ी आर्थिक चिंता (महंगी शिक्षा) से सीधे जुड़ता है।

नीतिगत स्तर पर 6 प्रतिशत बजट की बात कर संघ ने छात्रों के सरोकारों के साथ खुद को खड़ा किया है, जो युवाओं में यह भरोसा जगाता है कि उनकी वास्तविक समस्याओं पर विचार किया जा रहा है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और LGBTQIA+ अधिकार पर भी संघ प्रमुख ने अपनी राय रखी।

उन्होंने कहा कि LGBTQIA+ समुदाय समाज का अभिन्न हिस्सा है। यद्यपि उन्होंने पारंपरिक परिवार संस्था को प्राथमिकता दी, लेकिन साथ ही समलैंगिक सह-जीवन के लिए अलग कानूनी व सामाजिक ढांचे का समर्थन किया। पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी माना जाने वाले सांस्कृतिक संगठन के प्रमुख द्वारा ऐसे आधुनिक सामाजिक विषय पर यह रुख अपनाना एक बड़ा वैचारिक बदलाव है।

यह निर्णय दर्शाता है कि संघ आज की पीढ़ी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विविधता से जुड़े विचारों को खारिज करने के बजाय उनके लिए व्यावहारिक स्थान बनाने को तैयार है।

संघ प्रमुख ने राष्ट्र सेविका समिति की स्वायत्तता और अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा जैसे संघ के शीर्ष निकायों में महिलाओं की बढ़ती सहभागिता का उल्लेख किया। संघ पर लंबे समय से केवल पुरुषों का संगठन होने का आरोप लगता रहा है। इस प्रश्न का उत्तर देकर उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि संगठन के भीतर महिलाओं की भूमिका और निर्णय-प्रक्रिया में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। 

कुछ लोग प्रश्न उठा सकते हैं कि संघ प्रमुख का यह संवाद आगामी चुनावों को लेकर था, लेकिन संवाद को केवल आगामी चुनावों या तात्कालिक राजनीतिक लाभ के चश्मे से देखना एक अधूरा आकलन होगा। यद्यपि किसी भी बड़े सामाजिक संगठन के विमर्श का राजनीतिक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन संघ का प्राथमिक ढांचा प्रत्यक्ष राजनीति के बजाय सामाजिक-सांस्कृतिक निर्माण का है।

चुनाव तात्कालिक होते हैं, जबकि युवा पीढ़ी के भीतर राष्ट्रबोध और व्यवस्था के प्रति विश्वास बहाल करना एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है। यदि यह संवाद केवल एक कार्यक्रम तक सीमित न रहकर निरंतर जारी रहता है, तभी इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

संघ प्रमुख का 'जेन जी संवाद' यह सिद्ध करता है कि संघ शताब्दी वर्ष के मुहाने पर खड़े होकर अतीत के गौरव में सिमटने के बजाय भविष्य की ओर देख रहा है।

आज का युवा केवल वादों या भाषणों से संतुष्ट नहीं होगा। वह व्यवस्था में पारदर्शिता, परीक्षाओं में शुचिता और रोजगार के ठोस अवसर चाहता है। संवाद की असली सफलता इस बात से तय होगी कि क्या इन वार्ताओं के बाद धरातल पर नीतियां पारदर्शी बनती हैं? युवाओं को देश के निर्माण में वास्तविक भागीदार बनाया जाता है।


बदलते भारत की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि युवाओं से केवल बात न की जाए, बल्कि उनकी बात सुनकर व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव किए जाएं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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