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जब होली कहानी हुआ करती थी: हिंदी सिनेमा से रंगों का गायब होना क्या बताता है?
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सार
मदर इंडिया जैसी फिल्म में ग्रामीण उत्सव और सामूहिकता के दृश्य उस कठोर सामाजिक यथार्थ को और उभारते हैं, जिसमें नर्गिस की ‘राधा’ संघर्ष करती है। यहां उत्सव और त्रासदी साथ-साथ चलते हैं और यही भारतीय जीवन का सच है।
जब होली कहानी हुआ करती थी
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
हिंदी सिनेमा में होली कभी सिर्फ़ रंगों और मस्ती का त्योहार नहीं रही। वह कहानी कहने का एक सशक्त माध्यम थी—ऐसा माध्यम जहां प्रेम, विद्रोह, पीड़ा, अपराधबोध और सामाजिक टकराव खुलकर सामने आ जाते थे।
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आज जब हिंदी फिल्मों से होली के गीत और दृश्य लगभग गायब हो चुके हैं, तो यह केवल एक परंपरा के लुप्त होने का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस सामूहिक संवेदना के विलुप्त होने का संकेत है, जिस पर कभी हमारा सिनेमा खड़ा था। पचास और साठ के दशक से लेकर नब्बे के दशक तक होली के दृश्य कथानक का अहम हिस्सा होते थे।
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मदर इंडिया जैसी फिल्म में ग्रामीण उत्सव और सामूहिकता के दृश्य उस कठोर सामाजिक यथार्थ को और उभारते हैं, जिसमें नर्गिस की ‘राधा’ संघर्ष करती है। यहां उत्सव और त्रासदी साथ-साथ चलते हैं और यही भारतीय जीवन का सच है।
सत्तर और अस्सी के दशक में होली के गीत सीधे कहानी को मोड़ देते थे। कटी पतंग का “आज न छोड़ेंगे” प्रेम और सामाजिक दूरी के बीच टकराव को उजागर करता है।
शोले का “होली के दिन दिल खिल जाते हैं” सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि गांव, दोस्ती और सामूहिक जीवन का उत्सव है। वहीं सिलसिला का “रंग बरसे” शायद हिंदी सिनेमा का सबसे जटिल होली गीत है—जहां रंगों के पीछे दबा हुआ प्रेम, नैतिक द्वंद्व और सामाजिक स्वीकृति का संकट छिपा है।
मुख्य धारा सिनेमा के पारिवारिक और सामाजिक कथानकों में भी होली एक महत्वपूर्ण औजार रही। वक्त में त्योहार पारिवारिक एकता का प्रतीक बनता है, जिसे समय और नियति छिन्न-भिन्न कर देते हैं। सौतन और आखिर क्यों जैसी फिल्मों में उत्सव के खुले माहौल में रिश्तों की दरारें और स्त्री के सवाल और तीखे होकर सामने आते हैं।
बागबान में होली खेले रघुवीरा अवध में गाने में त्योहारों की मौजूदगी के बावजूद माता-पिता की उपेक्षा यह बताती है कि आधुनिक परिवार में उत्सव तो हैं, पर संवेदना नहीं।
दूसरी ओर, डर जैसी फिल्म में भीड़, रंग और शोर के बीच भय और जुनून और अधिक खतरनाक हो जाते हैं। मशाल में सामाजिक अन्याय और पत्रकारिता के संघर्ष की पृष्ठभूमि में उत्सव एक विडंबना की तरह उभरता है—बाहर रंग हैं, भीतर अँधेरा।
तो फिर सवाल है कि आज की फिल्मों से होली क्यों गायब हो गई? क्यों नदिया के पार की जोगी जी की मिठास होली गीतों से गायब हो गई?
सबसे बड़ा कारण है हिंदी सिनेमा का व्यक्तिवादी हो जाना। आज की कहानियाँ “मैं” के इर्द-गिर्द घूमती हैं, जबकि होली “हम” का त्योहार है। दूसरा कारण है OTT और वैश्विक एस्थेटिक—जहां त्योहारों को अक्सर ‘डिस्ट्रैक्शन’ या ‘लोकल एलिमेंट’ माना जाता है।
तीसरा कारण संगीत की बदलती आत्मा है—लोक, ठुमरी और ब्रज भाषा की जगह पार्टी-ट्रैक्स ने ले ली है। शायद यही वजह हे कि लेट्स प्ले होली और बलम पिचकारी जैसे गाने पार्टी एंथम ज्यादा है और होली के रस रंग कम! इसके साथ-साथ रंगों के साथ शूटिंग की व्यावहारिक कठिनाइयाँ और सामाजिक संकोच भी फिल्मकारों को पीछे हटने पर मजबूर करते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि होली का ग़ायब होना यह बताता है कि हिंदी सिनेमा ने लोक, समुदाय और सामूहिक भावनाओं से दूरी बना ली है। रंग इसलिए फीके नहीं पड़े कि त्योहार बदल गया—रंग इसलिए उतरे क्योंकि सिनेमा बदल गया। राज कपूर की आर के स्टूडियो की होली, अमिताभ बच्चन के जलसा और प्रतीक्षा की होली या फिर शाहरुख खान के मन्नत की होली की बॉलीवुड परंपरा खत्म हो गई है।
अगर हिंदी सिनेमा को फिर से समाज की नब्ज पकड़नी है, तो उसे होली को केवल सजावट नहीं, बल्कि कहानी कहने का तरीका फिर से बनाना होगा। तभी रंग लौटेंगे—और उनके साथ वह सिनेमा भी जो कभी हमारा अपना हुआ करता था। बॉलीवुड को फिल्म जिद के इस गाने को सार्थक करनी होगा कि “होली के बहाने आ गए!!”
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