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जीवन धारा: हर दिन थोड़ा-थोड़ा बेहतर होते जाएं, सूत्र ये है कि छोटी शुरुआत से डरें नहीं
जेम्स क्लियर
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 26 Feb 2026 07:34 AM IST
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सार
यदि आप हर दिन खुद को केवल एक फीसदी बेहतर बनाने का संकल्प लें, तो साल के अंत तक आप पहले से 37 गुना बेहतर इन्सान बन चुके होंगे। यह प्रमाण है कि आपकी वर्तमान स्थिति आपकी आदतों का ही प्रतिबिंब है।
जीवन धारा - हर दिन थोड़ा-थोड़ा बेहतर होते जाएं
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अक्सर हम अपने जीवन में किसी बड़े बदलाव का इंतजार करते हैं, यह सोचकर कि एक चमत्कारी दिन आएगा और सब कुछ बदल जाएगा। लेकिन महानता की नींव उन छोटे-छोटे बदलावों या आदतों में छिपी होती है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। ये ‘एटॉमिक’, यानी सूक्ष्म आदतें ही हमारे भविष्य की वह ईंटें हैं, जो समय के साथ एक अजेय किले का निर्माण करती हैं।
यदि आप हर दिन खुद को केवल एक फीसदी बेहतर बनाने का संकल्प लें, तो साल के अंत तक आप पहले से 37 गुना बेहतर इन्सान बन चुके होंगे। यह गणितीय सत्य इस बात का प्रमाण है कि आपकी वर्तमान स्थिति आपके चरित्र का अंतिम परिणाम नहीं है, बल्कि आपकी आदतों का प्रतिबिंब है। इसलिए, यदि आप परिणाम को बदलना चाहते हैं, तो लक्ष्यों को छोड़कर अपनी रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू करें। एक विजेता और एक हारने वाले, दोनों का लक्ष्य एक ही होता है, लेकिन जीतता वही है, जिसके पास बेहतर योजना होती है।
बदलाव की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है आपकी पहचान। यह कभी न कहें कि ‘मैं यह काम छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं’, बल्कि यह कहें कि ‘मैं यह काम नहीं करता’। जब आप अपनी आदतों को अपनी पहचान से जोड़ लेते हैं, तो अनुशासन बोझ नहीं, बल्कि आपका स्वभाव बन जाता है। इस स्वभाव को बनाए रखने के लिए आपको अपने परिवेश या वातावरण को इस तरह तैयार करना चाहिए कि अच्छी आदतें अपनाना आसान हो जाए और बुरी आदतें मुश्किल। प्रेरणा तो केवल शुरुआत करने के लिए होती है, पर माहौल निरंतरता प्रदान करता है। एक दिन की चूक विफलता नहीं होती, लेकिन बार-बार की चूक आदत को कमजोर कर सकती है। इसलिए नियम यह होना चाहिए कि किसी आदत को अमल में लाने में कभी दो बार चूक न हो।
आदतों के निर्माण में ‘दो मिनट का नियम’ भी एक क्रांतिकारी विचार है। इसके तहत, किसी भी नए काम को इतना छोटा कर दें कि उसे शुरू करने में आपको दो मिनट से कम समय लगे। उदाहरण के लिए, अगर आपकी इच्छा एक साल में 50 किताबें पढ़ने की है, तो इसे कम करके हर दिन एक पेज पढ़ने का लक्ष्य रखें। यह छोटा-सा कदम उस प्रतिरोध को खत्म कर देता है, जो आपको कुछ नया शुरू करने से रोकता है। एक बार जब आप मैदान में उतर जाते हैं, तो गति अपने आप बन जाती है।
याद रखें कि सफलता कोई मंजिल नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और आदतें उसे मजबूत बनाती हैं। आज से ही उस एक फीसदी सुधार की ओर कदम बढ़ाएं, क्योंकि बूंद-बूंद से ही सागर भरता है और आपकी एक छोटी-सी सही आदत आपके जीवन की सबसे बड़ी जीत बन सकती है। अपने भीतर के उस ‘एटॉमिक’ बदलाव को जागृत करें। - एटॉमिक हैबिट्स के अनूदित अंश
सूत्र - छोटी शुरुआत से डरें नहीं
सफलता लक्ष्य पाने में नहीं, बल्कि सही आदतों को विकसित करने में छिपी होती है। जब आप अपने व्यवहार को अपनी पहचान का हिस्सा बना लेते हैं, तो अनुशासन स्वभाव बन जाता है। अनुकूल वातावरण अच्छी आदतों को मजबूत करता है, जबकि छोटी शुरुआत निरंतरता की राह खोलती है।
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यदि आप हर दिन खुद को केवल एक फीसदी बेहतर बनाने का संकल्प लें, तो साल के अंत तक आप पहले से 37 गुना बेहतर इन्सान बन चुके होंगे। यह गणितीय सत्य इस बात का प्रमाण है कि आपकी वर्तमान स्थिति आपके चरित्र का अंतिम परिणाम नहीं है, बल्कि आपकी आदतों का प्रतिबिंब है। इसलिए, यदि आप परिणाम को बदलना चाहते हैं, तो लक्ष्यों को छोड़कर अपनी रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू करें। एक विजेता और एक हारने वाले, दोनों का लक्ष्य एक ही होता है, लेकिन जीतता वही है, जिसके पास बेहतर योजना होती है।
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बदलाव की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है आपकी पहचान। यह कभी न कहें कि ‘मैं यह काम छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं’, बल्कि यह कहें कि ‘मैं यह काम नहीं करता’। जब आप अपनी आदतों को अपनी पहचान से जोड़ लेते हैं, तो अनुशासन बोझ नहीं, बल्कि आपका स्वभाव बन जाता है। इस स्वभाव को बनाए रखने के लिए आपको अपने परिवेश या वातावरण को इस तरह तैयार करना चाहिए कि अच्छी आदतें अपनाना आसान हो जाए और बुरी आदतें मुश्किल। प्रेरणा तो केवल शुरुआत करने के लिए होती है, पर माहौल निरंतरता प्रदान करता है। एक दिन की चूक विफलता नहीं होती, लेकिन बार-बार की चूक आदत को कमजोर कर सकती है। इसलिए नियम यह होना चाहिए कि किसी आदत को अमल में लाने में कभी दो बार चूक न हो।
आदतों के निर्माण में ‘दो मिनट का नियम’ भी एक क्रांतिकारी विचार है। इसके तहत, किसी भी नए काम को इतना छोटा कर दें कि उसे शुरू करने में आपको दो मिनट से कम समय लगे। उदाहरण के लिए, अगर आपकी इच्छा एक साल में 50 किताबें पढ़ने की है, तो इसे कम करके हर दिन एक पेज पढ़ने का लक्ष्य रखें। यह छोटा-सा कदम उस प्रतिरोध को खत्म कर देता है, जो आपको कुछ नया शुरू करने से रोकता है। एक बार जब आप मैदान में उतर जाते हैं, तो गति अपने आप बन जाती है।
याद रखें कि सफलता कोई मंजिल नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और आदतें उसे मजबूत बनाती हैं। आज से ही उस एक फीसदी सुधार की ओर कदम बढ़ाएं, क्योंकि बूंद-बूंद से ही सागर भरता है और आपकी एक छोटी-सी सही आदत आपके जीवन की सबसे बड़ी जीत बन सकती है। अपने भीतर के उस ‘एटॉमिक’ बदलाव को जागृत करें। - एटॉमिक हैबिट्स के अनूदित अंश
सूत्र - छोटी शुरुआत से डरें नहीं
सफलता लक्ष्य पाने में नहीं, बल्कि सही आदतों को विकसित करने में छिपी होती है। जब आप अपने व्यवहार को अपनी पहचान का हिस्सा बना लेते हैं, तो अनुशासन स्वभाव बन जाता है। अनुकूल वातावरण अच्छी आदतों को मजबूत करता है, जबकि छोटी शुरुआत निरंतरता की राह खोलती है।