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दूसरा पहलू: बांग्लादेश और बिहारी मुसलमान; पाकिस्तान का साथ वाले 'देशद्रोही' करार दिए गए
विवेक शुक्ला
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 26 Feb 2026 07:24 AM IST
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सार
यह ऐतिहासिक मामला है, जिसमें पाकिस्तान अपने मूल के बिहारी मुस्लिमों को लेने को, तो बांग्लादेश उन्हें अपनाने को तैयार नहीं है। 1971 के युद्ध में ज्यादातर बिहारी मुस्लिमों ने पाकिस्तान का साथ दिया। इस कारण स्वतंत्र बांग्लादेश में उन्हें 'देशद्रोही' करार दिया गया। 2008 में ढाका हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में बिहारी मुसलमानों को बांग्लादेशी नागरिकता प्रदान की, पर असल में बदलाव बहुत कम आया।
बांग्लादेश और बिहारी मुसलमान
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तारिक रहमान के बीती 17 फरवरी को बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद से पाकिस्तान ने उससे (बांग्लादेश) रिश्ते सुधारने की कोशिशें तेज कर दी हैं। हालांकि, पाकिस्तान की तरफ से इसकी पहल 2024 में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद ही शुरू हो गई थी, पर क्या यह दोस्ती बांग्लादेश में फंसे पाकिस्तानी मूल के बिहारी मुसलमानों को वापस ले जाने में मदद करेगी? फिलहाल इसकी कोई उम्मीद नहीं दिखती।
दरअसल, बिहारी मुसलमानों का यह मुद्दा 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से गहराई से जुड़ा है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद, भारत के बिहार प्रांत, खासकर दरभंगा, पटना और सिवान जिलों, से लाखों उर्दू-भाषी मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में जाकर बस गए थे। वे पाकिस्तान के प्रति वफादार थे और बंगाली राष्ट्रवाद का विरोध करते थे। 1971 के युद्ध में अधिकांश बिहारियों ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया, जिसके कारण स्वतंत्र बांग्लादेश में उन्हें ‘देशद्रोही’ करार दिया गया।
युद्ध के बाद हजारों की हत्या हुई, और बचे हुए लोगों को राहत शिविरों में ठूंस दिया गया। वे पाकिस्तान जाना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें पूरी तरह अपनाने से इन्कार कर दिया। 1971 के बाद लाखों बिहारियों ने पाकिस्तानी नागरिकता की मांग की, लेकिन वे राज्यविहीन हो गए। आज उनकी संख्या विभिन्न रिपोर्टों में तीन से चार लाख के बीच बताई जाती है। फिर, 1973-74 में भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसमें पाकिस्तान ने 1.7 लाख बिहारियों को अपनाया, किंतु 1981 तक केवल 1.63 लाख ही वहां पहुंच सके। जनरल जिया-उल-हक ने 1984 में वादा किया था कि वह उन्हें पाकिस्तान ले जाएंगे, पर यह वादा कभी पूरा नहीं हुआ। 2015 में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि बिहारी मुसलमान अब बांग्लादेश सरकार की जिम्मेदारी हैं। इन्हें ‘स्ट्रैंडेड पाकिस्तानी’ भी कहा जाता है।
2008 में ढाका हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में बिहारी मुसलमानों (खासकर 1971 के बाद जन्मे) को बांग्लादेशी नागरिकता प्रदान की। इससे उन्हें वोट देने जैसे कुछ अधिकार भी मिले, लेकिन व्यावहारिक बदलाव बहुत कम आया। आज भी वे ढाका (जैसे जिनेवा कैंप), फरीदपुर, खुलना, चटगांव आदि के शिविरों में गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक बहिष्कार का शिकार हैं। रेड क्रॉस और कुछ मिशनरी संस्थाएं मदद करती हैं, पर उर्दू भाषा और सांस्कृतिक अंतर के कारण भेदभाव जारी है। अब तक की सभी बातचीत में यह मुद्दा नेपथ्य में ही रहा। यह दक्षिण एशिया का एक अनसुलझा मानवीय संकट बना हुआ है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।
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दरअसल, बिहारी मुसलमानों का यह मुद्दा 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से गहराई से जुड़ा है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद, भारत के बिहार प्रांत, खासकर दरभंगा, पटना और सिवान जिलों, से लाखों उर्दू-भाषी मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में जाकर बस गए थे। वे पाकिस्तान के प्रति वफादार थे और बंगाली राष्ट्रवाद का विरोध करते थे। 1971 के युद्ध में अधिकांश बिहारियों ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया, जिसके कारण स्वतंत्र बांग्लादेश में उन्हें ‘देशद्रोही’ करार दिया गया।
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युद्ध के बाद हजारों की हत्या हुई, और बचे हुए लोगों को राहत शिविरों में ठूंस दिया गया। वे पाकिस्तान जाना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें पूरी तरह अपनाने से इन्कार कर दिया। 1971 के बाद लाखों बिहारियों ने पाकिस्तानी नागरिकता की मांग की, लेकिन वे राज्यविहीन हो गए। आज उनकी संख्या विभिन्न रिपोर्टों में तीन से चार लाख के बीच बताई जाती है। फिर, 1973-74 में भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसमें पाकिस्तान ने 1.7 लाख बिहारियों को अपनाया, किंतु 1981 तक केवल 1.63 लाख ही वहां पहुंच सके। जनरल जिया-उल-हक ने 1984 में वादा किया था कि वह उन्हें पाकिस्तान ले जाएंगे, पर यह वादा कभी पूरा नहीं हुआ। 2015 में पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि बिहारी मुसलमान अब बांग्लादेश सरकार की जिम्मेदारी हैं। इन्हें ‘स्ट्रैंडेड पाकिस्तानी’ भी कहा जाता है।
2008 में ढाका हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में बिहारी मुसलमानों (खासकर 1971 के बाद जन्मे) को बांग्लादेशी नागरिकता प्रदान की। इससे उन्हें वोट देने जैसे कुछ अधिकार भी मिले, लेकिन व्यावहारिक बदलाव बहुत कम आया। आज भी वे ढाका (जैसे जिनेवा कैंप), फरीदपुर, खुलना, चटगांव आदि के शिविरों में गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक बहिष्कार का शिकार हैं। रेड क्रॉस और कुछ मिशनरी संस्थाएं मदद करती हैं, पर उर्दू भाषा और सांस्कृतिक अंतर के कारण भेदभाव जारी है। अब तक की सभी बातचीत में यह मुद्दा नेपथ्य में ही रहा। यह दक्षिण एशिया का एक अनसुलझा मानवीय संकट बना हुआ है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है।