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चुनाव और झालमुड़ी: सत्ता की दहलीज तक पहुंचता पश्चिम बंगाल का स्वाद

Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Mon, 04 May 2026 06:26 PM IST
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सार

चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम बंगाल के झारग्राम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सड़क किनारे एक छोटी सी दुकान पर रुककर झाल मुड़ी का स्वाद लिया था। प्रधानमंत्री की झाल मुड़ी खाते हुए पोस्ट को मात्र 24 घंटे में 100 मिलियन व्यूज प्राप्त हुए, जिससे यह साधारण सा नाश्ता रातों-रात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

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झालमुड़ी का जादू चला बंगाल में - फोटो : एक्स/@narendramodi
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विस्तार

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों के बीच झाल मुड़ी महज एक नाश्ता नहीं, बल्कि जीत के जश्न और राजनीतिक संवाद का सबसे बड़ा प्रतीक बनकर उभरी है। जैसे-जैसे चुनावी नतीजे साफ होते गए, भाजपा कार्यालयों से लेकर टेलीविजन स्टूडियो तक झाल मुड़ी की महक और चर्चा ने धमाल मचा दिया। भाजपा के कई राज्यों के मुख्यमंत्री जीत के जश्न में झाल मुड़ी खाते दिख रहे हैं।

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नई दिल्ली में भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में तो एक बड़े पदाधिकारी स्वयं झाल मुड़ी बनाकर कार्यकर्ताओं को बांटते दिखे।

झाल मुड़ी की लोकप्रियता में आए इस भारी उछाल के पीछे एक दिलचस्प वाकया है। चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम बंगाल के झारग्राम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सड़क किनारे एक छोटी सी दुकान पर रुककर झाल मुड़ी का स्वाद लिया था। प्रधानमंत्री की झाल मुड़ी खाते हुए पोस्ट को मात्र 24 घंटे में 100 मिलियन व्यूज प्राप्त हुए, जिससे यह साधारण सा नाश्ता रातों-रात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
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हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री के झाल मुड़ी खाने को चुनावी स्टंट करार दिया था। उन्होंने झाल मुड़ी बेचने वाले युवा को सुरक्षा कर्मी तक बताया था, लेकिन उनका यह दावा बाद में गलत साबित हुआ।

ममता बनर्जी ने झाल मुड़ी से आगे बढ़कर यहां तक कहा था कि भाजपा सत्ता में आई तो मछली खाने पर राज्य में प्रतिबंध लगा देगी, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद कोलकता में भाजपा कार्यालय में माछ-भात की दावत दी गई।

पश्चिम बंगाल और झाल मुड़ी

झाल मुड़ी पर लौटते हैं, यह केवल पफ्ड राइस (मुरमुरा), सरसों के तेल, मिर्च और मसालों का मिश्रण नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। यह ब्रिटिशकाल में कोलकाता में लोकप्रिय हुआ था, क्योंकि यह आम लोगों के लिए बेहद सस्ता भोजन था। कोलकाता की गलियों में यह दशकों से आम आदमी और कामकाजी वर्ग का सबसे सुलभ साथी रहा है। दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में जहां प्रवासी श्रमिक होते हैं, वहां भी झाल मुड़ी की दुकानें लगी मिल जाती हैं। 

'झाल' का अर्थ तीखा और 'मुड़ी' का अर्थ मुरमुरा है। यह सादगी और ताजगी का प्रतीक है। देखा जाए तो भारतीय राजनीति में अक्सर भोजन को जनता से जुड़ने का जरिया बनाया जाता है, लेकिन झाल मुड़ी की बात अलग है। यह व्यंजन न तो महंगा है और न ही जटिल, इसलिए जब राजनेता इसका उपयोग करते हैं तो वे सीधे साधारण जनता के दिल और उनकी दिनचर्या से जुड़ने का संदेश देते हैं।

जीत के जश्न में भाजपा नेताओं द्वारा जीत के जश्न में झाल मुड़ी का उपयोग करना एक ओर उनकी लोकतांत्रिक सादगी को दर्शाता है तो दूसरी ओर यह सवाल भी उठाता है कि क्या यह वास्तविक जमीनी जुड़ाव है या महज एक चुनावी रणनीति?

वैसे, झाल मुड़ी का विस्तार पश्चिम बंगाल से परे ओडिशा, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बांग्लादेश तक है। हर जगह स्वाद में थोड़ा बदलाव होने के बावजूद इसकी सस्ती, सुलभ और सामूहिक प्रकृति इसे राजनीति के लिए एक आदर्श प्रतीक बनाती है।

सत्ता के गलियारों तक पहुंची यह साधारण सी झाल मुड़ी भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती को बयां करती है, जहां एक कागज का ठोंगा सत्ता और समाज के बीच संवाद का माध्यम बन जाता है।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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